छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026 को हाईकोर्ट में चुनौती, राज्य सरकार को 3 सप्ताह में जवाब देने का निर्देश
सारांश
मुख्य बातें
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता अधिनियम 2026' और 'छत्तीसगढ़ धर्म स्वतंत्रता नियम 2026' की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार से 3 सप्ताह के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है। याचिकाकर्ता वीएन प्रसाद राव और अन्य की ओर से यह याचिका अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी के माध्यम से दायर की गई है, जिसमें इस कानून के कुछ प्रावधानों को मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया गया है।
मुख्य घटनाक्रम
बिलासपुर स्थित छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की युगल पीठ के समक्ष गुरुवार को इस मामले की वर्चुअल सुनवाई हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एस. मुरलीधर और अन्य ने तर्क प्रस्तुत किए। पीठ ने अंतरिम राहत संबंधी आवेदन पर छत्तीसगढ़ सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए 3 सप्ताह का समय दिया है।
याचिका में क्या आपत्तियाँ उठाई गई हैं
वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने न्यायालय के समक्ष तर्क दिया कि यह अधिनियम नागरिकों के अंतःकरण की स्वतंत्रता, धार्मिक अधिकार और निजता से जुड़े संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन करता है। उनका कहना है कि धर्म किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत गरिमा और निजी जीवन का अभिन्न अंग है, जिसे सार्वजनिक मंचों या प्रशासनिक अनुमतियों के अधीन नहीं किया जा सकता।
अधिवक्ता हर्षमंदर रस्तोगी ने स्पष्ट किया कि याचिका में पूरे अधिनियम को नहीं, बल्कि उसके कुछ विशेष प्रावधानों को चुनौती दी गई है। उनके अनुसार ये प्रावधान किसी भी नागरिक के मूल अधिकारों के विरुद्ध हैं।
200-300 दिनों की प्रक्रिया और कड़ी सज़ा का प्रावधान
याचिका में कहा गया है कि अधिनियम के तहत यदि कोई नागरिक स्वेच्छा से भी धर्म परिवर्तन करना चाहता है, तो उसे इसका सार्वजनिक प्रकाशन कराना होगा और अनेक प्रशासनिक विभागों से स्वीकृतियाँ लेनी होंगी, जिसमें कथित तौर पर 200 से 300 दिनों का समय लग सकता है।
अधिवक्ता रस्तोगी के अनुसार, नियमों की जटिलता के कारण स्वैच्छिक धर्मांतरण की स्थिति में भी धर्मांतरण करने वाले और कराने वाले दोनों को आरोपी बनाए जाने का खतरा है। कथित तौर पर इसमें न्यूनतम 7 वर्ष से आजीवन कारावास और ₹10 लाख तक के अर्थदंड के प्रावधान शामिल हैं।
धार्मिक स्थलों को बंद करने का मुद्दा
याचिकाकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया है कि अधिनियम के अस्पष्ट प्रावधानों की आड़ में प्रशासन और पुलिस की ओर से धार्मिक एवं पवित्र स्थलों को कथित तौर पर अवैध रूप से बंद कराया जा रहा है, जिससे आम नागरिक अपनी आस्था के अनुसार उपासना करने से वंचित हो रहे हैं। न्यायालय से अंतरिम राहत के तौर पर ऐसे स्थलों को खोलने, लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और सामाजिक बहिष्कार पर रोक लगाने की भी अपील की गई है।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब देश के कई राज्यों में धर्म स्वतंत्रता कानूनों की संवैधानिकता को लेकर अदालतों में बहस जारी है। गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की युगल पीठ ने अब राज्य सरकार को अपना पक्ष रखने के लिए 3 सप्ताह का समय दिया है। सरकार के जवाब के बाद अंतरिम राहत के आवेदन पर अगली सुनवाई निर्धारित होगी, जो इस मामले की आगे की दिशा तय करेगी।