4 नवंबर 2026
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सुप्रीम कोर्ट का MP स्पीकर को निर्देश: दो माह में निर्मला सप्रे की सदस्यता पर फैसला लें

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सुप्रीम कोर्ट का MP स्पीकर को निर्देश: दो माह में निर्मला सप्रे की सदस्यता पर फैसला लें

सारांश

सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश के स्पीकर को दो माह में बीना विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता पर फैसला लेने का निर्देश दिया। कांग्रेस के टिकट पर चुनी गईं सप्रे BJP कार्यक्रमों में शामिल होती रहीं — दल-बदल कानून की एक कठिन परीक्षा, जिसका असर मध्य प्रदेश विधानसभा की ताकत पर पड़ सकता है।

मुख्य बातें

सर्वोच्च न्यायालय ने 4 नवंबर 2026 को MP विधानसभा अध्यक्ष को दो माह में निर्मला सप्रे की सदस्यता पर निर्णय लेने का आदेश दिया।
निर्मला सप्रे 2023 में बीना विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनी गई थीं, लेकिन बाद में BJP के कार्यक्रमों में शामिल होती रहीं।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने दसवीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के तहत याचिका दायर की थी।
अधिवक्ता विवेक तन्खा ने तर्क दिया कि दल-बदल मामलों का शीघ्र निराकरण संवैधानिक अनिवार्यता है।
तय समय-सीमा में निर्णय न होने पर मामला पुनः सर्वोच्च न्यायालय पहुँच सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को 4 नवंबर 2026 को निर्देश दिया कि वे बीना विधानसभा क्षेत्र (सागर जिला) से निर्वाचित कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता के मामले में दो माह के भीतर निर्णय लें। यह आदेश कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की उस याचिका पर आया है जिसमें सप्रे पर दल-बदल कानून के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है।

मामले की पृष्ठभूमि

निर्मला सप्रे 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (कांग्रेस / INC) के उम्मीदवार के रूप में बीना सीट से विजयी हुई थीं। चुनाव परिणाम के बाद भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने बहुमत से सरकार बनाई। इसी दौरान सप्रे ने BJP के कई कार्यक्रमों और मंच-साझेदारियों में भाग लिया, जबकि कांग्रेस की बैठकों से अनुपस्थित रहीं।

गौरतलब है कि सप्रे ने औपचारिक रूप से दल-बदल नहीं किया — उन्होंने कांग्रेस सदस्यता नहीं छोड़ी — फिर भी उनकी BJP गतिविधियों में सतत भागीदारी ने दसवीं अनुसूची (दल-बदल कानून) के तहत अयोग्यता का प्रश्न खड़ा कर दिया। यह वैसे ही एक ग्रे-ज़ोन है जहाँ कानून और व्यवहार के बीच की रेखा धुंधली होती है।

सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई और आदेश

नेता प्रतिपक्ष के अधिवक्ता विवेक तन्खा ने पैरवी के दौरान तर्क दिया कि दसवीं अनुसूची से जुड़े मामलों का शीघ्र निराकरण अनिवार्य है, चाहे उच्च न्यायालय ने पहले तात्कालिकता न मानी हो। सर्वोच्च न्यायालय ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने का समय सीमा निर्धारित कर दी।

यह ऐसे समय में आया है जब देशभर में दल-बदल कानून के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर न्यायिक हस्तक्षेप की माँग बढ़ती जा रही है। सर्वोच्च न्यायालय पहले भी कई राज्यों में स्पीकरों को दल-बदल मामलों में समयबद्ध निर्णय के निर्देश दे चुका है।

नेता प्रतिपक्ष की प्रतिक्रिया

नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह निर्णय 'लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान की गरिमा को मजबूत करने वाला है।' उन्होंने आगे कहा, 'जनता ने निर्मला सप्रे को कांग्रेस के टिकट पर चुनकर विधानसभा भेजा था। जनादेश के साथ विश्वासघात करने वालों को दल-बदल कानून के तहत जवाबदेह बनाना जरूरी है।'

सिंघार ने यह भी कहा कि उन्हें विश्वास है कि विधानसभा अध्यक्ष इस मामले में 'शीघ्र, निष्पक्ष एवं न्यायसंगत निर्णय' लेंगे और 'लोकतंत्र में जनता के जनादेश की गरिमा एवं संवैधानिक मर्यादाओं को अक्षुण्ण रखेंगे।'

आम जनता और लोकतंत्र पर असर

दल-बदल के ये मामले सीधे मतदाताओं की पसंद की प्रासंगिकता पर सवाल उठाते हैं। जब एक विधायक अपने चुनावी दल से व्यवहारिक रूप से अलग हो जाता है, तो उस निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता प्रभावी प्रतिनिधित्व से वंचित हो सकते हैं। बीना क्षेत्र के नागरिक इस फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

आगे क्या होगा

विधानसभा अध्यक्ष को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार दो माह के भीतर निर्मला सप्रे की सदस्यता बरकरार रखने या अयोग्य ठहराने का निर्णय सुनाना होगा। यदि वे इस समय-सीमा में निर्णय नहीं लेते, तो मामला पुनः सर्वोच्च न्यायालय पहुँच सकता है। इस फैसले का मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस की स्थिति और भविष्य के दल-बदल मामलों पर असर पड़ सकता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

फिर भी व्यवहारतः विपक्षी दल के साथ खड़ी रहीं — दसवीं अनुसूची की एक ऐसी खामी जिसे संसद ने आज तक नहीं सुधारा। असली सवाल यह है कि क्या दो माह की समय-सीमा निर्धारित करना पर्याप्त है, या फिर दल-बदल कानून में 'स्वैच्छिक त्याग' की परिभाषा को ही विस्तार देने की ज़रूरत है।
RashtraPress
4 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

निर्मला सप्रे सदस्यता विवाद क्या है?
निर्मला सप्रे 2023 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीना सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनी गई थीं। चुनाव के बाद वे BJP के कार्यक्रमों में भाग लेती रहीं और कांग्रेस की बैठकों से अनुपस्थित रहीं, जिस पर दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता की माँग उठी।
सुप्रीम कोर्ट ने MP स्पीकर को क्या निर्देश दिया?
सर्वोच्च न्यायालय ने मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को दो माह के भीतर निर्मला सप्रे की सदस्यता के बारे में निर्णय लेने का आदेश दिया है। यह आदेश कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार की याचिका पर 4 नवंबर 2026 को सुनाया गया।
दल-बदल कानून (दसवीं अनुसूची) क्या कहता है?
दसवीं अनुसूची के तहत कोई विधायक अयोग्य हो सकता है यदि वह स्वेच्छा से अपने दल की सदस्यता त्याग दे या दल के निर्देश के विरुद्ध मतदान करे। इस मामले में सवाल यह है कि क्या BJP कार्यक्रमों में भागीदारी और कांग्रेस बैठकों से अनुपस्थिति इस परिभाषा के दायरे में आती है।
इस मामले में उमंग सिंघार की भूमिका क्या है?
उमंग सिंघार मध्य प्रदेश विधानसभा में कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष हैं। उन्होंने ही निर्मला सप्रे की सदस्यता समाप्त करने की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की और अधिवक्ता विवेक तन्खा ने उनकी ओर से पैरवी की।
अगर MP स्पीकर दो माह में फैसला नहीं लेते तो क्या होगा?
यदि मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सर्वोच्च न्यायालय की निर्धारित समय-सीमा में निर्णय नहीं लेते, तो याचिकाकर्ता पुनः न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकते हैं। ऐसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय अवमानना कार्यवाही भी शुरू कर सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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