संतों और वीएचपी ने महाराष्ट्र सरकार के धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम के निर्णय की सराहना की
सारांश
Key Takeaways
- धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम का उद्देश्य धर्मांतरण रोकना है।
- ६० दिन का नोटिस धर्म परिवर्तन से पहले अनिवार्य है।
- दोषियों को ७ साल तक की जेल हो सकती है।
- संतों ने सरकार के कदम को महत्वपूर्ण बताया।
- प्रशासन की भूमिका पर असर डालेगा कानून का कार्यान्वयन।
मुंबई, २४ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र सरकार द्वारा "धर्म की स्वतंत्रता अधिनियम" लागू करने के निर्णय का संत समाज और विश्व हिंदू परिषद ने स्वागत करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम बताया है। इस निर्णय पर जगतगुरु सूर्याचार्य कृष्णदेवनंद गिरि महाराज, स्वामी श्री भरतानंद सरस्वती महाराज और विश्व हिंदू परिषद ने सरकार के प्रति आभार और बधाई व्यक्त की।
जगतगुरु सूर्याचार्य महाराज ने राष्ट्र प्रेस से बातचीत करते हुए कहा कि यह कानून पहले ही लागू होना चाहिए था। उन्होंने बताया कि पिछले १५ वर्षों में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म परिवर्तन हुआ है, जिसे समय रहते रोका जा सकता था। उन्होंने यह भी कहा कि सनातन धर्म के अनुयायी होने के नाते वे इस परंपरा को आगे बढ़ाते रहेंगे और समाज में जागरूकता फ़ैलाते रहेंगे।
स्वामी श्री भरतानंद सरस्वती महाराज ने महाराष्ट्र सरकार के फैसले को ऐतिहासिक और क्रांतिकारी करार दिया। उनका कहना है कि यदि यह कानून पहले लागू होता तो आदिवासी और गरीब वर्ग के लोगों को धर्मांतरण से बचाया जा सकता था। उनके अनुसार, इस अधिनियम के लागू होने से अब कमजोर वर्गों को बहकाकर धर्म परिवर्तन कराना आसान नहीं होगा।
उन्होंने आगे बताया कि सरकार ने भले ही महत्वपूर्ण कदम उठा लिया है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि पुलिस और प्रशासन इसे कितनी प्रभावी तरीके से लागू करते हैं। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अक्सर कानून तो बन जाते हैं, लेकिन उनका सही तरीके से पालन नहीं हो पाता, इसलिए प्रशासन को इस दिशा में विशेष सतर्कता बरतनी होगी।
संतों और संगठनों ने आशा व्यक्त की कि यह अधिनियम समाज में संतुलन और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखने में सहायक साबित होगा।
'महाराष्ट्र धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, २०२६' का उद्देश्य जबरन, धोखाधड़ी, प्रलोभन या विवाह के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकना है। इस कानून के तहत, धर्म परिवर्तन से पहले ६० दिन का नोटिस अनिवार्य है और दोषियों को ७ साल तक की जेल और १ लाख से ५ लाख तक के जुर्माने का प्रावधान है।