13 अक्टूबर 2026
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भाजपा सांसद प्रकाश पाल का अखिलेश पर हमला: 'सपा की असली उपलब्धि दंगे और डर फैलाना'

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भाजपा सांसद प्रकाश पाल का अखिलेश पर हमला: 'सपा की असली उपलब्धि दंगे और डर फैलाना'

सारांश

भाजपा सांसद प्रकाश पाल ने सपा के पोस्टर अभियान पर पलटवार करते हुए कहा कि अखिलेश यादव की असली उपलब्धि दंगे और डर फैलाना था — कल्याण योजनाएँ नहीं। यह बयान उत्तर प्रदेश में 2027 चुनावों से पहले दोनों दलों के बीच तेज़ होते राजनीतिक संघर्ष की एक नई कड़ी है।

मुख्य बातें

भाजपा सांसद प्रकाश पाल ने 13 अक्टूबर को लखनऊ में सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला।
विवाद सपा दफ्तर के बाहर लगे उन पोस्टरों से शुरू हुआ जिनमें पिछली सपा सरकार की महिला कल्याण योजनाओं का उल्लेख था।
पाल ने आरोप लगाया कि सपा के कार्यकाल में व्यापारियों को शाम 5-6 बजे दुकानें बंद करनी पड़ती थीं और महिलाओं में भय का माहौल था।
पाल ने पूछा कि अच्छे काम का दावा करने वाली सपा सत्ता में रहते हुए केवल 47 सीटें क्यों जीत पाई।
पाल ने विपक्ष पर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट समेत संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने का भी आरोप लगाया।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सांसद प्रकाश पाल ने मंगलवार, 13 अक्टूबर को लखनऊ में समाजवादी पार्टी (सपा) प्रमुख अखिलेश यादव पर तीखा हमला बोला। पाल की यह आलोचना सपा मुख्यालय के बाहर लगाए गए उन पोस्टरों को लेकर थी, जिनमें पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई महिला कल्याण योजनाओं का उल्लेख था। भाजपा नेता ने आरोप लगाया कि सपा उन योजनाओं का श्रेय लेने की कोशिश कर रही है, जबकि अपने कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की दयनीय स्थिति पर पर्दा डाल रही है।

विवाद की जड़: पोस्टर और दावे

यह विवाद तब शुरू हुआ जब सपा दफ्तर के बाहर देवी दुर्गा की तस्वीर वाले पोस्टर लगाए गए, जिनमें उत्तर प्रदेश में पार्टी के पिछले कार्यकाल के दौरान शुरू की गई कई महिला-केंद्रित योजनाओं को प्रदर्शित किया गया था। भाजपा ने इसे राजनीतिक प्रचार करार देते हुए पलटवार किया।

पाल ने कहा, 'अखिलेश यादव इस बात का श्रेय ले सकते हैं कि उन्होंने कैसे पिछड़े वर्गों, दलितों और सामान्य वर्ग के अधिकारों को हड़पा। वह ऐसे पोस्टर लगा सकते हैं जिनमें दावा किया गया हो, 'मैंने पहले भी ऐसा किया था, और मैं फिर से ऐसा करूंगा।'

कानून-व्यवस्था पर सीधा प्रहार

भाजपा सांसद ने पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में कानून-व्यवस्था की स्थिति को लेकर गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार उस दौर में व्यापारियों को शाम 5-6 बजे तक दुकानें बंद करने पर मजबूर होना पड़ता था, और महिलाओं व लड़कियों में भय का वातावरण था।

पाल ने कहा, 'वह (अखिलेश यादव) ऐसा डर का माहौल बनाने का श्रेय ले सकते हैं कि लड़कियाँ बाहर निकलने से डरती थीं। उन्होंने (सपा सरकार ने) लोगों की जमीनें हड़प लीं।' गौरतलब है कि सपा ने इन आरोपों पर अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

चुनावी प्रदर्शन पर सवाल

पाल ने सपा के चुनावी रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि यदि पार्टी के दावे सच होते, तो उसे बड़ा जनादेश मिलता। उन्होंने पूछा, 'अगर उन्होंने इतना अच्छा काम किया है तो सत्ता में रहते हुए वे केवल 47 सीटें क्यों जीत पाए?'

