बालाघाट में जहरीली कुएं की गैस से दो किसानों की मौत, दो सप्ताह में तीसरी ऐसी घटना
सारांश
मुख्य बातें
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में 10 जुलाई 2026 की शाम किरनापुर थाना क्षेत्र के पिपरटोला गांव में एक कुएं के भीतर जहरीली गैस की चपेट में आने से दो किसानों की मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, मोटर पंप ठीक करने उतरे एक किसान को बचाने की कोशिश में दूसरे किसान ने भी कुएं में छलांग लगाई और दोनों की जान चली गई। यह बालाघाट जिले में करीब दो सप्ताह के भीतर इस तरह की तीसरी घटना है।
घटनाक्रम: कैसे हुई दोहरी त्रासदी
पुलिस के अनुसार, 45 वर्षीय महेश चौधरी अपने मित्र युवराज बिसेन के घर के पीछे स्थित करीब 50 फीट गहरे कुएं में मोटर पंप दुरुस्त करने के लिए उतरे। कुएं के भीतर पहुँचते ही ऑक्सीजन की कमी और जहरीली गैस के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी और वे बेहोश होकर गिर पड़े।
महेश को संकट में देख युवराज बिसेन भी उन्हें बचाने के लिए कुएं में उतर गए, लेकिन वे भी जहरीली गैस की चपेट में आ गए। मदद पहुँचने से पहले ही दोनों की मृत्यु कुएं के भीतर हो गई।
राज्य आपदा बल की पाँच घंटे की मशक्कत
घटना की सूचना मिलते ही किरनापुर पुलिस मौके पर पहुँची। कुएं में जहरीली गैस की आशंका को देखते हुए बालाघाट से राज्य आपदा आपातकालीन प्रतिक्रिया बल (SDRF) की टीम बुलाई गई। SDRF के जवान करण सिंह वाल्के ने ऑक्सीजन सिलेंडर और सुरक्षा मास्क पहनकर कुएं में उतरकर करीब पाँच घंटे की कड़ी मेहनत के बाद रस्सियों की सहायता से दोनों शव बाहर निकाले। शव रात करीब 10 से 10:30 बजे के बीच बाहर आए।
किरनापुर थाना प्रभारी राजकुमार चौधरी ने बताया कि पंचनामा कार्रवाई पूरी होने के बाद दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेजा गया। पोस्टमार्टम के उपरांत शव परिजनों को सौंपे जाएंगे।
दो सप्ताह में तीसरी घटना — पैटर्न चिंताजनक
यह ऐसे समय में आया है जब बालाघाट जिला पहले से ही कुओं में जहरीली गैस से होने वाली मौतों के सिलसिले से जूझ रहा है। 25 जून को सितकुटोला गांव में एक 50 वर्षीय व्यक्ति की इसी प्रकार कुएं में जहरीली गैस से मौत हुई थी। इसके बाद 8 जुलाई को मरारीटोला गांव में भी एक व्यक्ति की जान गई। अब 10 जुलाई को पिपरटोला में दो और मौतें — यानी महज 15 दिनों में जिले में चार लोगों की जान जा चुकी है।
गौरतलब है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कुओं की सफाई या मरम्मत के दौरान पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों के अभाव में यह दुर्घटनाएँ बार-बार होती हैं। जल संसाधन विशेषज्ञों के अनुसार, बंद या गहरे कुओं में कार्बन डाइऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी गैसें जमा हो जाती हैं, जो बिना उचित जाँच के उतरने पर जानलेवा साबित होती हैं।
आम जनता और प्रशासन पर असर
लगातार हो रही इन घटनाओं ने जिला प्रशासन की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर जागरूकता और सुरक्षा प्रोटोकॉल की कमी स्पष्ट दिख रही है। आने वाले दिनों में प्रशासन द्वारा ग्रामीणों को कुओं में उतरने से पहले सावधानी बरतने के निर्देश जारी किए जाने की संभावना है।