गुजरात विद्यापीठ में प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग: छात्रों को हर माह 20 घंटे का प्रशिक्षण, रसायन मुक्त कृषि पर जोर
सारांश
मुख्य बातें
अहमदाबाद स्थित गुजरात विद्यापीठ अपने विद्यार्थियों को प्राकृतिक खेती की सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों तरह की ट्रेनिंग दे रहा है, जिसका उद्देश्य युवा पीढ़ी को रसायन मुक्त भोजन और पर्यावरण संरक्षण के प्रति सचेत करना है। संस्थान द्वारा 18 अक्टूबर 2026 को साझा की गई जानकारी के अनुसार, प्रत्येक माह 20 घंटे का प्रशिक्षण दिया जाता है, जिसमें ऑर्गेनिक सब्जियों के उत्पादन से लेकर प्राकृतिक खाद बनाने तक के व्यावहारिक पहलू शामिल हैं।
पाठ्यक्रम में शामिल की गई प्राकृतिक खेती
गुजरात विद्यापीठ के कुलपति डॉ. हर्षद पटेल ने बताया कि संस्थान ने बीआरएस पाठ्यक्रम में प्राकृतिक खेती का विषय शामिल किया है। उन्होंने कहा, 'स्टूडेंट्स को कैंपस में ही इसका प्रत्यक्ष अनुभव मिल सके, इसके लिए प्राकृतिक विधि से सब्जियाँ उगाने की व्यवस्था की गई है। जीवामृत और घन जीवामृत कैसे बनाए जाते हैं, इसे खेती में कैसे उपयोग करते हैं — यह सब सिखाया जा रहा है।'
संस्थान का मार्गदर्शक सूत्र 'स्वास्थ्य, समृद्धि के साथ संपदा संरक्षण' है। इसके अंतर्गत छात्रों को रासायनिक उर्वरकों के दुष्प्रभावों और प्राकृतिक विकल्पों की उपयोगिता के बारे में जानकारी दी जाती है।
बीजामृत से अग्निअस्त्र तक — क्या सीखते हैं छात्र
असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शैलेश चौधरी ने बताया कि प्राकृतिक खेती के तहत बीजामृत, जीवामृत और घन जीवामृत का उपयोग पोषण के लिए किया जाता है। उन्होंने कहा, 'इन्हें यहाँ छात्र स्वयं बनाते हैं। जब फसल तैयार होती है और कीट या बीमारी का प्रश्न उठता है, तो हम अग्निअस्त्र और निमास्त्र का उपयोग करके कीट नियंत्रण करते हैं।'
गाय के गोबर से तैयार इन प्राकृतिक उत्पादों को बनाने की विधि सिखाना पाठ्यक्रम का अभिन्न हिस्सा है। विशेषज्ञों के अनुसार, ये विधियाँ मिट्टी की उर्वरक क्षमता को दीर्घकालिक रूप से बनाए रखती हैं और रासायनिक खेती के मुकाबले भूमि को स्वस्थ रखती हैं।
छात्रों की प्रतिक्रिया
छात्र बिनेश कोठीवार ने बताया, 'यहाँ हमने सीखा कि प्राकृतिक खेती से उपज, जमीन, भोजन और सेहत — सभी में सुधार आ सकता है। हमारी कोशिश है कि पूरे गुजरात में नेचुरल फार्मिंग को लागू किया जाए।'
छात्रा जानवी जादव ने रासायनिक उर्वरकों के खतरों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा, 'इस समय ज़्यादातर केमिकल फर्टिलाइजर का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे कई बीमारियाँ फैल रही हैं। अगर हम प्राकृतिक खेती को महत्व दें और उस पर काम करें तो बेहतर होगा — यहाँ हमने इसका महत्व और तरीका दोनों सीखे।'
आम जनता और कृषि क्षेत्र पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को लेकर चिंता बढ़ रही है और केंद्र व राज्य सरकारें प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत प्रयास कर रही हैं। गौरतलब है कि गुजरात सरकार भी राज्यभर में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन दे रही है।
प्राकृतिक विधि से उगाई गई सब्जियाँ जहाँ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं, वहीं इससे मिट्टी की उर्वरता भी दीर्घकाल तक बनी रहती है। गुजरात विद्यापीठ का यह प्रयास न केवल पाठ्यक्रम में बदलाव का उदाहरण है, बल्कि युवाओं को टिकाऊ खेती (सस्टेनेबल फार्मिंग) अपनाने के लिए प्रेरित करने की दिशा में एक ठोस कदम भी है।
आगे की राह
संस्थान प्रशासन के अनुसार, प्रशिक्षण कार्यक्रम को और विस्तार देने की योजना है ताकि अधिकाधिक छात्र प्राकृतिक खेती के व्यावहारिक ज्ञान से लैस होकर निकल सकें। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की शैक्षणिक पहल भविष्य में कृषि क्षेत्र में सकारात्मक बदलाव की नींव रख सकती है।