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क्रिटिकल मिनरल मिशन: 24 महीनों में 35 देशों का नेटवर्क, रेयर अर्थ और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर भारत का बड़ा दांव

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क्रिटिकल मिनरल मिशन: 24 महीनों में 35 देशों का नेटवर्क, रेयर अर्थ और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर भारत का बड़ा दांव

सारांश

चीन के खनिज वर्चस्व को चुनौती देने के लिए भारत ने 24 महीनों में 35 देशों का क्रिटिकल मिनरल नेटवर्क खड़ा किया है — 24 से समझौते पूरे, 11 से बातचीत जारी। लिथियम, रेयर अर्थ और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन पर यह दांव भारत की हरित अर्थव्यवस्था और तकनीकी आत्मनिर्भरता की बुनियाद बन सकता है।

मुख्य बातें

भारत ने पिछले 24 महीनों में 35 देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल रणनीतिक नेटवर्क विकसित किया।
24 देशों के साथ औपचारिक समझौते और साझेदारियाँ पूरी; 11 देशों के साथ बातचीत जारी।
साझेदारी में लिथियम , कोबाल्ट , कॉपर , रेयर अर्थ , सेमीकंडक्टर सहयोग और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल।
जापान , नीदरलैंड , जर्मनी और अमेरिका के साथ सेमीकंडक्टर व चिप निर्माण सहयोग को विशेष प्राथमिकता।
बातचीत के दायरे में चिली , बोलीविया , कजाकिस्तान , इंडोनेशिया और म्यांमार जैसे खनिज-समृद्ध देश।
रणनीति का लक्ष्य केवल खनिज आयात नहीं, बल्कि संयुक्त खनन, प्रोसेसिंग और दीर्घकालिक सप्लाई चेन निर्माण भी।

भारत ने पिछले 24 महीनों में क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ एलिमेंट्स और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक व्यापक वैश्विक रणनीति पर अमल किया है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने 35 देशों के साथ एक रणनीतिक खनिज नेटवर्क खड़ा किया है — जिनमें से 24 देशों के साथ औपचारिक समझौते और साझेदारियाँ पूरी हो चुकी हैं, जबकि 11 देशों के साथ बातचीत अभी जारी है। यह पहल देश की ऊर्जा सुरक्षा, इलेक्ट्रिक वाहन (EV), बैटरी, रक्षा, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए आवश्यक खनिजों की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।

वैश्विक साझेदारी नेटवर्क का विस्तार

सरकार द्वारा साझा किए गए एक ग्राफिक मैप के अनुसार, भारत की साझेदारी का दायरा उत्तरी अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया और ऑस्ट्रेलिया तक फैला है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, जापान, ऑस्ट्रेलिया, ब्राजील, अर्जेंटीना, डीआर कांगो, घाना, नामीबिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इज़रायल, वियतनाम, मोजाम्बिक, जिम्बाब्वे, मलावी और रूस के साथ विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग स्थापित किया जा चुका है।

इन साझेदारियों में क्रिटिकल मिनरल्स, रेयर अर्थ, सेमीकंडक्टर सहयोग, लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर, ऊर्जा सुरक्षा, निवेश, तकनीकी सहयोग और खनिज संसाधनों के संयुक्त विकास जैसे बहुआयामी क्षेत्र शामिल हैं।

बातचीत के दौर में कौन-से देश

ग्राफिक मैप के अनुसार, भारत अभी चिली, पेरू, जाम्बिया, बोलीविया, कजाकिस्तान, मंगोलिया, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, ताजिकिस्तान, म्यांमार और इंडोनेशिया के साथ समझौतों पर बातचीत कर रहा है। इन देशों में विशेष रूप से लिथियम, कॉपर, रेयर अर्थ और अन्य रणनीतिक खनिजों पर सहयोग की संभावनाएँ तलाशी जा रही हैं।

सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण को प्राथमिकता

यह रणनीति महज खनिज आयात तक सीमित नहीं है। सरकार के अनुसार, जापान, नीदरलैंड, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों के साथ सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण सहयोग को विशेष प्राथमिकता दी गई है। इसे भारत की घरेलू चिप निर्माण क्षमता बढ़ाने और वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी भूमिका सुदृढ़ करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

गौरतलब है कि यह ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर सेमीकंडक्टर आपूर्ति को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव चरम पर है, और भारत इस रिक्तता को एक अवसर के रूप में देख रहा है।

