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पद्मश्री डॉ. बीएस ढिल्लों: प्राकृतिक और आधुनिक खेती के संतुलन से ही बनेगा भारत का कृषि भविष्य

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पद्मश्री डॉ. बीएस ढिल्लों: प्राकृतिक और आधुनिक खेती के संतुलन से ही बनेगा भारत का कृषि भविष्य

सारांश

पद्मश्री डॉ. बीएस ढिल्लों ने भागलपुर में साफ़ कहा — प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीक एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। पंजाब में 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन का हवाला देते हुए उन्होंने किसानों को लागत और लाभ दोनों देखने की सलाह दी।

मुख्य बातें

बीएस ढिल्लों ने 26 जून 2026 को भागलपुर में कृषि के भविष्य पर अपने विचार साझा किए।
उन्होंने प्राकृतिक-ऑर्गेनिक खेती और आधुनिक तकनीक के संतुलित उपयोग को भारतीय कृषि की मज़बूती के लिए अनिवार्य बताया।
पंजाब में प्रति हेक्टेयर लगभग 120 क्विंटल गेहूं उत्पादन का उदाहरण देते हुए कहा कि प्राकृतिक खेती में लागत कम होने से लाभ बढ़ सकता है।
AI, बायोटेक्नोलॉजी और नैनो टेक्नोलॉजी को कृषि में क्रांतिकारी बदलाव लाने में सक्षम बताया, लेकिन निवेश की ज़रूरत भी रेखांकित की।
छोटे और सीमांत किसानों को विशेष सहायता और जल संकट के समाधान को नीति निर्माण की प्राथमिकता बताया।

पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक और पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर डॉ. बीएस ढिल्लों ने 26 जून 2026 को भागलपुर में कहा कि भारत की कृषि व्यवस्था को दीर्घकालिक रूप से सशक्त बनाने के लिए प्राकृतिक-ऑर्गेनिक खेती और आधुनिक तकनीकों का संतुलित समन्वय अनिवार्य है। उनके अनुसार, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तकनीकी नवाचार के बिना भारतीय कृषि न तो टिकाऊ बन सकती है और न ही लाभकारी।

मुख्य वक्तव्य और कृषि दर्शन

डॉ. ढिल्लों ने कहा कि भारतीय कृषि परंपरा केवल भूमि तक सीमित नहीं है — यह एक 'सांस्कृतिक और वैज्ञानिक धरोहर' है। उन्होंने कृषि विश्वविद्यालयों को 'मंदिर के समान' बताते हुए कहा कि इन संस्थानों का वास्तविक उद्देश्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसानों की आय और जीवन स्तर को ऊँचा उठाना है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनका बिहार और पंजाब दोनों राज्यों से गहरा जुड़ाव रहा है और यह उनकी बिहार की पहली यात्रा नहीं थी।

उत्पादन बनाम लाभ: किसानों के लिए असली सवाल

डॉ. ढिल्लों ने एक महत्वपूर्ण आर्थिक तथ्य की ओर ध्यान दिलाया — पंजाब में प्रति हेक्टेयर लगभग 120 क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है, जबकि प्राकृतिक खेती में उत्पादन कुछ कम हो सकता है, परंतु उत्पादन लागत में उल्लेखनीय कमी आती है। उनका तर्क था कि किसानों को केवल उत्पादन की मात्रा नहीं, बल्कि शुद्ध लाभ और बचत दोनों को समझना होगा। यह ऐसे समय में और भी प्रासंगिक है जब कृषि इनपुट की कीमतें लगातार बढ़ रही हैं।

जल संकट और नीति निर्माण की चुनौती

उन्होंने खेती में पानी की कमी को एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बताया, विशेषकर पंजाब जैसे राज्यों में जहाँ भूजल स्तर तेज़ी से गिर रहा है। उनके अनुसार, इस संकट के समाधान के लिए सरकार, कृषि विश्वविद्यालयों और किसानों को समन्वित प्रयास करने होंगे। साथ ही, नीति निर्माण में कृषि की वास्तविक ज़मीनी चुनौतियों को केंद्र में रखना आवश्यक है।

