बीएयू सबौर के वैज्ञानिकों ने आम की गुठलियों से बनाया पाउडर और बटर ऑयल, किसानों को मिलेगा नया आय स्रोत
सारांश
मुख्य बातें
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) सबौर के वैज्ञानिकों ने 7 जुलाई 2026 को एक महत्वपूर्ण कृषि नवाचार की जानकारी दी — आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों से पाउडर और बटर ऑयल तैयार करने की नई तकनीक विकसित की गई है। यह पहल खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अपशिष्ट को उपयोगी उत्पादों में बदलने की दिशा में एक ठोस कदम है, जिससे किसानों और उद्यमियों के लिए आय के नए रास्ते खुलने की संभावना है।
तकनीक की विशेषताएँ
इस नवाचार में वैज्ञानिकों ने 'रिफ्रैक्टेंस विंडो ड्राइंग' और 'कोल्ड-प्रेस एक्सट्रैक्शन' तकनीकों का उपयोग किया है। बागवानी विभाग के चेयरमैन डॉ. अहमार आफताब ने बताया कि आम के कुल आकार का लगभग 10 से 23 प्रतिशत हिस्सा गुठली का होता है, जो अब तक बड़े पैमाने पर अनुपयोगी रहता था। गुठली के अंदर की गिरी में कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जिनका दोहन अब संभव हो सका है।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. कंचन कुमारी ने बताया कि आम के गूदे से पेय पदार्थ तैयार करने के बाद बड़ी मात्रा में गुठलियाँ शेष रह जाती हैं। इन्हें पहले धूप में सुखाया जाता है, फिर आधुनिक तकनीकों की सहायता से प्रसंस्करण कर पाउडर और बटर ऑयल तैयार किया जाता है।
नवाचार की पृष्ठभूमि
नेचर क्लब के सचिव एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. अवधेश पॉल ने बताया कि विश्वविद्यालय का नेचर क्लब पहले से ही पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से विभिन्न फलों की गुठलियाँ एकत्रित करता था और बच्चों को पौधारोपण के प्रति जागरूक करता था। इसी अभियान के दौरान वैज्ञानिकों ने गुठलियों के वैकल्पिक औद्योगिक उपयोग पर शोध शुरू किया, जिससे यह सफलता मिली। गौरतलब है कि पहले इन गुठलियों का उपयोग मुख्यतः ग्राफ्टिंग के लिए रूटस्टॉक तैयार करने में होता था — और उसके बाद भी बड़ी मात्रा में गुठलियाँ अनुपयोगी रह जाती थीं।
आम जनता और उद्योग पर असर
वैज्ञानिकों के अनुसार ये उत्पाद खाद्य, कॉस्मेटिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और बायोटेक्नोलॉजी जैसे उद्योगों के लिए उपयोगी साबित हो सकते हैं। डॉ. कंचन कुमारी ने कहा कि इस पहल से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के अपशिष्ट का बेहतर उपयोग संभव होगा, किसानों और उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर बनेंगे, तथा पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ वेस्ट मैनेजमेंट को भी बढ़ावा मिलेगा। यह ऐसे समय में आया है जब देश में कृषि अपशिष्ट प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
व्यावसायिक विस्तार की योजना
विश्वविद्यालय की योजना इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर पूरे देश में लागू करने की है। यदि यह तकनीक बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है, तो आम उत्पादन के मौसम में निकलने वाला अपशिष्ट एक मूल्यवान कच्चे माल में परिवर्तित हो सकता है, जिससे छोटे उद्यमियों और स्वयं सहायता समूहों को भी लाभ मिलने की संभावना है।