4 अगस्त 2026
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शिवसेना के 60 साल: उद्धव गुट का संदेश — 'यह मुंबई हमारी है, विरोधी कभी मिटा नहीं सके'

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शिवसेना के 60 साल: उद्धव गुट का संदेश — 'यह मुंबई हमारी है, विरोधी कभी मिटा नहीं सके'

सारांश

शिवसेना के 60 साल — और उद्धव गुट का संदेश एकदम स्पष्ट है। 'सामना' संपादकीय ने बिना नाम लिए छह सांसदों की बगावत और समानांतर 'सेनाओं' पर निशाना साधा। बालासाहेब की विरासत को ढाल बनाकर उद्धव गुट ने दावा किया — असली शिवसेना वही है जो कारोबार नहीं, बलिदान पर टिकी है।

मुख्य बातें

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने 19 जून 2026 को पार्टी की 60वीं वर्षगांठ मनाई।
मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में छह सांसदों की बगावत का नाम लिए बिना 'व्यावसायिक सोच से प्रेरित नकली संगठनों' पर निशाना साधा गया।
बालासाहेब ठाकरे के कथन — 'मेरी पीठ पर इतने घाव हो चुके हैं कि नए घाव के लिए जगह नहीं बची' — को पार्टी की अडिग यात्रा का प्रतीक बताया गया।
संपादकीय में मराठी अस्मिता , हिंदुत्व और अयोध्या आंदोलन में शिवसेना के योगदान को रेखांकित किया गया।
उद्धव गुट ने 'नेशन फर्स्ट' को शिवसेना का स्थायी मंत्र बताते हुए खुद को असली शिवसेना घोषित किया।

शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) गुट ने 19 जून 2026 को पार्टी की 60वीं वर्षगांठ पर विरोधियों को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि छह दशकों में शिवसेना को तोड़ने के अनगिनत प्रयास हुए, लेकिन बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा और नींव अडिग बनी रही। पार्टी के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में यह भी दावा किया गया कि विरोधियों के भय से ही समय-समय पर समानांतर 'सेनाएँ' खड़ी की गईं, जो एक-एक कर खत्म होती रहीं।

मुखपत्र 'सामना' का संदेश

पार्टी के आधिकारिक मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में हाल ही में हुई छह सांसदों की बगावत का नाम लिए बिना कहा गया कि आज भी व्यावसायिक सोच से प्रेरित कई नकली संगठन खड़े किए जा रहे हैं। संपादकीय के अनुसार, शिवसेना की स्थापना कभी व्यापारिक सौदे के रूप में नहीं हुई — बालासाहेब ठाकरे ने पार्टी को कभी कारोबार नहीं बनने दिया। इसीलिए अवसरवादी और सौदेबाजी करने वाले लोगों को समय-समय पर बाहर का रास्ता दिखाया गया, ताकि मराठी अस्मिता और हिंदुत्व की विचारधारा शुद्ध बनी रहे।

मराठी अस्मिता और जनसेवा की विरासत

संपादकीय में कहा गया कि शिवसेना ने मराठी समाज को स्वाभिमान के साथ जीना सिखाया और लोगों में यह आत्मविश्वास जगाया कि वे कह सकें, 'यह मुंबई हमारी है।' पार्टी ने आम लोगों को पार्षद बनाया और शाखाओं का ऐसा मजबूत नेटवर्क खड़ा किया, जो जनता के लिए पारिवारिक न्यायालय की तरह काम करता था। सड़क, पानी, स्कूल में प्रवेश, अस्पताल में सहायता और राशन कार्ड जैसी समस्याओं के समाधान के लिए शिवसैनिक दिन-रात सेवा में जुटे रहते थे।

संपादकीय के अनुसार, चाहे स्थानीय दुर्घटना हो या बम विस्फोट, शिवसैनिक हमेशा राहत कार्य में सबसे पहले पहुँचते थे। रक्तदान शिविर, शिक्षा अभियान, स्वास्थ्य शिविर और मुफ्त किताब-कॉपी वितरण जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से पार्टी हर घर तक पहुँची और मजदूरों व श्रमिकों का सबसे बड़ा सहारा बनी।

विश्वासघात और अडिग संकल्प

उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले गुट ने आरोप लगाया कि हाल के वर्षों में महाराष्ट्र के इस गौरव को खत्म करने और राज्य के स्वाभिमान को कमजोर करने की कोशिशें तेज हुई हैं। संपादकीय में बालासाहेब ठाकरे के उस कथन का भी उल्लेख किया गया जिसमें उन्होंने कहा था, 'मेरी पीठ पर इतने घाव हो चुके हैं कि अब नए घाव के लिए भी जगह नहीं बची।' इसे राजनीतिक विश्वासघात के बावजूद पार्टी की अटूट यात्रा का प्रतीक बताया गया।

संपादकीय में यह भी कहा गया कि 60वें वर्ष में प्रवेश करते समय पार्टी के मन में एक पीड़ा भी है — जहाँ समर्पित कार्यकर्ताओं की बड़ी सेना हमेशा पार्टी के साथ खड़ी रही, वहीं कुछ अवसरवादी और स्वार्थी लोग निजी लाभ के लिए पार्टी छोड़कर चले गए, जिसे वर्तमान राजनीति में नैतिकता के पतन का प्रतीक बताया गया।

हिंदुत्व और राष्ट्र-प्रथम की विचारधारा

संपादकीय में कहा गया कि जिस तरह शिवसेना ने सह्याद्रि की घाटियों में मराठी अस्मिता का संदेश फैलाया, उसी तरह हिंदुत्व का शंखनाद कर पूरे हिंदू समाज को जागृत किया। मलंगगढ़ से लेकर अयोध्या आंदोलन तक हिंदुत्व की लड़ाई में शिवसेना ने बड़े बलिदान दिए। संपादकीय में सवाल उठाया गया कि जो लोग आज खुद को हिंदुत्व का सबसे बड़ा समर्थक बताते हैं, क्या वे उस योगदान का एक अंश भी दे पाए हैं।

संपादकीय के अंत में छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत का उल्लेख करते हुए कहा गया कि उसी परंपरा को बालासाहेब ठाकरे ने आगे बढ़ाया। 'नेशन फर्स्ट' (राष्ट्र प्रथम) शिवसेना का स्थायी मंत्र रहा है और भविष्य में भी गूंजता रहेगा।

राजनीतिक संदर्भ और आगे की राह

गौरतलब है कि शिवसेना में 2022 की विभाजनकारी उठापटक के बाद से उद्धव गुट और एकनाथ शिंदे गुट के बीच पार्टी नाम, चुनाव चिह्न और विचारधारा पर विवाद जारी है। 60वीं वर्षगांठ के अवसर पर उद्धव गुट का यह संदेश स्पष्ट करता है कि वह खुद को ही असली शिवसेना मानता है और आने वाले चुनावों में इसी आधार पर जनता के बीच जाएगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि 2022 के विभाजन के बाद से जारी वैधता की लड़ाई का नया अध्याय है। उद्धव गुट बालासाहेब की विरासत को ढाल बनाकर शिंदे गुट और भाजपा पर 'व्यावसायिक राजनीति' का आरोप लगाता है — लेकिन विडंबना यह है कि चुनाव आयोग ने पार्टी नाम और चुनाव चिह्न शिंदे गुट को दे दिया है। असली सवाल यह है कि क्या विचारधारा की दावेदारी मतदाताओं को वापस लाने के लिए पर्याप्त है, या उद्धव गुट को संगठनात्मक ज़मीन पर नए सिरे से काम करना होगा। 60वीं वर्षगांठ का यह संदेश जितना विरोधियों के लिए है, उतना ही अपने कार्यकर्ताओं के मनोबल को बनाए रखने के लिए भी।
RashtraPress
4 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शिवसेना की 60वीं वर्षगांठ पर उद्धव गुट ने क्या संदेश दिया?
उद्धव गुट ने अपने मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में कहा कि बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा और नींव छह दशकों में अडिग रही और विरोधी कभी शिवसेना को मिटा नहीं सके। पार्टी ने 'यह मुंबई हमारी है' के नारे के साथ मराठी अस्मिता की विरासत को दोहराया।
'सामना' संपादकीय में छह सांसदों की बगावत का उल्लेख क्यों नहीं किया गया?
संपादकीय में हाल की बगावत का सीधे नाम नहीं लिया गया, लेकिन 'व्यावसायिक सोच से प्रेरित नकली संगठनों' और 'अवसरवादी लोगों' का संदर्भ स्पष्ट रूप से इसी घटनाक्रम की ओर इशारा करता है। यह उद्धव गुट की रणनीतिक भाषा है — सीधे टकराव की बजाय विचारधारा के आधार पर वैधता का दावा।
शिवसेना (उद्धव गुट) और शिंदे गुट के बीच विवाद की पृष्ठभूमि क्या है?
2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में बड़ी संख्या में विधायकों और सांसदों के अलग होने के बाद शिवसेना दो गुटों में बंट गई। चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और धनुष-बाण चुनाव चिह्न शिंदे गुट को आवंटित किया, जबकि उद्धव गुट 'शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)' नाम से राजनीति कर रहा है।
बालासाहेब ठाकरे के किस कथन का संपादकीय में उल्लेख किया गया?
संपादकीय में बालासाहेब ठाकरे का वह कथन उद्धृत किया गया जिसमें उन्होंने कहा था, 'मेरी पीठ पर इतने घाव हो चुके हैं कि अब नए घाव के लिए भी जगह नहीं बची।' इसे राजनीतिक विश्वासघात के बावजूद पार्टी की अडिग यात्रा का प्रतीक बताया गया।
शिवसेना की 60वीं वर्षगांठ का राजनीतिक महत्व क्या है?
यह वर्षगांठ ऐसे समय में आई है जब उद्धव गुट पार्टी नाम, चुनाव चिह्न और विचारधारा की वैधता की लड़ाई लड़ रहा है। 60वें वर्ष का यह संदेश आने वाले चुनावों से पहले कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने और मतदाताओं को 'असली शिवसेना' का संदेश देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।
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