आधुनिक तकनीक: AI, बायोटेक और नैनो का भविष्य

डॉ. ढिल्लों ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), बायोटेक्नोलॉजी और नैनो टेक्नोलॉजी को कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम बताया। हालाँकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इन तकनीकों के व्यापक उपयोग के लिए पर्याप्त निवेश और संसाधनों की आवश्यकता होगी — जो अभी भी एक बड़ी बाधा है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार के प्रयासों से कृषि विश्वविद्यालयों के बजट और संसाधनों में धीरे-धीरे वृद्धि हो रही है।

छोटे किसानों पर विशेष ज़ोर

उन्होंने छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति पर विशेष चिंता जताई और कहा कि इस वर्ग को तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधनों तक पहुँच दिलाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। उनके अनुसार, यदि वैज्ञानिक शोध, आधुनिक तकनीक और किसान-समुदाय का सहयोग इसी गति से आगे बढ़ता रहा, तो भारत का कृषि क्षेत्र न केवल आत्मनिर्भर बनेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक मज़बूत पहचान स्थापित करेगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसमें एक गहरा विरोधाभास छुपा है — प्राकृतिक खेती और AI-संचालित आधुनिक तकनीक का 'संतुलन' तब तक कागज़ी रहेगा जब तक छोटे किसानों की पहुँच दोनों तक नहीं होगी। पंजाब में 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन का उदाहरण उन्हीं बड़े किसानों पर लागू होता है जिनके पास संसाधन पहले से मौजूद हैं। असली सवाल यह है कि बिहार जैसे राज्यों के सीमांत किसान — जिनके पास न पर्याप्त ज़मीन है, न पूँजी — इस 'संतुलन' में कहाँ खड़े होंगे? कृषि विश्वविद्यालयों को 'मंदिर' कहना प्रेरक है, लेकिन इन मंदिरों का शोध खेत तक कितना पहुँचता है, यह जवाबदेही का असली पैमाना है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

डॉ. बीएस ढिल्लों कौन हैं और कृषि में उनका योगदान क्या है?
डॉ. बीएस ढिल्लों पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक और पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी के पूर्व वाइस-चांसलर हैं। उन्होंने दशकों तक कृषि शोध, किसान प्रशिक्षण और नीति निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
प्राकृतिक खेती और आधुनिक तकनीक के संतुलन से क्या फ़ायदा होगा?
डॉ. ढिल्लों के अनुसार, प्राकृतिक खेती से उत्पादन लागत घटती है जबकि आधुनिक तकनीक उत्पादकता और गुणवत्ता बढ़ाती है। दोनों का संतुलित उपयोग किसानों की शुद्ध आय बढ़ाने और कृषि को दीर्घकालिक रूप से टिकाऊ बनाने में सहायक होगा।
पंजाब में गेहूं उत्पादन के बारे में डॉ. ढिल्लों ने क्या कहा?
उन्होंने बताया कि पंजाब में प्रति हेक्टेयर लगभग 120 क्विंटल गेहूं का उत्पादन होता है। प्राकृतिक खेती में उत्पादन थोड़ा कम हो सकता है, लेकिन लागत में उल्लेखनीय कमी आने से किसान का लाभ बढ़ सकता है।
कृषि में AI और बायोटेक्नोलॉजी की क्या भूमिका होगी?
डॉ. ढिल्लों के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, बायोटेक्नोलॉजी और नैनो टेक्नोलॉजी कृषि क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला सकती हैं। हालाँकि, इसके लिए पर्याप्त सरकारी निवेश और संसाधनों की आवश्यकता होगी।
छोटे और सीमांत किसानों के लिए डॉ. ढिल्लों ने क्या सुझाव दिए?
उन्होंने कहा कि छोटे और सीमांत किसानों को सही तकनीक, प्रशिक्षण और संसाधनों तक विशेष पहुँच दिलाना ज़रूरी है क्योंकि उनके पास संसाधन सीमित होते हैं। साथ ही, जल संकट के समाधान के लिए सरकार, विश्वविद्यालयों और किसानों को मिलकर काम करना होगा।
राष्ट्र प्रेस
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