27 सितंबर 2026
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यूएन महामारी घोषणापत्र को अमेरिका और ईयू ने नकारा, भारत-जर्मनी ने जताई आंशिक आपत्ति

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यूएन महामारी घोषणापत्र को अमेरिका और ईयू ने नकारा, भारत-जर्मनी ने जताई आंशिक आपत्ति

सारांश

भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए बना यूएन का घोषणापत्र पहली बड़ी परीक्षा में ही लड़खड़ा गया — अमेरिका और ईयू दोनों ने इसे ठुकरा दिया, हालाँकि अलग-अलग कारणों से। ट्रंप प्रशासन ने भाषाई आपत्तियाँ उठाईं, जबकि ईयू बौद्धिक संपदा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर अड़ा रहा। कोविड के बाद की एकजुटता का यह सपना अब संयुक्त राष्ट्र महासभा के हाथों में है।

मुख्य बातें

अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) ने 27 सितंबर 2026 को न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र का महामारी घोषणापत्र खारिज कर दिया।
इटली ने भी दस्तावेज़ को स्पष्ट रूप से अस्वीकार किया।
भारत और जर्मनी ने कुछ प्रावधानों पर आपत्ति जताई, लेकिन पूरे दस्तावेज़ का विरोध नहीं किया।
CDC निदेशक एरिका श्वार्ट्ज़ ने कहा कि घोषणापत्र में 'विवाद पैदा करने वाले विचार' शामिल हैं जिन पर सहमति नहीं।
ईयू की मुख्य आपत्तियाँ बौद्धिक संपदा अधिकारों , टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और आर्थिक योगदान के प्रावधानों से जुड़ी थीं।
घोषणापत्र कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है; अब इसे आगे विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजे जाने की उम्मीद है।

संयुक्त राष्ट्र महासभा की महामारी रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया पर आयोजित दूसरी हाई-लेवल बैठक में 27 सितंबर 2026 को अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) ने उस अंतरराष्ट्रीय घोषणापत्र को स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया, जिसका उद्देश्य भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करना था। भारत और जर्मनी ने दस्तावेज़ के कुछ प्रावधानों पर चिंता ज़रूर जताई, लेकिन उन्होंने घोषणापत्र का पूरी तरह विरोध नहीं किया। रिपोर्टों के अनुसार इटली ने भी इसे अस्वीकार कर दिया।

बैठक और घोषणापत्र की पृष्ठभूमि

यह बैठक न्यूयॉर्क में हुई, जहाँ सदस्य देश उस साझा दस्तावेज़ पर विचार कर रहे थे जो कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है — यानी यह सरकारों को किसी स्वास्थ्य संकट के दौरान अनिवार्य कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं करता। घोषणापत्र में मज़बूत प्रयोगशालाओं, समय पर चेतावनी देने वाली प्रणालियों, बेहतर आपातकालीन समन्वय, वैक्सीन और दवाओं तक समान पहुँच, तथा महामारी का ख़तरा सामने आने के बाद पहले 100 दिनों के भीतर आवश्यक उत्पाद उपलब्ध कराने की क्षमता विकसित करने की बात कही गई थी।

गौरतलब है कि यह दस्तावेज़ कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक स्वास्थ्य तंत्र को मज़बूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा था।

अमेरिका की आपत्तियाँ

अमेरिका ने कहा कि बातचीत के दौरान कई बदलाव किए जाने के बावजूद घोषणापत्र में अब भी कुछ ऐसी भाषा बची हुई है जो उसे स्वीकार्य नहीं। अमेरिकी सेंटर्स फॉर डिज़ीज़ कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की निदेशक एरिका श्वार्ट्ज़ ने कहा कि इसमें ऐसे 'विवाद पैदा करने वाले विचार शामिल हैं, जिनकी परिभाषा को लेकर भी आम सहमति नहीं है।' उन्होंने स्पष्ट किया कि अमेरिका इस पूरे दस्तावेज़ का समर्थन करने की स्थिति में नहीं है।

रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने बातचीत के दौरान घोषणापत्र के पूर्व मसौदे में शामिल बराबरी, एकजुटता, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, लैंगिक समानता, वैक्सीन पहुँच और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग जैसे प्रावधानों को हटाने की माँग की थी।

यूरोपीय संघ की चिंताएँ

यूरोपीय संघ ने भिन्न प्रकार की आपत्तियाँ दर्ज कराईं। उसकी मुख्य आपत्तियाँ बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और महामारी की तैयारी के लिए प्रस्तावित आर्थिक योगदान से जुड़ी थीं। ईयू ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर स्वैच्छिक और दोनों पक्षों की सहमति वाली शर्तों पर होनी चाहिए।

