शरजील इमाम और उमर खालिद की नई जमानत याचिकाओं पर दिल्ली कोर्ट ने पुलिस को नोटिस जारी किया, 4 जुलाई को अगली सुनवाई
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली की एक अदालत ने शनिवार, 13 जून 2026 को 2020 दिल्ली दंगों की बड़ी साजिश से जुड़े मामले में शरजील इमाम और उमर खालिद द्वारा दायर नई नियमित जमानत याचिकाओं पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 4 जुलाई निर्धारित की है।
याचिकाओं में क्या दलीलें दी गई हैं
दोनों आरोपियों ने गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और अन्य दंडात्मक प्रावधानों के तहत दर्ज मामले में ट्रायल कोर्ट के समक्ष नियमित जमानत की माँग की है। शरजील इमाम ने अपनी अर्जी में तर्क दिया कि जनवरी 2026 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनकी जमानत अर्जी खारिज किए जाने के छह महीने से अधिक समय बाद भी मुकदमे में कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है।
याचिका में यह भी कहा गया है कि आरोप तय करने के सवाल पर बहस अभी पूरी नहीं हुई है और इमाम इस मामले में लगभग छह वर्षों से न्यायिक हिरासत में हैं। उमर खालिद ने भी इसी आधार पर ट्रायल कोर्ट में नियमित जमानत की माँग की है। दोनों अर्जियों पर एक साथ सुनवाई हुई, जिसके बाद कोर्ट ने दिल्ली पुलिस का पक्ष जानने के लिए नोटिस जारी किया।
सर्वोच्च न्यायालय की पृष्ठभूमि
इस वर्ष की शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय ने खालिद और इमाम की जमानत अर्जियाँ खारिज कर दी थीं। न्यायालय ने माना था कि अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों से प्रथम दृष्टया ऐसे आधार सामने आते हैं, जिनके कारण यूएपीए की धारा 43डी(5) के तहत जमानत देने पर कानूनी रोक लागू होती है।
इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पाँच अन्य आरोपियों — गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद — को जमानत दे दी थी। हाल ही में तस्लीम अहमद और खालिद सैफी को छह महीने की अंतरिम जमानत भी प्रदान की गई।
यूएपीए जमानत पर संवैधानिक प्रश्न
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बड़ी बेंच को यह महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न भी भेजा है कि क्या यूएपीए की धारा 43डी(5) में दी गई पाबंदियों के बावजूद, लंबे समय तक हिरासत और मुकदमे में विलंब के आधार पर जमानत दी जा सकती है।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि यह प्रश्न भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष रखा जाए ताकि उचित बेंच का गठन हो सके। यह आदेश तब आया जब दिल्ली पुलिस की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एसवी राजू ने दलील दी कि समान स्तर की बेंचों द्वारा 'यूनियन ऑफ इंडिया बनाम केए नजीब' मामले के फैसले की व्याख्या में अंतर दिखाई दे रहा है।
आगे क्या होगा
जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने 'सैयद इफ्तिखार अंद्राबी बनाम राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए)' मामले में आए फैसले पर भी ध्यान दिया, जिसमें एक अन्य समान स्तर की पीठ ने उस फैसले के कुछ पहलुओं पर सवाल उठाए थे। अभियोजन पक्ष के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी किए बिना, न्यायालय ने अहमद और सैफी को अंतरिम जमानत देते हुए माना कि वे पर्याप्त समय तक हिरासत में रह चुके हैं और मुकदमे के शीघ्र समाप्त होने की संभावना नहीं है। ट्रायल कोर्ट में दायर नई याचिकाओं पर 4 जुलाई की सुनवाई से यह स्पष्ट होगा कि दिल्ली पुलिस इस बदलते कानूनी परिदृश्य में क्या रुख अपनाती है।