यूएन महामारी घोषणापत्र को अमेरिका और ईयू ने नकारा, भारत-जर्मनी ने जताई आंशिक आपत्ति
सारांश
मुख्य बातें
संयुक्त राष्ट्र महासभा की महामारी रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया पर आयोजित दूसरी हाई-लेवल बैठक में 27 सितंबर 2026 को अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) ने उस अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया, जिसका उद्देश्य भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना था। भारत और जर्मनी ने दस्तावेज़ के कुछ प्रावधानों पर चिंता ज़रूर जताई, लेकिन उन्होंने घोषणापत्र का पूरी तरह विरोध नहीं किया। रिपोर्टों के अनुसार इटली ने भी इसे अस्वीकार कर दिया।
बैठक और घोषणापत्र की पृष्ठभूमि
यह बैठक न्यूयॉर्क में हुई, जहाँ सदस्य देश उस साझा दस्तावेज़ पर विचार कर रहे थे जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है — यानी यह सरकारों को किसी स्वास्थ्य संकट के दौरान अनिवार्य कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं करता। घोषणापत्र में मज़बूत प्रयोगशालाओं, समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियों, बेहतर आपातकालीन समन्वय, वैक्सीन और दवाओं तक समान पहुँच, तथा महामारी का ख़तरा सामने आने के बाद पहले 100 दिनों के भीतर आवश्यक उत्पाद उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित करने की बात कही गई थी।
गौरतलब है कि यह दस्तावेज़ कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा था।
अमेरिका की आपत्तियाँ
अमेरिका ने कहा कि बातचीत के दौरान कई बदलाव किए जाने के बावजूद घोषणापत्र में अब भी कुछ ऐसी भाषा बची हुई है जो उसे स्वीकार्य नहीं। अमेरिकी सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की निदेशक एरिका श्वार्ट्ज़ ने कहा कि इसमें ऐसे 'विवाद पैदा करने वाले विचार शामिल हैं, जिनकी परिभाषा को लेकर भी आम सहमति नहीं है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका इस पूरे दस्तावेज़ का समर्थन करने की स्थिति में नहीं है।
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने बातचीत के दौरान घोषणापत्र के पूर्व मसौदे में शामिल बराबरी, एकजुटता, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, लैंगिक समानता, वैक्सीन पहुँच और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग जैसे प्रावधानों को हटाने की माँग की थी।
यूरोपीय संघ की चिंताएँ
यूरोपीय संघ ने भिन्न प्रकार की आपत्तियाँ दर्ज कराईं। उसकी मुख्य आपत्तियाँ बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और महामारी की तैयारी के लिए प्रस्तावित आर्थिक योगदान से जुड़ी थीं। ईयू ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर स्वैच्छिक और दोनों पक्षों की सहमति वाली शर्तों पर होनी चाहिए।
ईयू ने यह भी कहा कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा समझौते और दोहा घोषणा का संदर्भ देते समय उनके मूल दस्तावेजों का सही और पूरा अर्थ सामने आना चाहिए। हालाँकि, ईयू ने माना कि घोषणापत्र में महामारी तैयारी योजना, बीमारी निगरानी, टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण जैसी कई उपयोगी बातें भी शामिल हैं। फिर भी उसने कहा कि दस्तावेज़ उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता और इसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें वह 'स्पष्ट रेड लाइन' मानता है।
भारत और जर्मनी का रुख
भारत और जर्मनी ने दस्तावेज़ के कुछ अंशों पर आपत्ति ज़रूर दर्ज कराई, लेकिन उन्होंने इसे पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया। भारत ने किन विशेष बिंदुओं पर चिंता जताई, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।
WHO की चेतावनी और आगे की राह
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने चेतावनी दी कि भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए अभी और अधिक कदम उठाने और निवेश करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, 'कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की कमज़ोरियों को उजागर किया और उन्हें और गंभीर बनाया। इसने दुनिया को कई दर्दनाक सबक भी सिखाए।'
रिपोर्टों के अनुसार, अब इस दस्तावेज़ को आगे विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजे जाने की उम्मीद है। बड़े देशों की असहमति के बीच इस घोषणापत्र का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, और यह देखना होगा कि वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग का यह प्रयास किस दिशा में आगे बढ़ता है।