दयारा बुग्याल ट्रेक पर लापता बबीता पांडे: पाँच दिन बाद भी सुराग नहीं, दादी की प्रशासन से गुहार
सारांश
मुख्य बातें
उत्तरकाशी के दयारा बुग्याल ट्रेक मार्ग पर 24 वर्षीय बबीता पांडे के लापता हुए पाँच दिन बीत चुके हैं, लेकिन अब तक उनका कोई सुराग नहीं मिला है। नैनीताल जिले के रामनगर निवासी इस युवती की तलाश में जिला प्रशासन, वन विभाग और पुलिस संयुक्त रूप से सर्च अभियान चला रहे हैं, जबकि परिवार ने प्रशासन से जल्द से जल्द उन्हें सकुशल खोज निकालने की अपील की है।
दादी की पीड़ा — 'हमारी पोती को ढूंढ लाओ'
बबीता की दादी लक्ष्मी पांडे ने गहरी पीड़ा के साथ कहा, 'हमारी मांग है कि हमारी पोती को सकुशल खोज कर लाया जाए। हम लोग काफी परेशान हैं। बबीता वहाँ घूमने गई थी और अब लापता हो गई है।' उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्य भी खुद तलाश में निकले हैं, परंतु कोई परिणाम नहीं निकला। लक्ष्मी पांडे ने कहा, 'हमको क्या पता था कि उसके साथ ऐसा हो जाएगा।'
पिता की बेबसी — चलने में असमर्थ, प्रशासन पर टिकी उम्मीद
बबीता के पिता गोपाल पांडे ने बताया कि पाँच दिन बीत जाने के बाद भी बेटी की कोई खबर नहीं है। उन्होंने कहा, 'हमारा प्रशासन से कहना है कि जल्द से जल्द उसकी तलाश की जाए।' गोपाल पांडे ने यह भी बताया कि उनके पैरों में दिक्कत है जिस कारण वे स्वयं तलाश में नहीं जा पा रहे, इसलिए बबीता की माँ और भाई खोज अभियान में जुटे हुए हैं।
कौन हैं बबीता पांडे
गोपाल पांडे के अनुसार, बबीता एमबीए फाइनल ईयर की छात्रा थीं और पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी भी करती थीं। वे उत्तरकाशी स्थित दयारा बुग्याल ट्रेक पर भ्रमण के उद्देश्य से गई थीं। यह क्षेत्र समुद्र तल से लगभग 3,408 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है और ट्रेकिंग के लिए लोकप्रिय है, लेकिन दुर्गम भूगोल के कारण खोज अभियान चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
सर्च ऑपरेशन की स्थिति
जिला प्रशासन, वन विभाग और पुलिस विभिन्न एजेंसियों के साथ मिलकर लगातार तलाशी अभियान चला रहे हैं। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में ट्रेकिंग सीजन अपने चरम पर होता है और हर वर्ष कई पर्यटक दुर्गम पहाड़ी रास्तों पर रास्ता भटक जाते हैं। गौरतलब है कि दयारा बुग्याल क्षेत्र में नेटवर्क कनेक्टिविटी अत्यंत सीमित है, जिससे खोज कार्य और कठिन हो जाता है।
आगे क्या
परिवार और प्रशासन दोनों की निगाहें अब सर्च टीम पर टिकी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊँचाई वाले ट्रेक पर लापता होने की स्थिति में पहले 72 घंटे सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। पाँच दिन बीत जाने के बाद भी अभियान जारी रहना प्रशासन की प्रतिबद्धता को दर्शाता है, लेकिन परिजनों की चिंता हर बीतते घंटे के साथ बढ़ती जा रही है।