ईयू ने यह भी कहा कि विश्व व्यापार संगठन (WTO) के बौद्धिक संपदा समझौते और दोहा घोषणा का संदर्भ देते समय उनके मूल दस्तावेजों का सही और पूरा अर्थ सामने आना चाहिए। हालाँकि, ईयू ने माना कि घोषणापत्र में महामारी तैयारी योजना, बीमारी निगरानी, टीकाकरण, स्वास्थ्यकर्मियों की भूमिका और 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण जैसी कई उपयोगी बातें भी शामिल हैं। फिर भी उसने कहा कि दस्तावेज़ उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता और इसमें कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन्हें वह 'स्पष्ट रेड लाइन' मानता है।

भारत और जर्मनी का रुख

भारत और जर्मनी ने दस्तावेज़ के कुछ अंशों पर आपत्ति ज़रूर दर्ज कराई, लेकिन उन्होंने इसे पूरी तरह अस्वीकार नहीं किया। भारत ने किन विशेष बिंदुओं पर चिंता जताई, इसका विस्तृत विवरण उपलब्ध नहीं है।

WHO की चेतावनी और आगे की राह

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टेड्रोस अधानोम घेब्रेयेसस ने चेतावनी दी कि भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए अभी और अधिक कदम उठाने और निवेश करने की ज़रूरत है। उन्होंने कहा, 'कोविड-19 महामारी ने वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा की कमज़ोरियों को उजागर किया और उन्हें और गंभीर बनाया। इसने दुनिया को कई दर्दनाक सबक भी सिखाए।'

रिपोर्टों के अनुसार, अब इस दस्तावेज़ को आगे विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजे जाने की उम्मीद है। बड़े देशों की असहमति के बीच इस घोषणापत्र का भविष्य अनिश्चित बना हुआ है, और यह देखना होगा कि वैश्विक स्वास्थ्य सहयोग का यह प्रयास किस दिशा में आगे बढ़ता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

वह भू-राजनीतिक खींचतान में फँसी हुई है। ट्रंप प्रशासन की आपत्तियाँ मुख्यतः वैचारिक हैं — लैंगिक समानता और प्रजनन स्वास्थ्य जैसे प्रावधानों पर — जबकि ईयू की चिंताएँ बौद्धिक संपदा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के आर्थिक हितों से प्रेरित हैं। दोनों के कारण अलग हैं, लेकिन परिणाम एक ही है: एक गैर-बाध्यकारी दस्तावेज़ भी आम सहमति नहीं जुटा पाया। यह वैश्विक स्वास्थ्य शासन की उस बुनियादी कमज़ोरी को उजागर करता है जिसे WHO महानिदेशक टेड्रोस ने ख़ुद स्वीकार किया — अगली महामारी से पहले दुनिया को एकजुट करना अभी भी एक अधूरा काम है।
RashtraPress
27 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूएन का महामारी घोषणापत्र क्या है और इसे क्यों खारिज किया गया?
यह संयुक्त राष्ट्र महासभा का एक गैर-बाध्यकारी दस्तावेज़ है जिसका उद्देश्य भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग को मज़बूत करना है। अमेरिका ने भाषाई और वैचारिक आपत्तियों के कारण इसे अस्वीकार किया, जबकि ईयू ने बौद्धिक संपदा और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के प्रावधानों को 'रेड लाइन' बताया।
क्या यह घोषणापत्र देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी है?
नहीं, यह घोषणापत्र कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। इसका मतलब है कि यह सरकारों को किसी स्वास्थ्य संकट के दौरान अनिवार्य रूप से कोई विशेष कदम उठाने के लिए बाध्य नहीं करता।
भारत ने इस दस्तावेज़ पर क्या रुख अपनाया?
भारत ने घोषणापत्र के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई, लेकिन उसे पूरी तरह खारिज नहीं किया। भारत ने किन विशेष बिंदुओं पर चिंता व्यक्त की, इसका विस्तृत विवरण रिपोर्टों में उपलब्ध नहीं है।
ट्रंप प्रशासन ने घोषणापत्र में क्या बदलाव माँगे थे?
रिपोर्टों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन ने घोषणापत्र के पूर्व मसौदे से बराबरी, एकजुटता, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं, लैंगिक समानता, वैक्सीन पहुँच और अंतरराष्ट्रीय फंडिंग जैसे प्रावधानों को हटाने की माँग की थी।
अब इस घोषणापत्र का क्या होगा?
रिपोर्टों के अनुसार, यह दस्तावेज़ अब आगे विचार के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा के पास भेजे जाने की उम्मीद है। प्रमुख देशों की असहमति को देखते हुए इसका भविष्य अनिश्चित बना हुआ है।
राष्ट्र प्रेस
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