4 नवंबर 2026
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कैबिनेट का बड़ा फैसला: लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना मंजूर

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कैबिनेट का बड़ा फैसला: लिथियम-निकेल प्रोसेसिंग के लिए ₹2,814 करोड़ की योजना मंजूर

सारांश

भारत ने लिथियम-निकेल आयात पर निर्भरता तोड़ने की दिशा में बड़ा दांव लगाया — ₹2,814 करोड़ की योजना के तहत चार घरेलू प्रोसेसिंग प्लांट लगेंगे, जो EV, BESS और रक्षा जैसे क्षेत्रों की सप्लाई चेन को मजबूत करेंगे और भारत को वैश्विक क्रिटिकल मिनरल मूल्य शृंखला में ऊपर ले जाएंगे।

मुख्य बातें

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर 2026 को ₹2,814 करोड़ की 'कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग' को मंजूरी दी।
योजना के तहत चार प्लांट स्थापित होंगे — दो लिथियम (न्यूनतम 30 किलो टन ) और दो निकेल (न्यूनतम 50 किलो टन ) प्रोसेसिंग इकाइयाँ।
पात्र निवेश पर 30% तक पूंजीगत सब्सिडी; लिथियम के लिए अधिकतम ₹500 करोड़ और निकेल के लिए अधिकतम ₹900 करोड़ ।
प्रोत्साहन राशि परियोजना उपलब्धियों के आधार पर तीन किस्तों में जारी होगी।
EV, BESS, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा विनिर्माण और स्पेशियलिटी स्टील क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद।
योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत एंड-टू-एंड क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन विकसित करने के लक्ष्य से जुड़ी है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने 4 नवंबर 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में ₹2,814 करोड़ की 'कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग' को स्वीकृति दी, जिसका लक्ष्य देश में लिथियम और निकेल की घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता खड़ी करना और आयात पर भारत की भारी निर्भरता को कम करना है। यह पाँच वर्षीय योजना इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी स्टोरेज और रक्षा जैसे रणनीतिक क्षेत्रों के लिए एक मजबूत घरेलू आपूर्ति शृंखला की नींव रखने की दिशा में सरकार का अब तक का सबसे ठोस कदम है।

योजना की संरचना और प्लांट क्षमता

सरकारी बयान के अनुसार, इस योजना के तहत देशभर में चार महत्वपूर्ण खनिज प्रोसेसिंग संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। इनमें दो लिथियम प्रोसेसिंग प्लांट होंगे, जिनकी न्यूनतम क्षमता 30 किलो टन प्रति वर्ष होगी, तथा दो निकेल प्रोसेसिंग प्लांट कम से कम 50 किलो टन क्षमता के होंगे। उल्लेखनीय है कि निकेल प्रोसेसिंग प्रक्रिया के दौरान कोबाल्ट का उत्पादन सह-उत्पाद के रूप में स्वाभाविक रूप से होगा, जिससे देश को एक और महत्वपूर्ण बैटरी खनिज घरेलू स्तर पर मिलने लगेगा।

योजना का केंद्रीय उद्देश्य लिथियम और निकेल अयस्कों तथा इंटरमीडिएट उत्पादों को उच्च शुद्धता वाले रसायनों में परिवर्तित करने की घरेलू क्षमता विकसित करना है, ताकि भारत वैश्विक मूल्य शृंखला में कच्चे माल के निर्यातक से आगे बढ़कर उच्च मूल्यवर्धन करने वाले देश की भूमिका निभा सके।

सब्सिडी संरचना और चयन प्रक्रिया

इस योजना के अंतर्गत पात्र निवेश पर 30 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी दी जाएगी। लिथियम परियोजनाओं के लिए अधिकतम ₹500 करोड़ और निकेल परियोजनाओं के लिए अधिकतम ₹900 करोड़ तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध होगी। प्रोत्साहन राशि परियोजना के विभिन्न चरणों की उपलब्धियों के आधार पर तीन किस्तों में जारी की जाएगी।

लाभार्थियों का चयन दो चरणों में होगा — पहले चरण में तकनीकी योग्यता का मूल्यांकन किया जाएगा और दूसरे चरण में वित्तीय बोली प्रक्रिया अपनाई जाएगी। सबसे कम पूंजीगत सहायता माँगने वाले योग्य आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी, जो प्रतिस्पर्धी आवंटन सुनिश्चित करेगा।

भू-राजनीतिक संदर्भ और आयात निर्भरता

यह योजना ऐसे समय में आई है जब वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता कुछ ही देशों के हाथों में केंद्रित है, जिससे सप्लाई चेन भू-राजनीतिक तनाव, मूल्य अस्थिरता और आपूर्ति बाधाओं के प्रति संवेदनशील बनी हुई है। भारत अभी भी उच्च शुद्धता वाले लिथियम और निकेल इंटरमीडिएट्स के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है।

