2008 बेंगलुरु मडीवाला बम धमाका: फैसले से पहले संदिग्ध आरोपी अब्दुल खादर की दिल का दौरा पड़ने से मौत
सारांश
मुख्य बातें
बेंगलुरु के 2008 मडीवाला बम धमाका मामले में संदिग्ध आतंकी आरोपी अब्दुल खादर (60 वर्ष) की शुक्रवार, 12 जून 2026 को दिल का दौरा पड़ने से मृत्यु हो गई — और यह तब हुआ जब अदालत अगले कुछ दिनों में इस बहुचर्चित मामले में फैसला सुनाने वाली थी। खादर 2010 से बेंगलुरु के परप्पना अग्रहारा केंद्रीय जेल में न्यायिक हिरासत में थे।
घटनाक्रम: कैसे हुई मौत
जेल अधिकारियों के अनुसार, शुक्रवार को खादर की तबीयत अचानक बिगड़ी। उन्हें तत्काल जयदेव अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और अस्पताल पहुँचने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। अधिकारियों ने बताया कि खादर पहले से स्वास्थ्य समस्याओं की शिकायत कर रहे थे, जिसके चलते उन्हें तुरंत अस्पताल भेजा गया था।
मृत्यु के बाद शव को पोस्टमार्टम के लिए विक्टोरिया अस्पताल भेजा गया। उनके परिवार को घटना की सूचना दे दी गई है। खादर मडिकेरी जिले के विराजपेट के निवासी थे।
मुकदमे की स्थिति और कानूनी पेचीदगी
खादर के खिलाफ मुकदमा अपने अंतिम चरण में था और अदालत से शीघ्र फैसला अपेक्षित था। उनकी मृत्यु के साथ ही यह मुकदमा अब स्वतः समाप्त हो जाएगा, क्योंकि भारतीय आपराधिक न्याय प्रणाली में आरोपी की मृत्यु के बाद उसके विरुद्ध कार्यवाही जारी नहीं रह सकती। गौरतलब है कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने खादर को 2008 के बेंगलुरु सिलसिलेवार बम धमाकों की जाँच के तहत गिरफ्तार किया था।
2008 बेंगलुरु बम धमाके: पृष्ठभूमि
25 जुलाई 2008 को बेंगलुरु में 30 मिनट के अंतराल में कई देसी टाइमर डिवाइस फटे। इनमें होसुर रोड स्थित मडीवाला पुलिस चेकपोस्ट बस स्टैंड पर हुआ विस्फोट सबसे घातक रहा, जिसमें एक महिला समेत दो लोगों की जान चली गई और कई अन्य घायल हो गए। घायलों का इलाज पास के सेंट जॉन अस्पताल में किया गया।
जाँचकर्ताओं ने पाया कि ये धमाके कथित तौर पर प्रतिबंधित संगठनों स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) और लश्कर-ए-तैबा (LeT) द्वारा रचे गए थे। पाकिस्तान में कथित संचालकों सहित कई प्रमुख व्यक्तियों की पहचान की गई।
जाँच और गिरफ्तारियाँ
कर्नाटक पुलिस और NIA ने कई एफआईआर दर्ज कीं और वर्षों के दौरान दर्जनों संदिग्धों को गिरफ्तार किया। खादर की गिरफ्तारी 2010 में हुई थी और तब से वे परप्पना अग्रहारा केंद्रीय जेल में न्यायिक हिरासत में थे — यानी करीब 16 वर्षों तक मुकदमे का सामना करते रहे।
आगे क्या होगा
खादर की मृत्यु के बाद इस मामले में उनसे संबंधित कार्यवाही समाप्त होगी, हालाँकि अन्य आरोपियों के विरुद्ध मुकदमे की स्थिति पर अदालत अपना रुख स्पष्ट करेगी। यह मामला भारत में लंबे समय से चल रहे आतंकवाद-संबंधी मुकदमों की जटिलता को एक बार फिर उजागर करता है।