चोरबाट ला की लड़ाई: फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स को दी श्रद्धांजलि
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय सेना की फायर एंड फ्यूरी कॉर्प्स ने 30 मई 2025 को दिवंगत कर्नल सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के वीर जवानों को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह श्रद्धांजलि 30 मई 1999 को बटालिक सेक्टर में लड़ी गई चोरबाट ला की ऐतिहासिक लड़ाई की वर्षगाँठ पर दी गई, जो कारगिल युद्ध की सबसे निर्णायक सैन्य कार्रवाइयों में से एक मानी जाती है।
एक्स पर श्रद्धांजलि और उद्धृत वक्तव्य
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर साझा की गई पोस्ट में कॉर्प्स ने कर्नल (तत्कालीन मेजर) सोनम वांगचुक के शब्दों को उद्धृत किया: 'चोरबाट ला में मैंने जो किया, वह मेरा कर्तव्य था, कोई असाधारण कार्य नहीं।' पोस्ट में कहा गया कि उन्होंने अत्यंत विषम परिस्थितियों में अग्रिम पंक्ति से नेतृत्व करते हुए 'ऑपरेशन विजय' के दौरान भारत को शुरुआती और निर्णायक सफलताएँ दिलाईं।
पोस्ट में आगे उल्लेख था: 'मेजर सोनम वांगचुक और 3 लद्दाख स्काउट्स के बहादुर जवानों ने बटालिक सेक्टर में चोरबाट ला की लड़ाई के दौरान इतिहास रच दिया।' शून्य से नीचे के तापमान, बर्फीले तूफानों, दुश्मन की गोलाबारी और दुर्गम भूभाग के बीच उन्होंने सोनम-1 और सोनम-2 पर निगरानी चौकियाँ स्थापित कीं, दुश्मन का सफाया किया और पाकिस्तानी सैनिकों को लद्दाख पर्वत श्रृंखला की रिजलाइन पर नियंत्रण जमाने से रोका।
चोरबाट ला की लड़ाई: पृष्ठभूमि
अत्यधिक ऊँचाई और हिमाच्छादित क्षेत्र में लड़ी गई चोरबाट ला की लड़ाई, कारगिल संघर्ष के दौरान घुसपैठियों द्वारा कब्जाए गए रणनीतिक ठिकानों को पुनः हासिल करने के लिए भारत द्वारा चलाए गए व्यापक 'ऑपरेशन विजय' का अभिन्न हिस्सा थी। आधिकारिक अभिलेखों और सैन्य विवरणों के अनुसार, मई 1999 की शुरुआत में घुसपैठ का पता चलते ही लद्दाख स्काउट्स उन पहली इकाइयों में शामिल थी जिन्हें बटालिक सेक्टर में तैनात किया गया।
यह अभियान प्रायः 18,000 फीट से अधिक की ऊँचाई पर भारी तोपखाने की गोलाबारी और कठोर मौसम के बीच संचालित किए गए। बटालिक क्षेत्र में रिजलाइनों पर नियंत्रण, नियंत्रण रेखा (एलओसी) के साथ आवाजाही के मार्गों पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण था।
लद्दाख स्काउट्स की भूमिका
'स्नो वॉरियर्स' (हिम योद्धा) के नाम से विख्यात लद्दाख स्काउट्स ने इस अभियान में उच्च हिमालयी युद्ध में अपनी अद्वितीय विशेषज्ञता का परिचय दिया। इस इकाई ने प्रमुख पर्वतीय रिजलाइनों से दुश्मन को खदेड़ने के लिए कई हमले और टोही अभियान चलाए — दुनिया की सबसे कठिन और प्रतिकूल परिस्थितियों में। गौरतलब है कि यह वही इकाई है जिसे पहाड़ी युद्ध में महारत के कारण भारतीय सेना की सबसे विशिष्ट रेजिमेंटों में गिना जाता है।
कर्नल सोनम वांगचुक: 'लायन ऑफ लद्दाख'
भारतीय सेना के सम्मानित अधिकारी और लद्दाख की सबसे प्रतिष्ठित सैन्य हस्तियों में से एक कर्नल सोनम वांगचुक को 'ऑपरेशन विजय' के दौरान उनके असाधारण साहस के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था। 'लायन ऑफ लद्दाख' के नाम से प्रसिद्ध कर्नल वांगचुक का 10 अप्रैल 2026 को हार्ट अटैक से निधन हो गया। सेना में आज भी उनके योगदान को गहरे सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है।
यह श्रद्धांजलि ऐसे समय में आई है जब भारत प्रतिवर्ष कारगिल विजय दिवस (26 जुलाई) से पूर्व उन वीरों को याद करता है जिन्होंने 1999 के युद्ध में राष्ट्र की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व अर्पित किया। चोरबाट ला की यह विरासत भारतीय सैन्य इतिहास का एक गौरवशाली अध्याय बन चुकी है।