सीनेटर वार्नॉक ने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के मतदान अधिकार फैसले को बताया 'विनाशकारी झटका'
सारांश
Key Takeaways
डेमोक्रेटिक सीनेटर राफेल वार्नॉक ने रविवार, 3 मई 2026 को अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट के मतदान अधिकारों से जुड़े ताज़े फैसले की कड़ी निंदा करते हुए इसे लोकतंत्र और विशेष रूप से अश्वेत मतदाताओं के लिए एक गंभीर आघात करार दिया। सीबीएस न्यूज़ को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने चेतावनी दी कि यह फैसला नस्लीय भेदभाव के आधार पर बने चुनावी नक्शों को चुनौती देने की क्षमता को व्यापक रूप से सीमित कर देगा।
फैसले का केंद्रीय मुद्दा
यह फैसला मतदान अधिकार कानून (Voting Rights Act) की धारा 2 के इस्तेमाल को सीमित करता है। अब नस्लीय भेदभाव के आधार पर चुनावी सीमाओं को चुनौती देने के लिए जानबूझकर भेदभाव साबित करना अनिवार्य होगा — केवल असमान प्रभाव दिखाना पर्याप्त नहीं रहेगा। वार्नॉक के अनुसार यह मानक ऐतिहासिक सच्चाइयों को नज़रअंदाज़ करता है, क्योंकि वर्षों तक अफ्रीकी-अमेरिकियों को प्रत्यक्ष कानूनी उल्लेख के बिना भी मतदान से वंचित रखा गया।
2013 के शेल्बी काउंटी फैसले से तुलना
वार्नॉक ने इस फैसले को 2013 के शेल्बी काउंटी बनाम होल्डर मामले से जोड़ा, जिसने मतदान कानूनों पर संघीय निगरानी को पहले ही कमज़ोर कर दिया था। उन्होंने कहा, ''तब से हमने देखा है कि नस्लीय मतदान अंतर और बढ़ा है, कम नहीं हुआ।'' उनके अनुसार जिन राज्यों में पहले सख्त निगरानी थी, वहाँ यह अंतर और तेज़ी से बढ़ा है। यह ऐसे समय में आया है जब कई राज्यों में अल्पसंख्यक मतदाताओं की भागीदारी पहले से ही विवादों में है।
गेरिमैंडरिंग पर वार्नॉक की चेतावनी
वार्नॉक ने कहा कि नया फैसला राज्यों को ऐसे चुनावी क्षेत्र बनाने के लिए प्रोत्साहित करेगा जिससे अल्पसंख्यकों का वोट कमज़ोर हो जाए। उन्होंने पार्टिजन गेरिमैंडरिंग को लोकतंत्र की जड़ों पर प्रहार बताते हुए कहा, ''गेरिमैंडरिंग चुनावों को उल्टा कर देता है — जहाँ जनता नेताओं को चुनने के बजाय नेता अपने मतदाता चुनते हैं।'' उन्होंने बताया कि उन्होंने इस पर रोक लगाने के लिए कानून भी पेश किया है, लेकिन अब तक उसे दोनों दलों का समर्थन नहीं मिला।
कांग्रेस से अपील और आगे की माँग
वार्नॉक ने अमेरिकी कांग्रेस से 1965 के वोटिंग राइट्स एक्ट के प्रमुख प्रावधानों को बहाल करने की अपील की, जिनमें भेदभाव के इतिहास वाले राज्यों में चुनावी बदलावों पर संघीय पूर्व-अनुमोदन की व्यवस्था शामिल थी। उन्होंने यह भी कहा कि पोलिंग बूथ बंद करना और वोटर लिस्ट से नाम हटाने जैसी प्रक्रियाएँ भी अल्पसंख्यक समुदायों को असंगत रूप से प्रभावित करती हैं। उनके शब्दों में, ''आँकड़े बताते हैं कि इसका असर अश्वेत और अन्य अल्पसंख्यक नागरिकों पर ज़्यादा पड़ता है।''
राज्यों में बदलाव की तैयारी
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद कई राज्यों ने आने वाले चुनावों से पहले अपने चुनावी नक्शों में बदलाव पर विचार शुरू कर दिया है। इससे प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले असर को लेकर नागरिक अधिकार संगठनों में चिंता बढ़ गई है। आने वाले महीनों में यह बहस और तीखी होने की संभावना है।