क्यों ज़रूरी हैं ये खनिज

लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी स्टोरेज, पवन ऊर्जा, सौर ऊर्जा, रक्षा उपकरण और हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अपरिहार्य हैं। वर्तमान में इन खनिजों की वैश्विक आपूर्ति पर चीन का वर्चस्व है, और भारत इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए बहुपक्षीय साझेदारियाँ बना रहा है।

सरकार का जोर केवल खनिज खरीद पर नहीं, बल्कि संयुक्त निवेश, खनिज खोज, प्रोसेसिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और दीर्घकालिक सप्लाई चेन निर्माण पर भी समान रूप से है — ताकि भविष्य में किसी वैश्विक आपूर्ति संकट का असर न्यूनतम हो सके।

आगे की राह

विशेषज्ञों के अनुसार, 35 देशों का यह नेटवर्क भारत को 2030 तक स्वच्छ ऊर्जा और हरित अर्थव्यवस्था के लक्ष्यों की ओर ले जाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। 11 देशों के साथ बातचीत के पूरा होने पर यह नेटवर्क और भी व्यापक हो जाएगा, जिससे भारत की खनिज कूटनीति को नई धार मिलेगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि 'समझौता' और 'साझेदारी' के पीछे कितनी बाध्यकारी आपूर्ति प्रतिबद्धताएँ हैं — क्योंकि भारत की खनिज कूटनीति में MoU और वास्तविक खनन उत्पादन के बीच की खाई ऐतिहासिक रूप से चौड़ी रही है। चीन ने इन्हीं देशों में दशकों पहले निवेश कर वर्चस्व बनाया था; भारत अभी नेटवर्क बना रहा है। घरेलू प्रोसेसिंग क्षमता और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के बिना, कच्चे खनिज आयात की निर्भरता एक देश से दूसरे देश पर स्थानांतरित होने का जोखिम है। यह मिशन सही दिशा में है, पर गति और क्रियान्वयन की पारदर्शिता ही इसे वास्तविक रणनीतिक बढ़त में बदलेगी।
RashtraPress
7 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

भारत का क्रिटिकल मिनरल मिशन क्या है?
यह भारत सरकार की वह रणनीतिक पहल है जिसके तहत पिछले 24 महीनों में 35 देशों के साथ रेयर अर्थ, लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर और सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन को सुदृढ़ करने के लिए साझेदारियाँ बनाई गई हैं। इसका उद्देश्य EV, बैटरी, रक्षा, अंतरिक्ष और सेमीकंडक्टर उद्योग के लिए खनिजों की दीर्घकालिक आपूर्ति सुनिश्चित करना है।
भारत ने किन देशों के साथ क्रिटिकल मिनरल समझौते किए हैं?
सरकारी आँकड़ों के अनुसार, 24 देशों के साथ समझौते पूरे हो चुके हैं — जिनमें अमेरिका, कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, ब्राजील, अर्जेंटीना, डीआर कांगो, नामीबिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और रूस शामिल हैं। 11 अन्य देशों — जैसे चिली, बोलीविया, कजाकिस्तान और इंडोनेशिया — के साथ बातचीत जारी है।
क्रिटिकल मिनरल्स भारत के लिए क्यों ज़रूरी हैं?
लिथियम, कोबाल्ट, निकेल, कॉपर और रेयर अर्थ एलिमेंट्स इलेक्ट्रिक वाहन, सौर-पवन ऊर्जा, रक्षा उपकरण और हाई-टेक इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए अनिवार्य हैं। वर्तमान में इनकी वैश्विक आपूर्ति पर चीन का वर्चस्व है, और भारत इस एकाधिकार को कम करने के लिए बहुपक्षीय नेटवर्क बना रहा है।
भारत की सेमीकंडक्टर साझेदारी किन देशों के साथ है?
सरकार के अनुसार, जापान, नीदरलैंड, जर्मनी और अमेरिका के साथ सेमीकंडक्टर और चिप निर्माण सहयोग को विशेष प्राथमिकता दी गई है। यह सहयोग भारत की घरेलू चिप निर्माण क्षमता बढ़ाने और वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन में उसकी भूमिका मज़बूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्या यह मिशन केवल खनिज खरीदने तक सीमित है?
नहीं। सरकार के अनुसार, इस रणनीति में संयुक्त निवेश, खनिज खोज, प्रोसेसिंग, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और दीर्घकालिक सप्लाई चेन निर्माण को भी समान प्राथमिकता दी गई है। लक्ष्य यह है कि भविष्य में किसी वैश्विक आपूर्ति संकट की स्थिति में भारत पर उसका प्रभाव न्यूनतम हो।
राष्ट्र प्रेस
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