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2020 दिल्ली दंगा: कड़कड़डूमा कोर्ट ने ऑटो चालक बब्बू हत्याकांड में 7 आरोपियों को बरी किया

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2020 दिल्ली दंगा: कड़कड़डूमा कोर्ट ने ऑटो चालक बब्बू हत्याकांड में 7 आरोपियों को बरी किया

सारांश

2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों में ऑटो चालक बब्बू की मौत के मामले में कड़कड़डूमा कोर्ट ने 7 आरोपियों को हत्या से बरी कर दिया — सबूत अपर्याप्त। निषेधाज्ञा उल्लंघन में दोषी ठहराए गए। पाँच साल बाद भी इंसाफ की लड़ाई अधूरी।

मुख्य बातें

कड़कड़डूमा कोर्ट ने 16 अक्टूबर 2026 को 2020 दिल्ली दंगों में ऑटो चालक बब्बू की हत्या के मामले में 7 आरोपियों को बरी किया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह ने कहा कि दिल्ली पुलिस आरोपियों की भूमिका साबित करने में विफल रही।
सातों को IPC धारा 188 (निषेधाज्ञा उल्लंघन) के तहत दोषी ठहराया गया।
बब्बू पर खजूरी चौक पर हमला हुआ था; 27 फरवरी 2020 को जीटीबी अस्पताल में उनकी मौत हुई।
मामला मृतक के भाई की शिकायत पर दर्ज एफआईआर के आधार पर चला।

कड़कड़डूमा कोर्ट ने शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026 को 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान ऑटो चालक बब्बू की हत्या के मामले में 7 आरोपियों को सबूतों के अभाव में हत्या के आरोप से बरी कर दिया। हालाँकि, अदालत ने इन सभी को निषेधाज्ञा उल्लंघन के मामले में दोषी ठहराया है।

अदालत का फैसला

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश परवीन सिंह की अदालत ने कुलदीप सिंह, हरजीत सिंह उर्फ हैप्पी, राहुल उर्फ अजय, सचिन रस्तोगी, भरत भूषण उर्फ लकी, संदीप उर्फ संजीव और धर्मेंद्र को हत्या के आरोप से बरी करने का आदेश दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस यह साबित करने में विफल रही कि सातों आरोपियों ने खजूरी चौक पर दंगों के दौरान बब्बू पर जानलेवा हमले में भाग लिया था।

मुख्य घटनाक्रम

एफआईआर के अनुसार — जो मृतक के भाई की शिकायत पर दर्ज की गई थी — ऑटो चालक बब्बू खजूरी गोल चक्कर के पास से गुज़र रहे थे, जब उनका वाहन रुक गया और भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। दंगों में घायल बब्बू को पहले अस्पताल ले जाया गया और बाद में जीटीबी अस्पताल रेफर किया गया, जहाँ 27 फरवरी 2020 को उन्होंने दम तोड़ दिया।

आरोप और कानूनी पहलू

सातों आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दंगा करने, गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होने और हत्या करने के आरोप लगाए गए थे। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने हत्या के आरोप से बरी करते हुए उन्हें IPC की धारा 188 (निषेधाज्ञा उल्लंघन) के तहत दोषी ठहराया।

व्यापक संदर्भ

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से जुड़े सैकड़ों मामले विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं। गौरतलब है कि इन दंगों में 53 से अधिक लोगों की जान गई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। अभियोजन पक्ष द्वारा ठोस साक्ष्य न प्रस्तुत कर पाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

आगे की स्थिति

निषेधाज्ञा उल्लंघन के दोष के बाद अब सज़ा के निर्धारण की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। इस फैसले के बाद मृतक के परिवार और कानूनी विशेषज्ञों की ओर से उच्च न्यायालय में अपील की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

संपादकीय दृष्टिकोण

हत्या के गंभीर आरोप से बरी करने के साथ, पीड़ित परिवार के लिए न्याय का एक खोखला विकल्प है। 53 से अधिक मौतों वाले इन दंगों में जब-जब ऐसे फैसले आते हैं, तो जवाबदेही की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
RashtraPress
16 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कड़कड़डूमा कोर्ट ने 2020 दिल्ली दंगों में बब्बू हत्याकांड में 7 आरोपियों को क्यों बरी किया?
अदालत ने कहा कि दिल्ली पुलिस यह साबित करने में नाकाम रही कि सातों आरोपियों ने खजूरी चौक पर बब्बू पर जानलेवा हमले में भाग लिया था। सबूतों की कमी के चलते हत्या के आरोप से बरी किया गया, हालाँकि निषेधाज्ञा उल्लंघन में दोषी पाया गया।
ऑटो चालक बब्बू की मौत कब और कैसे हुई थी?
फरवरी 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान खजूरी गोल चक्कर के पास बब्बू पर हमला हुआ था। घायल अवस्था में उन्हें जीटीबी अस्पताल रेफर किया गया, जहाँ 27 फरवरी 2020 को उनकी मौत हो गई।
इस मामले में आरोपियों पर कौन-कौन से आरोप थे?
सातों आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत दंगा करना, गैर-कानूनी तरीके से एकत्र होना और हत्या करना — ये आरोप लगाए गए थे। अदालत ने हत्या से बरी करते हुए IPC धारा 188 (निषेधाज्ञा उल्लंघन) में दोषी ठहराया।
इस फैसले के बाद आगे क्या होगा?
निषेधाज्ञा उल्लंघन के दोष के बाद सज़ा की सुनवाई अगली कड़ी होगी। मृतक के परिवार के पास हत्या से बरी किए जाने के फैसले को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती देने का विकल्प उपलब्ध है।
2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगे क्या थे और उनसे जुड़े मामलों की स्थिति क्या है?
फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) को लेकर भड़की हिंसा में 53 से अधिक लोगों की मौत हुई और सैकड़ों घायल हुए। इन दंगों से जुड़े सैकड़ों मामले अभी भी विभिन्न अदालतों में विचाराधीन हैं।
राष्ट्र प्रेस
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