झीरम घाटी हमला: NIA विशेष अदालत ने 10 माओवादी दोषियों को सुनाई मौत की सजा
सारांश
मुख्य बातें
NIA की विशेष अदालत, जगदलपुर ने 16 सितंबर 2026 को छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित झीरम घाटी हमले में प्रतिबंधित संगठन सीपीआई (माओवादी) के 10 दोषी कैडरों को मृत्युदंड सुनाया। यह हमला 25 मई 2013 को बस्तर जिले के एनएच-221 पर हुआ था, जिसमें 24 नागरिकों और पुलिसकर्मियों की मौके पर ही जान चली गई थी।
मुख्य घटनाक्रम
अदालत ने इससे पहले 5 सितंबर 2026 को सभी 10 आरोपियों को विभिन्न धाराओं के तहत दोषी करार दिया था और सजा के बारे में फैसला सुरक्षित रख लिया था। बुधवार को सुनाए गए फैसले में सभी दस दोषियों को मृत्युदंड की सजा दी गई। यह देश के नक्सल-विरोधी न्यायिक इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है।
हमले की पृष्ठभूमि
25 मई 2013 को बस्तर जिले के दरभा थाना क्षेत्र में कांग्रेस की 'परिवर्तन यात्रा' के काफिले पर माओवादियों ने सुनियोजित हमला किया था। जांच के अनुसार, सीपीआई (माओवादी) के सशस्त्र कैडरों ने स्थानीय समितियों और डिवीजनों के साथ मिलकर वरिष्ठ कांग्रेस नेताओं और सुरक्षा बलों को निशाना बनाने की आपराधिक साजिश रची थी।
हमले में IED विस्फोट के साथ-साथ अंधाधुंध गोलीबारी और ग्रेनेड विस्फोट किए गए थे। इस हमले में 24 नागरिकों और पुलिसकर्मियों की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि 35 से अधिक नागरिक एवं पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए थे। घायलों में से तीन ने बाद में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया था।
जांच और आरोपों का दायरा
NIA ने इस मामले में कुल 39 आरोपियों के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किए थे। पहला आरोपपत्र 25 सितंबर 2014 को नौ आरोपियों के विरुद्ध और पूरक आरोपपत्र 28 सितंबर 2015 को शेष 30 आरोपियों के खिलाफ दाखिल किया गया था। शुरुआती मुकदमे में 10 आरोपियों के विरुद्ध सुनवाई पूरी हुई और अभियोजन पक्ष की ओर से 101 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। आरोपियों में से एक की न्यायिक हिरासत के दौरान मौत हो गई थी।
जांच में यह भी सामने आया कि हमले के बाद माओवादी कैडरों ने मृतकों और घायलों से हथियार, गोला-बारूद, वॉकी-टॉकी सेट, मोबाइल फोन और अन्य सामान लूट लिया था।
माओवादी रणनीति का हिस्सा
NIA की जांच के अनुसार, यह हमला सीपीआई (माओवादी) के टैक्टिकल काउंटर ऑफेंसिव कैंपेन (TCOC) का हिस्सा था, जिसके तहत संगठन ने परिवर्तन यात्रा के काफिले में मौजूद वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं और सुरक्षाकर्मियों को सोची-समझी रणनीति के तहत निशाना बनाया। गौरतलब है कि यह हमला माओवादी हिंसा के इतिहास में सबसे घातक राजनीतिक-सैन्य हमलों में से एक रहा है।
आगे की राह
मामले में शेष आरोपियों के विरुद्ध सुनवाई अभी जारी है। मृत्युदंड की यह सजा उच्च न्यायालय में पुष्टि के लिए भेजी जाएगी, जो भारतीय दंड प्रक्रिया के अनुसार अनिवार्य है। न्यायिक विशेषज्ञों के अनुसार, यह फैसला नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में न्यायिक प्रक्रिया की दीर्घकालिक परीक्षा के नतीजों में एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है।