उन्होंने 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में सपा के प्रदर्शन का भी उल्लेख करते हुए सवाल किया कि पार्टी की जीत अधिकांशतः राजनीतिक परिवार से जुड़ी सीटों तक ही सीमित क्यों रही। भाजपा सांसद ने सपा की चुनावी हार के लिए 'एंटी-इनकंबेंसी' को प्रमुख कारण बताया।

संवैधानिक संस्थाओं पर विपक्ष का रुख

पाल ने विपक्ष पर भारत की संवैधानिक संस्थाओं को कमज़ोर करने का भी आरोप लगाया। उन्होंने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ हुए विरोध मार्च का उल्लेख करते हुए कहा, 'एक अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत, वे भारत की संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करते हैं, लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हैं, चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हैं और न्यायपालिका के खिलाफ बोलते हैं।'

उन्होंने आगे कहा, 'इस तरह, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध करते-करते 'इंडी अलायंस' भारत-विरोधी हो गया है।' उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक नेतृत्व की भी प्रशंसा की।

आगे का राजनीतिक परिदृश्य

यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सक्रियता तेज़ हो रही है और सपा अपनी पहचान को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश में है। भाजपा की यह आक्रामक प्रतिक्रिया संकेत देती है कि सत्तारूढ़ दल पिछली सरकारों की कथित विफलताओं को चुनावी विमर्श में केंद्रीय मुद्दा बनाए रखना चाहता है। आने वाले दिनों में सपा की ओर से भी जवाबी हमला अपेक्षित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जहाँ 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट पहले से सुनाई दे रही है। आलोचकों का कहना है कि 'दंगे' और 'डर' जैसे शब्दों का बार-बार प्रयोग भावनात्मक ध्रुवीकरण की परिचित भाजपाई रणनीति है, जो विकास के बजाय कानून-व्यवस्था को केंद्र में रखती है। दूसरी ओर, सपा का पोस्टर अभियान भी स्पष्ट रूप से महिला मतदाताओं को साधने की कोशिश है। यह राजनीतिक टकराव दरअसल इस सवाल का जवाब है कि उत्तर प्रदेश में अगली सरकार का चेहरा कौन होगा — और दोनों दल इस परिभाषा को अपने पक्ष में लिखना चाहते हैं।
RashtraPress
13 अक्टूबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भाजपा सांसद प्रकाश पाल ने अखिलेश यादव पर क्या आरोप लगाए?
पाल ने आरोप लगाया कि सपा कल्याणकारी योजनाओं का झूठा श्रेय ले रही है, जबकि उसके कार्यकाल में दंगे, डर का माहौल और पिछड़े वर्गों-दलितों के अधिकारों का हनन हुआ। उन्होंने कहा कि व्यापारियों को शाम 5-6 बजे दुकानें बंद करनी पड़ती थीं और लड़कियाँ घर से बाहर निकलने से डरती थीं।
यह विवाद किस कारण शुरू हुआ?
सपा मुख्यालय के बाहर देवी दुर्गा की तस्वीर वाले पोस्टर लगाए गए, जिनमें पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में शुरू की गई महिला कल्याण योजनाओं का उल्लेख था। इसी को लेकर भाजपा ने पलटवार किया और आरोप लगाया कि सपा उन योजनाओं का श्रेय लेने की कोशिश कर रही है जो उसकी नहीं हैं।
पाल ने सपा के चुनावी प्रदर्शन पर क्या सवाल उठाए?
पाल ने कहा कि यदि सपा ने वाकई इतना अच्छा काम किया होता, तो सत्ता में रहते हुए पार्टी केवल 47 सीटें नहीं जीतती। उन्होंने 2014 और 2019 के चुनावों में सपा की सीमित जीत का भी हवाला दिया।
पाल ने संवैधानिक संस्थाओं को लेकर क्या कहा?
भाजपा सांसद ने विपक्ष पर चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट जैसी संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने का आरोप लगाया। उन्होंने सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ हुए विरोध मार्च का उल्लेख करते हुए कहा कि 'इंडी अलायंस' मोदी का विरोध करते-करते भारत-विरोधी हो गया है।
इस राजनीतिक विवाद का असर उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या हो सकता है?
यह टकराव उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है, जहाँ भाजपा कानून-व्यवस्था और सपा महिला कल्याण को केंद्रीय मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। आलोचकों का मानना है कि दोनों दल महिला और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं को साधने के लिए विमर्श की लड़ाई लड़ रहे हैं।
राष्ट्र प्रेस
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