गौरतलब है कि यह योजना आत्मनिर्भर भारत अभियान के व्यापक ढाँचे के अंतर्गत आती है। सरकार का तर्क है कि घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करना आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ ऊर्जा लक्ष्यों को एक साथ साधने के लिए आवश्यक है।

किन क्षेत्रों को होगा फायदा

सरकार के अनुसार, इस योजना से इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा विनिर्माण और स्पेशियलिटी स्टील जैसे क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। वर्तमान में इन सभी क्षेत्रों की आपूर्ति शृंखला आयातित कच्चे माल और प्रोसेस्ड खनिजों पर टिकी है।

देश में लिथियम और निकेल प्रोसेसिंग क्षमता स्थापित होने से बैटरी निर्माण उद्योग को दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धात्मक लाभ मिलेगा और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की लागत में कमी आने की भी संभावना है।

आगे क्या

इस योजना के तहत एंड-टू-एंड क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन विकसित होने की उम्मीद है, जिससे वैश्विक आपूर्ति बाधाओं का भारत पर पड़ने वाला असर धीरे-धीरे कम होगा। उद्योग जगत की प्रतिक्रिया और परियोजना चयन की समयसीमा आने वाले महीनों में योजना की व्यावहारिक गति तय करेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

814 करोड़ की यह योजना दिशा में सही है, लेकिन पैमाने की दृष्टि से यह भारत की वास्तविक जरूरत के सामने अभी भी छोटी दिखती है — चीन अकेले लिथियम रिफाइनिंग में सालाना कई गुना अधिक निवेश करता है। असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये चार प्लांट वास्तव में 'उच्च शुद्धता वाले रसायन' तक पहुँचते हैं, या केवल प्राथमिक प्रोसेसिंग तक सीमित रह जाते हैं — क्योंकि वैश्विक मूल्य शृंखला में असली कमाई रिफाइन्ड केमिकल ग्रेड मटेरियल में है। तकनीकी-से-वित्तीय बोली का दो-चरणीय चयन मॉडल बेहतर जवाबदेही का संकेत देता है, परंतु निकेल के लिए ₹900 करोड़ की सब्सिडी सीमा बड़े वैश्विक खिलाड़ियों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त है या नहीं, यह देखना बाकी है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

कैपेक्स सपोर्ट स्कीम टू प्रमोट क्रिटिकल मिनरल प्रोसेसिंग क्या है?
यह केंद्र सरकार की ₹2,814 करोड़ की पाँच वर्षीय योजना है, जिसे 4 नवंबर 2026 को कैबिनेट ने मंजूरी दी। इसका उद्देश्य देश में लिथियम और निकेल की घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता विकसित करना और आयात निर्भरता घटाना है।
इस योजना के तहत कितने प्लांट लगाए जाएंगे और उनकी क्षमता क्या होगी?
योजना के तहत चार प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित होंगे — दो लिथियम प्लांट (न्यूनतम 30 किलो टन क्षमता) और दो निकेल प्लांट (न्यूनतम 50 किलो टन क्षमता)। निकेल प्रोसेसिंग के दौरान कोबाल्ट का उत्पादन भी सह-उत्पाद के रूप में होगा।
इस योजना में सब्सिडी कितनी और किस आधार पर मिलेगी?
पात्र निवेश पर 30 प्रतिशत तक पूंजीगत सब्सिडी दी जाएगी। लिथियम परियोजनाओं के लिए अधिकतम ₹500 करोड़ और निकेल परियोजनाओं के लिए अधिकतम ₹900 करोड़ की सहायता उपलब्ध है। यह राशि परियोजना के विभिन्न चरणों की उपलब्धियों के आधार पर तीन किस्तों में जारी होगी।
इस योजना से कौन-से उद्योग क्षेत्र लाभान्वित होंगे?
इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम (BESS), इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा विनिर्माण और स्पेशियलिटी स्टील क्षेत्रों को प्रत्यक्ष लाभ मिलने की उम्मीद है। ये सभी क्षेत्र अभी आयातित प्रोसेस्ड खनिजों पर निर्भर हैं।
लाभार्थियों का चयन कैसे होगा?
चयन दो चरणों में होगा — पहले चरण में तकनीकी योग्यता का मूल्यांकन और दूसरे चरण में वित्तीय बोली प्रक्रिया। सबसे कम पूंजीगत सहायता माँगने वाले तकनीकी रूप से योग्य आवेदकों को प्राथमिकता दी जाएगी।
राष्ट्र प्रेस
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