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बीएयू सबौर के वैज्ञानिकों ने आम की गुठलियों से बनाया पाउडर और बटर ऑयल, किसानों को मिलेगा नया आय स्रोत

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बीएयू सबौर के वैज्ञानिकों ने आम की गुठलियों से बनाया पाउडर और बटर ऑयल, किसानों को मिलेगा नया आय स्रोत

सारांश

बीएयू सबौर के वैज्ञानिकों ने आम की गुठलियों — जो फल के कुल आकार का 10 से 23 प्रतिशत होती हैं — से पाउडर और बटर ऑयल बनाने की तकनीक विकसित की है। 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' और 'कोल्ड-प्रेस एक्सट्रैक्शन' पर आधारित यह पहल कृषि अपशिष्ट को उद्योग के लिए कच्चे माल में बदल सकती है।

मुख्य बातें

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर ने आम की गुठलियों से पाउडर और बटर ऑयल तैयार करने की नई तकनीक विकसित की है।
तकनीक में 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' और 'कोल्ड-प्रेस एक्सट्रैक्शन' विधियों का उपयोग किया गया है।
आम के कुल आकार का 10 से 23 प्रतिशत हिस्सा गुठली का होता है, जो अब तक मुख्यतः अपशिष्ट के रूप में जाता था।
ये उत्पाद खाद्य, कॉस्मेटिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और बायोटेक्नोलॉजी उद्योगों के लिए उपयोगी बताए गए हैं।
विश्वविद्यालय की योजना इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर पूरे देश में लागू करने की है।

बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के वैज्ञानिकों ने 7 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण कृषि नवाचार की जानकारी दी — आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों से पाउडर और बटर ऑयल तैयार करने की नई तकनीक विकसित की गई है। यह पहल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों में बदलने की दिशा में एक ठोस कदम है, जिससे किसानों और उद्यमियों के लिए आय के नए रास्ते खुलने की संभावना है।

तकनीक की विशेषताएँ

इस नवाचार में वैज्ञानिकों ने 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' और 'कोल्ड-प्रेस एक्सट्रैक्शन' तकनीकों का उपयोग किया है। बागवानी विभाग के चेयरमैन डॉ. अहमार आफताब ने बताया कि आम के कुल आकार का लगभग 10 से 23 प्रतिशत हिस्सा गुठली का होता है, जो अब तक बड़े पैमाने पर अनुपयोगी रहता था। गुठली के अंदर की गिरी में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनका दोहन अब संभव हो सका है।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. कंचन कुमारी ने बताया कि आम के गूदे से पेय पदार्थ तैयार करने के बाद बड़ी मात्रा में गुठलियाँ शेष रह जाती हैं। इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता है, फिर आधुनिक तकनीकों की सहायता से प्रसंस्करण कर पाउडर और बटर ऑयल तैयार किया जाता है।

नवाचार की पृष्ठभूमि

नेचर क्लब के सचिव एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. अवधेश पॉल ने बताया कि विश्वविद्यालय का नेचर क्लब पहले से ही पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से विभिन्न फलों की गुठलियाँ एकत्रित करता था और बच्चों को पौधारोपण के प्रति जागरूक करता था। इसी अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने गुठलियों के वैकल्पिक औद्योगिक उपयोग पर शोध शुरू किया, जिससे यह सफलता मिली। गौरतलब है कि पहले इन गुठलियों का उपयोग मुख्यतः ग्राफ्टिंग के लिए रूटस्टॉक तैयार करने में होता था — और उसके बाद भी बड़ी मात्रा में गुठलियाँ अनुपयोगी रह जाती थीं।

आम जनता और उद्योग पर असर

वैज्ञानिकों के अनुसार ये उत्पाद खाद्य, कॉस्मेटिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे उद्योगों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। डॉ. कंचन कुमारी ने कहा कि इस पहल से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अपशिष्ट का बेहतर उपयोग संभव होगा, किसानों और उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर बनेंगे, तथा पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ वेस्ट मैनेजमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कृषि अपशिष्ट प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

व्यावसायिक विस्तार की योजना

विश्वविद्यालय की योजना इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर पूरे देश में लागू करने की है। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है, तो आम उत्पादन के मौसम में निकलने वाला अपशिष्ट एक मूल्यवान कच्चे माल में परिवर्तित हो सकता है, जिससे छोटे उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों को भी लाभ मिलने की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली कसौटी तब होगी जब यह तकनीक प्रयोगशाला से निकलकर किसानों के खेत और छोटे उद्यमियों की इकाइयों तक पहुँचे। भारत में आम उत्पादन प्रतिवर्ष करोड़ों टन में होता है और गुठलियों की भारी मात्रा अनुपयोगी रहती है — इस पैमाने पर तकनीक का व्यावसायिक क्रियान्वयन एक जटिल चुनौती है। 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' जैसी तकनीकें ऊर्जा-गहन हो सकती हैं, इसलिए लागत-लाभ का विश्लेषण सार्वजनिक होना ज़रूरी है। बिना स्पष्ट मूल्य-शृंखला और बाज़ार संपर्क के, यह शोध केवल एक और अकादमिक उपलब्धि बनकर रह सकता है।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बीएयू सबौर ने आम की गुठलियों से कौन-से उत्पाद बनाए हैं?
बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर के वैज्ञानिकों ने आम की गुठलियों से पाउडर और बटर ऑयल तैयार किया है। इन उत्पादों को खाद्य, कॉस्मेटिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और बायोटेक्नोलॉजी उद्योगों के लिए उपयोगी बताया गया है।
इस तकनीक में किन विधियों का उपयोग किया गया है?
इस नवाचार में 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' और 'कोल्ड-प्रेस एक्सट्रैक्शन' तकनीकों का उपयोग किया गया है। गुठलियों को पहले धूप में सुखाया जाता है, फिर इन आधुनिक विधियों से प्रसंस्करण कर पाउडर और बटर ऑयल निकाला जाता है।
आम की गुठलियाँ पहले किस काम आती थीं?
पहले आम की गुठलियाँ मुख्यतः ग्राफ्टिंग के लिए रूटस्टॉक तैयार करने में उपयोग होती थीं। इसके बाद भी बड़ी मात्रा में गुठलियाँ अनुपयोगी रह जाती थीं, क्योंकि आम के कुल आकार का 10 से 23 प्रतिशत हिस्सा गुठली का होता है।
इस पहल से किसानों और उद्यमियों को क्या फायदा होगा?
वैज्ञानिकों के अनुसार इस तकनीक से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अपशिष्ट का बेहतर उपयोग संभव होगा और किसानों व उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर बनेंगे। साथ ही पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ वेस्ट मैनेजमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा।
क्या यह तकनीक पूरे देश में लागू होगी?
बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर की योजना इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर पूरे देश में लागू करने की है। हालाँकि, क्रियान्वयन की समय-सीमा और विस्तार की विस्तृत रूपरेखा अभी सार्वजनिक नहीं की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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