अत्यधिक गर्मी से युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संकट: ऑस्ट्रेलियाई अध्ययन में चौंकाने वाले नतीजे
सारांश
मुख्य बातें
सिडनी विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किए गए एक नए शोध के अनुसार, अत्यधिक गर्मी सीधे तौर पर युवाओं में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी अस्पताल भर्ती के जोखिम को बढ़ाती है। 7 जुलाई को प्रकाशित इस अध्ययन में न्यू साउथ वेल्स राज्य के 2001 से 2022 के बीच 24 वर्ष तक की आयु के लगभग 7.2 लाख अस्पताल भर्ती मामलों का विश्लेषण किया गया। यह निष्कर्ष ऐसे समय में सामने आए हैं जब यूरोप और अमेरिका सहित दुनिया के अधिकांश हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में हैं और जनहानि की खबरें लगातार आ रही हैं।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष
शोध में पाया गया कि जब तापमान रिकॉर्ड के शीर्ष 1 प्रतिशत स्तर तक पहुँचा, तो गर्म महीनों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी अस्पताल भर्ती का जोखिम दोगुना हो गया। ठंडे महीनों में यही जोखिम तीन गुना तक बढ़ गया — जो यह संकेत देता है कि तापमान का प्रभाव मौसम की परवाह किए बिना गंभीर हो सकता है।
अध्ययन में केवल उन गंभीर मामलों को शामिल किया गया जिनमें अस्पताल में भर्ती आवश्यक थी। इनमें अवसाद (डिप्रेशन), सिजोफ्रेनिया, नशीले पदार्थों का दुरुपयोग, खान-पान संबंधी विकार और आत्म-हानि जैसे मामले शामिल थे। आपातकालीन और बाह्य रोगी सेवाओं के मामले इस विश्लेषण से बाहर रखे गए, जिसका अर्थ है कि वास्तविक प्रभाव इससे कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
विशेषज्ञ क्या कहते हैं
अध्ययन की सह-लेखिका और सिडनी चिल्ड्रन्स हॉस्पिटल्स नेटवर्क की किशोर मनोचिकित्सक साइबेल डे ने कहा, 'जलवायु परिवर्तन पहले से ही बच्चों और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य को कई तरह से प्रभावित कर रहा है।' उनके अनुसार, यह अध्ययन नीति-निर्माताओं को यह समझने में मदद करता है कि जलवायु संकट केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अत्यधिक गर्मी के बाद मानसिक स्वास्थ्य मामलों में तेज़ वृद्धि के पीछे शरीर की जैविक (फिज़ियोलॉजिकल) प्रतिक्रिया हो सकती है। इसके संभावित कारणों में नींद में बाधा, मस्तिष्क की कार्यप्रणाली में बदलाव, आवेगपूर्ण व्यवहार में वृद्धि और शराब या नशीले पदार्थों के सेवन में बढ़ोतरी शामिल हो सकते हैं।
भविष्य की चेतावनी
यह अध्ययन 'जर्नल ऑफ द अमेरिकन एकेडमी ऑफ चाइल्ड एंड एडोलसेंट साइकियाट्री' में प्रकाशित हुआ है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि यदि वैश्विक तापमान इसी गति से बढ़ता रहा, तो इस सदी के अंत तक गर्मी से जुड़े मानसिक स्वास्थ्य कारणों से अस्पताल भर्ती के मामलों में 6 प्रतिशत से 7.7 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है।
गौरतलब है कि यह शोध ऐसे समय में प्रकाशित हुआ है जब वैश्विक स्तर पर हीट वेव की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ रही हैं। भारत सहित दक्षिण एशिया के देश भी हर वर्ष रिकॉर्ड तापमान का सामना कर रहे हैं, जिससे यह निष्कर्ष केवल ऑस्ट्रेलिया तक सीमित नहीं, बल्कि वैश्विक प्रासंगिकता रखते हैं।
नीतिगत सिफारिशें
शोधकर्ताओं ने ज़ोर देकर कहा है कि हीट-हेल्थ योजनाओं और सरकारी नीतियों में मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक जोखिमों को भी अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए। अब तक अधिकांश हीट-एक्शन प्लान केवल शारीरिक स्वास्थ्य — जैसे हीट स्ट्रोक और निर्जलीकरण — पर केंद्रित रहे हैं। यह अध्ययन उस नीतिगत अंतर को उजागर करता है जिसे भरने की ज़रूरत है।
आने वाले वर्षों में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और गहरे होने की आशंका को देखते हुए, युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए एकीकृत जलवायु-स्वास्थ्य नीति की माँग अब पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गई है।