भूपेन हजारिका शताब्दी समापन: CM हिमंता सरमा ने भारत मंडपम में तैयारियों का किया निरीक्षण
सारांश
मुख्य बातें
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने 27 सितंबर 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम का दौरा कर भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की 100वीं जयंती के भव्य समापन कार्यक्रम की तैयारियों का बारीकी से जायजा लिया। उन्होंने कार्यक्रम स्थल पर उपलब्ध सुविधाओं, व्यवस्थाओं और आयोजन की समग्र तैयारी की समीक्षा की।
मुख्यमंत्री की समीक्षा और एक्स पर संदेश
मुख्यमंत्री सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपने दौरे की जानकारी साझा करते हुए लिखा, 'भारत मंडपम का दौरा कर भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका के शताब्दी समारोह के भव्य समापन कार्यक्रम के लिए सुविधाओं और तैयारियों की समीक्षा की। हम 'सुधाकंठ' की विरासत के अनुरूप एक ऐसा यादगार सम्मान समारोह तैयार कर रहे हैं, जो उनके योगदान के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।'
यह समापन समारोह वर्षभर चले आयोजनों की अंतिम कड़ी होगी। इस अवसर पर सांस्कृतिक जगत से जुड़े कलाकारों, गणमान्य हस्तियों और विशिष्ट अतिथियों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है।
भूपेन हजारिका: एक अतुलनीय सांस्कृतिक विरासत
भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम में हुआ था। अपनी विशिष्ट संगीत शैली और मर्मस्पर्शी रचनाओं के लिए 'सुधाकंठ' के नाम से प्रसिद्ध हजारिका ने मानवता, सामाजिक एकता, समानता और आम लोगों की ज़िंदगी के सवालों को अपने गीतों के माध्यम से पूरी दुनिया तक पहुँचाया।
उनकी रचनाओं में पूर्वोत्तर की लोक संस्कृति और सामाजिक अनुभवों की गहरी छाप थी। उनका प्रभाव असम और पूर्वोत्तर तक सीमित नहीं रहा — वे देशभर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मानित कलाकार रहे।
सम्मान और पुरस्कार
भूपेन हजारिका को 2019 में मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। इससे पहले उन्हें पद्म विभूषण और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए थे। संगीत के अलावा उन्होंने फिल्म निर्माण और साहित्य के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय योगदान दिया।
समापन समारोह का महत्व
भारत मंडपम में आयोजित होने वाला यह समापन कार्यक्रम 100वीं जयंती वर्ष के सभी आयोजनों का केंद्रबिंदु होगा। इस मंच पर हजारिका के जीवन, उनके संगीत और उनकी सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर विशेष रूप से याद किया जाएगा। गौरतलब है कि इस प्रकार के शताब्दी समारोह न केवल किसी व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देते हैं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत से जोड़ने का काम भी करते हैं।
यह आयोजन इस बात का भी प्रतीक है कि भारत की सांस्कृतिक विविधता में पूर्वोत्तर का योगदान राष्ट्रीय चेतना का अभिन्न हिस्सा है — एक संदेश जिसे इस समारोह के माध्यम से और मजबूती से रेखांकित किया जाएगा।