2050 तक 50% आबादी को मायोपिया का चश्मा लगेगा: एम्स विशेषज्ञ डॉ. प्रवीण वशिष्ठ की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के कम्युनिटी ऑप्थल्मोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ ने 9 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में चेतावनी दी कि बढ़ते स्क्रीन टाइम और बदलती जीवनशैली के चलते 2050 तक दुनिया की लगभग 50 प्रतिशत आबादी को केवल मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) के कारण चश्मे की आवश्यकता पड़ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के आँकड़ों पर आधारित यह चेतावनी उस समय आई है जब दिल्ली में हर तीन में से एक व्यक्ति पहले से ही दृष्टि सुधार के लिए चश्मे का उपयोग कर रहा है।
दिल्ली की स्थिति और WHO का विश्लेषण उपकरण
डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि WHO जिनेवा की ओर से प्राप्त 'रिफ्रैक्टिव एरर सिचुएशन एनलिसिस टूल' की सहायता से दिल्ली में दृष्टि समस्याओं की व्यापकता, मौजूदा कमियों और संभावित समाधानों का आकलन करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की गई है। उन्होंने कहा, "इस टूल के बाद यह तय किया गया कि पूरी दिल्ली के लिए एक्शन प्लान बनाना चाहिए।" आँकड़ों के अनुसार, दिल्ली में लगभग 30 प्रतिशत लोग — यानी तीन में से एक व्यक्ति — को चश्मे की जरूरत है।
इस कार्यक्रम में केंद्र सरकार के संयुक्त सचिव व अन्य वरिष्ठ अधिकारी, दिल्ली सरकार के राज्य और ज़िला कार्यक्रम अधिकारी, एम्स की पूरी टीम, देशभर के राज्य कार्यक्रम अधिकारी और नेत्र स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न स्वयंसेवी संगठन (NGO) शामिल हैं। कुल मिलाकर लगभग 70 लोगों की टीम इस कार्ययोजना पर काम कर रही है।
बच्चों में बढ़ता मायोपिया — दो दशकों का चिंताजनक रुझान
एम्स के अपने अध्ययनों के हवाले से डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि 2001 में केवल 7 प्रतिशत बच्चों को दृष्टि संबंधी समस्या थी। 2012 के एम्स अध्ययन में यह आँकड़ा बढ़कर 13 प्रतिशत हो गया। अब हाल की स्टडी के अनुसार 20 से 25 प्रतिशत बच्चे दृष्टि दोष से प्रभावित पाए जा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह समस्या केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर तेज़ी से फैल रही है।
डॉ. वशिष्ठ ने मुख्य कारण की ओर इशारा करते हुए कहा कि बच्चे पहले जहाँ घर के बाहर खेलते थे, अब वे घर के अंदर मोबाइल गेम खेलना पसंद करते हैं। पढ़ाई के लिए भी कंप्यूटर, लैपटॉप और मोबाइल का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है। "यह इस समस्या का सबसे बड़ा कारण है," उन्होंने कहा।
दिल्ली के लिए 2030 का लक्ष्य और कार्ययोजना
डॉ. वशिष्ठ ने बताया कि दिल्ली के लिए प्रभावी रिफ्रैक्टिव एरर कवरेज (EREC) में सुधार हेतु 2030 तक का लक्ष्य निर्धारित किया जाएगा। इस रणनीतिक कार्ययोजना को एक दो महीने के भीतर जारी किया जाएगा। योजना का मुख्य उद्देश्य आशा कार्यकर्ताओं और सभी स्वास्थ्य केंद्रों को शामिल करते हुए उन लोगों तक समय पर नेत्र जाँच और चश्मे की सुविधा पहुँचाना है जिन्हें इसकी वास्तव में ज़रूरत है।
गौरतलब है कि यह पहल ऐसे समय में आई है जब डॉ. वशिष्ठ और उनकी टीम पिछले 25 30 वर्षों से दृष्टि समस्याओं की बढ़ती दर को दस्तावेजीकृत कर रही है। यह कार्यक्रम केवल दिल्ली के लिए नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय मॉडल के रूप में विकसित किया जा रहा है।
आम जनता और बच्चों पर असर
विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर दृष्टि जाँच न होने से बच्चों की शैक्षणिक क्षमता और वयस्कों की कार्यक्षमता प्रभावित होती है। दिल्ली जैसे महानगर में जहाँ स्क्रीन पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, वहाँ यह समस्या और भी तेज़ी से विकराल रूप ले सकती है। कार्ययोजना में आशा कार्यकर्ताओं की भूमिका को विशेष महत्त्व दिया जा रहा है, ताकि ज़मीनी स्तर पर जाँच और चश्मे का वितरण सुनिश्चित हो सके।
डॉ. वशिष्ठ और उनकी टीम को उम्मीद है कि विस्तृत एक्शन प्लान जारी होने के बाद इस समस्या से निपटने में तेज़ी आएगी और दिल्ली का यह मॉडल देशभर में अपनाया जा सकेगा।