बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना ही असली पार्टी: शिवसेना (यूबीटी) का अमित शाह के बयान पर पलटवार
सारांश
मुख्य बातें
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने 21 जून को स्पष्ट किया कि देश में केवल एक ही शिवसेना है — वह जिसकी स्थापना हिंदू हृदय सम्राट बालासाहेब ठाकरे ने 19 जून 1966 को की थी। यह बयान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे के जवाब में आया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अब केवल एक ही शिवसेना है और वह मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में कार्यरत है।
मूल पार्टी बनाम गुट का विवाद
दुबे ने कहा कि चुनाव आयोग में राजनीतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर किसी गुट को मान्यता दिलाई जा सकती है, लेकिन इससे वह मूल पार्टी नहीं बन जाती। उन्होंने तर्क दिया कि दल-बदल और राजनीतिक खरीद-फरोख्त के ज़रिए विभिन्न गुट खड़े किए जा सकते हैं, परंतु इससे किसी संगठन की वैचारिक पहचान नहीं बदलती।
दुबे के अनुसार, शिवसेना की स्थापना मराठी मानुष के सम्मान, हिंदुत्व के विस्तार और राष्ट्र की रक्षा के उद्देश्य से हुई थी, और वही संगठन आज भी वास्तविक शिवसेना है।
ऐतिहासिक तुलना से दुबे का तर्क
दुबे ने देश की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी भी दल को जनमानस में स्थापित होने में वर्षों लगते हैं। उन्होंने बताया कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) का गठन 1980 में हुआ, जबकि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस) का इतिहास देश की आज़ादी से भी पुराना है। इसी तरह समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और तृणमूल कांग्रेस (TMC) जैसी पार्टियों को भी स्थापित हुए 25 वर्ष से अधिक समय हो चुका है।
उनका कहना था कि ऐसे में किसी गुट को अचानक मूल पार्टी के रूप में प्रस्तुत करना राजनीतिक वास्तविकताओं के विरुद्ध है। दुबे ने सीधे कहा कि गृह मंत्री अमित शाह को यह स्वीकार करना चाहिए कि एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाला संगठन एक गुट है, न कि मूल शिवसेना।
महायुति सरकार पर आरोप
दुबे ने महाराष्ट्र की महायुति सरकार पर भी निशाना साधा। उनका आरोप था कि सत्तारूढ़ गठबंधन विपक्षी विधायकों को विकास कार्यों के लिए पर्याप्त फंड नहीं देता, जबकि सत्ता पक्ष के विधायकों को अधिक धनराशि उपलब्ध कराई जाती है। उन्होंने कहा कि पहले इस प्रकार की राजनीतिक भेदभावपूर्ण नीति नहीं अपनाई जाती थी और विकास निधि का वितरण अपेक्षाकृत निष्पक्ष तरीके से होता था।
दुबे ने स्पष्ट किया कि सरकारी फंड जनता के कल्याण के लिए होता है, इसलिए उसके वितरण में किसी भी प्रकार का राजनीतिक भेदभाव अस्वीकार्य है।
आगे क्या
शिवसेना की 'असली' पहचान को लेकर यह विवाद महाराष्ट्र की राजनीति में नई तीव्रता ला सकता है, विशेषकर तब जब आगामी स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियाँ शुरू हो रही हैं। शिवसेना (यूबीटी) और शिंदे गुट के बीच वैधता की यह लड़ाई अदालती और जनमत — दोनों मोर्चों पर जारी रहने की संभावना है।