मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा: महाराष्ट्र का धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक किसी धर्म के खिलाफ नहीं है
सारांश
Key Takeaways
- महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक, 2026 किसी खास धर्म के खिलाफ नहीं है।
- यह विधेयक जबरदस्ती धर्मांतरण को रोकने का प्रयास करता है।
- संविधान का अनुच्छेद 25 धर्म को मानने का अधिकार देता है।
- धोखाधड़ी या प्रलोभन से धर्म परिवर्तन गलत है।
- अवैध धर्मांतरण के लिए सजा का प्रावधान है।
मुंबई, १६ मार्च (राष्ट्र प्रेस)। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने सोमवार को यह स्पष्ट किया कि महाराष्ट्र धार्मिक स्वतंत्रता विधेयक, २०२६, किसी विशेष धर्म के प्रति लक्षित नहीं है।
उन्होंने जोर देकर कहा कि यह विधेयक केवल धर्मांतरण को रोकने के लिए प्रस्तुत किया गया है, जो कि जबरदस्ती, धोखाधड़ी या प्रलोभन के माध्यम से किया जाता है।
फडणवीस ने विधानसभा में अपने भाषण में सरकार की स्थिति को स्पष्ट किया। यह विधेयक शुक्रवार को गृह (ग्रामीण) राज्य मंत्री पंकज भोयर द्वारा सदन में पेश किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य प्रलोभन, छल या बल प्रयोग के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना है।
उन्होंने यह भी बताया कि ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा, कर्नाटक और राजस्थान जैसे कई राज्यों में धर्मांतरण विरोधी कानून पहले से लागू हैं। महाराष्ट्र ने भी इसी दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लिया है।
उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद २५ हर नागरिक को अपने धर्म को मानने, पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार देता है। लेकिन, धोखाधड़ी, दबाव, बल प्रयोग या प्रलोभन के माध्यम से किसी को धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करना गलत है, इसलिए ऐसा कानून बनाना आवश्यक है।
उन्होंने आगे कहा कि स्वेच्छा से धर्म परिवर्तन करने का इच्छुक व्यक्ति को कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। उन्हें अधिकृत अधिकारियों को सूचित करना होगा, और सक्षम अधिकारी यह सुनिश्चित करेंगे कि धर्म परिवर्तन स्वेच्छा से किया गया है।
प्रस्तावित कानून के अनुसार, बल, धमकी, अनुचित प्रभाव, धोखाधड़ी या प्रलोभन के माध्यम से किए गए धर्म परिवर्तन को अवैध माना जाएगा। केवल अवैध धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से किए गए विवाहों को न्यायालय द्वारा अमान्य घोषित किया जा सकता है।
इस विधेयक में अवैध धर्मांतरण के दोषियों के लिए सात साल तक की कैद और जुर्माना लगाने का प्रावधान है। महिलाओं, नाबालिगों या अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति से जुड़े मामलों में और कड़ी सजा का प्रस्ताव है। पीड़ित व्यक्ति या उनके करीबी रिश्तेदार शिकायत दर्ज करा सकते हैं, और कुछ मामलों में पुलिस भी कार्रवाई कर सकती है।