उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत पर कड़कड़डूमा कोर्ट ने सुरक्षित रखा फैसला, 2020 दिल्ली दंगा मामला
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने 5 जुलाई 2026 को 2020 उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगा साजिश मामले में आरोपी उमर खालिद और शरजील इमाम की नियमित जमानत याचिकाओं पर दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। दोनों आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) सहित अन्य धाराओं के तहत मामला दर्ज है और वे करीब छह वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए सांप्रदायिक दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और सैकड़ों घायल हुए थे। दिल्ली पुलिस ने इस मामले में यूएपीए के तहत साजिश का आरोप लगाते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें उमर खालिद और शरजील इमाम प्रमुख हैं। पिछले महीने कड़कड़डूमा कोर्ट ने इन दोनों की जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब माँगा था।
बचाव पक्ष की दलीलें
शरजील इमाम के वकील ने अदालत को बताया कि जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनकी जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद से छह महीने से अधिक समय बीत चुका है, फिर भी मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई। बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि अभी तक आरोप-निर्धारण (चार्ज फ्रेमिंग) पर बहस भी पूरी नहीं हो सकी है, जबकि इमाम लगभग छह वर्षों से जेल में हैं। उमर खालिद की ओर से भी ट्रायल कोर्ट में नियमित जमानत की माँग की गई और दोनों याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई हुई।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व आदेश
इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम दोनों की जमानत याचिकाएँ खारिज कर दी थीं। शीर्ष अदालत ने कहा था कि अभियोजन पक्ष की ओर से प्रस्तुत सामग्री प्रथम दृष्टया यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी रोक को लागू करती है।
हालाँकि, उसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद — पाँच अन्य आरोपियों को — जमानत दे दी थी।
बड़ी पीठ को भेजा गया अहम कानूनी सवाल
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले के दो अन्य आरोपियों तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत दी, यह देखते हुए कि वे लंबे समय से जेल में हैं और मुकदमे के शीघ्र पूरा होने की संभावना नहीं है।
साथ ही, न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने एक महत्त्वपूर्ण कानूनी प्रश्न — कि क्या लंबी न्यायिक हिरासत और मुकदमे में अत्यधिक विलंब यूएपीए की धारा 43डी(5) की कड़ी शर्तों के बावजूद जमानत का आधार बन सकते हैं — भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास उचित बड़ी पीठ गठित करने हेतु भेज दिया। अदालत ने माना कि इस बिंदु पर सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों के बीच परस्पर विरोधी व्याख्याएँ रही हैं।
अभियोजन पक्ष का रुख
सुनवाई के दौरान दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.वी. राजू ने तर्क दिया था कि यूनियन ऑफ इंडिया बनाम के.ए. नजीब मामले के फैसले की व्याख्या को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की विभिन्न पीठों के दृष्टिकोण में अंतर है, विशेष रूप से यूएपीए और एनआईए कानून के तहत दाखिल जमानत याचिकाओं के संदर्भ में। कड़कड़डूमा कोर्ट अब अपना आदेश अलग से सुनाएगी।