महाराष्ट्र: विधायक रईस शेख ने 'धर्म की स्वतंत्रता विधेयक' का विरोध किया, संयुक्त समिति में भेजने की अपील
सारांश
Key Takeaways
- रईस शेख ने विधेयक का विरोध किया।
- बिना डेटा और पारदर्शिता के इसे सही नहीं ठहराया जा सकता।
- धर्मांतरण विरोधी कानून पहले से कई राज्यों में लागू हैं।
- इस विधेयक में कड़ी सजा का प्रावधान है।
- जन-परामर्श की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
मुंबई, १६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र विधानसभा में प्रस्तुत 'धर्म की स्वतंत्रता विधेयक' को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने सोमवार को विधानसभा में इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा कि यह कानून नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों को सीमित करता है। उन्होंने कहा कि बिना पर्याप्त आंकड़ों और पारदर्शिता के इसे स्वीकार करना सही नहीं है।
उन्होंने कहा कि धर्म की स्वतंत्रता से जुड़ा यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं संवेदनशील मुद्दा है, इसलिए इस विधेयक को जल्दबाजी में पारित करने के बजाय इसे संयुक्त चयन समिति के पास भेजा जाना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने इस पर व्यापक जन-परामर्श कराने की भी मांग की।
रईस शेख ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, "मैंने आज विधानसभा में 'धर्म की स्वतंत्रता विधेयक' का विरोध किया। एक ऐसा कानून जो अनुच्छेद २५ को सीमित करता है और सबूत देने का बोझ नागरिकों पर डालता है, उसे बिना किसी डेटा या पारदर्शिता के सही नहीं ठहराया जा सकता। इतना महत्वपूर्ण विधेयक एक 'संयुक्त चयन समिति' और सार्वजनिक परामर्श के लिए भेजा जाना चाहिए।"
हालांकि, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट किया कि यह बिल किसी विशेष धर्म के खिलाफ नहीं है। उन्होंने जोर दिया कि यह विधेयक केवल जबरदस्ती, धोखाधड़ी या लालच देकर किए जाने वाले धार्मिक धर्मांतरण को रोकने के लिए लाया जा रहा है।
फडणवीस ने बताया कि धर्मांतरण विरोधी कानून पहले से ही कई राज्यों में लागू हैं, जैसे कि ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और राजस्थान। महाराष्ट्र ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लिया है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद २५ हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन, किसी को धोखाधड़ी, दबाव, जोर-जबरदस्ती या लालच देकर धर्मांतरण के लिए मजबूर करना गलत है, इसलिए ऐसे कानून की आवश्यकता है।
उन्होंने आगे कहा कि जो लोग अपनी मर्जी से धर्मांतरण करना चाहते हैं, उन्हें एक कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। उन्हें अधिकृत अधिकारियों को इसकी जानकारी देनी होगी और संबंधित अधिकारी जांच करेंगे कि धर्मांतरण अपनी मर्जी से हो रहा है या नहीं, उसके बाद ही मंजूरी दी जाएगी।
प्रस्तावित कानून के अनुसार, जोर-जबरदस्ती, धमकी, अनुचित दबाव, धोखाधड़ी या लालच देकर किए गए धर्मांतरण को गैर-कानूनी माना जाएगा। सिर्फ गैर-कानूनी धर्मांतरण के उद्देश्य से की गई शादियों को अदालत द्वारा रद्द और अमान्य घोषित किया जा सकता है। इस विधेयक में गैर-कानूनी धर्मांतरण का दोषी पाए जाने पर सात साल तक की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। महिलाओं, नाबालिगों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़े मामलों में और भी कड़ी सजा का प्रस्ताव है। शिकायतें प्रभावित व्यक्ति या उसके करीबी रिश्तेदारों द्वारा दर्ज की जा सकती हैं और कुछ मामलों में पुलिस भी कार्रवाई कर सकती है।