रक्तदान से जुड़ी भ्रांतियाँ और जानकारी की कमी बनती है सबसे बड़ी बाधा, विशेषज्ञों ने बताई सच्चाई
सारांश
मुख्य बातें
रक्तदान को लेकर फैली गलतफहमियाँ और सही जानकारी की कमी आज भी भारत में स्वैच्छिक रक्तदान की राह में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। नई दिल्ली में 28 मई 2026 को स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने यह रेखांकित किया कि यदि लोग इन भ्रांतियों को छोड़ दें, तो देश में रक्त की किल्लत की समस्या काफी हद तक हल हो सकती है। रक्तदान को 'महादान' इसीलिए कहा जाता है क्योंकि एक व्यक्ति का दिया गया रक्त किसी ज़रूरतमंद की जान बचा सकता है।
क्या हैं आम भ्रांतियाँ
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश लोग यह मानते हैं कि रक्तदान करने से शरीर कमजोर हो जाता है या दीर्घकालिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। डॉक्टरों का स्पष्ट कहना है कि यह धारणा पूरी तरह निराधार है। एक स्वस्थ व्यक्ति का शरीर कुछ ही हफ्तों में दान किए गए रक्त की भरपाई कर लेता है और पूरी प्रक्रिया में केवल कुछ मिनट लगते हैं।
रक्तदान के लिए पात्रता मानदंड
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के दिशानिर्देशों के अनुसार, 18 से 65 वर्ष की आयु का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। रक्तदाता के शरीर में हीमोग्लोबिन का स्तर कम से कम 12.5 ग्राम प्रति डेसीलीटर होना अनिवार्य है और रक्तचाप सामान्य सीमा में होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को मौसमी संक्रमण, टीबी, कैंसर या कोई अन्य गंभीर बीमारी है, तो उसे रक्तदान से परहेज करना चाहिए।
रक्तदान की प्रक्रिया और सुरक्षा
विशेषज्ञ बताते हैं कि रक्तदान से पूर्व डोनर की संपूर्ण स्वास्थ्य जाँच की जाती है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि रक्तदाता पूरी तरह स्वस्थ है। पुरुष हर तीन महीने पर और महिलाएँ हर चार महीने पर रक्तदान कर सकते हैं। NHM की अपील है कि लोग भ्रांतियों को दरकिनार कर स्वैच्छिक रक्तदान को अपनाएँ।
देश में रक्त की माँग और ज़रूरत
भारत में हर साल बड़ी संख्या में मरीजों को रक्त की आवश्यकता होती है — दुर्घटनाओं, सर्जरी, प्रसव और गंभीर बीमारियों के दौरान समय पर रक्त मिलना जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि एक यूनिट रक्त कई लोगों की जान बचाने में सहायक हो सकता है। यह ऐसे समय में और भी महत्वपूर्ण है जब स्वैच्छिक दाताओं की संख्या माँग के अनुपात में अपर्याप्त बनी हुई है।
जागरूकता अभियान और आगे की राह
स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, लोगों को जागरूक करने के लिए निरंतर अभियान चलाए जा रहे हैं। स्कूलों, कॉलेजों और विभिन्न संस्थानों में रक्तदान शिविर आयोजित किए जा रहे हैं ताकि अधिक से अधिक लोग इस सामाजिक दायित्व से जुड़ सकें। विशेषज्ञों का आग्रह है कि हर स्वस्थ नागरिक को स्वैच्छिक रक्तदान के लिए आगे आना चाहिए, क्योंकि यह न केवल दूसरों की जान बचाता है, बल्कि स्वयं दाता के स्वास्थ्य पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता।