गन हिल की विजय: बोफोर्स तोपों और 13 J&K राइफल्स ने कैसे बदला कारगिल युद्ध का रुख
सारांश
मुख्य बातें
13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स ने 20 जून 1999 की सुबह 5 बजे पॉइंट 5140 — जिसे अब गन हिल के नाम से जाना जाता है — पर तिरंगा फहराया और कारगिल युद्ध में भारत को एक निर्णायक बढ़त दिलाई। द्रास क्षेत्र में लगभग 17,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित इस चोटी पर विजय ने न केवल दुश्मन की एक प्रमुख निगरानी-चौकी को ध्वस्त किया, बल्कि उच्च हिमालयी युद्धकला में एक दुर्लभ कीर्तिमान भी स्थापित किया — एक भी भारतीय सैनिक शहीद हुए बिना।
रणनीतिक महत्व: क्यों ज़रूरी था पॉइंट 5140
सेना के अनुसार, पॉइंट 5140 द्रास क्षेत्र की समस्त गतिविधियों पर दुश्मन को सीधी दृष्टि-रेखा देता था। इस चोटी से दुश्मन न केवल भारतीय सैन्य आवाजाही पर नज़र रख सकता था, बल्कि आसपास की अन्य घुसपैठ-ग्रस्त चोटियों को भी रसद और सामरिक सहायता पहुंचा सकता था। इसलिए इस ऊंचाई को मुक्त कराना ऑपरेशन विजय की एक अनिवार्य शर्त बन गई थी।
मुख्य घटनाक्रम: रात के अंधेरे में बुनी गई विजय
13 और 14 जून 1999 की रात 18 ग्रेनेडियर्स ने 'हंप' पर कब्जा किया, जबकि 13 जम्मू एवं कश्मीर राइफल्स ने 'रॉकी नॉब' को अपने नियंत्रण में ले लिया। इन अग्रिम पदों से भारतीय तोपखाने को सटीक निशाना साधने का अवसर मिला।
इसके बाद 19 और 20 जून 1999 की रात 'शत्रुनाश' नामक व्यापक तोपखाना योजना क्रियान्वित की गई। बोफोर्स तोपों और बहु-नाल रॉकेट प्रक्षेपक प्रणालियों ने पूर्व और पश्चिम दोनों दिशाओं से दुश्मन के बंकरों पर लगातार आग बरसाई। यह गोलाबारी इतनी सटीक और व्यापक थी कि दुश्मन की रक्षा-क्षमता लगभग पूरी तरह बिखर गई। तोपखाने की इस भीषण मार के बाद भारतीय पैदल सेना ने आगे बढ़कर चोटी पर कब्जा किया।
ऐतिहासिक उपलब्धि: शून्य हानि, शत-प्रतिशत लक्ष्य
उच्च हिमालयी युद्ध के इतिहास में यह संभवतः पहला अवसर था जब 17,000 फीट की ऊंचाई पर एक अत्यधिक सुरक्षित दुश्मन ठिकाने पर कब्जा किसी भी भारतीय सैनिक की शहादत के बिना हासिल किया गया। सैन्य विश्लेषकों के अनुसार, यह उपलब्धि तोपखाने की सटीकता और पैदल सेना के समन्वय का अनुकरणीय उदाहरण है। गौरतलब है कि इसी असाधारण सफलता को सम्मान देने के लिए वर्ष 2023 में पॉइंट 5140 का नाम बदलकर गन हिल रखा गया।
ऑपरेशन विजय की 27वीं वर्षगांठ: अतीत और वर्तमान का सेतु
ऑपरेशन विजय की 27वीं वर्षगांठ पर भारतीय सेना ने गन हिल तक एक विशेष अभियान आयोजित किया। इसमें 1999 के युद्ध में भाग लेने वाली तोपखाना इकाइयों के 25 सैनिक और स्थानीय सैन्य इकाइयों के 101 सैनिक शामिल हुए। यह आयोजन केवल एक स्मरण-यात्रा नहीं था — यह पुराने और नए सैनिकों के बीच साहस, परंपरा और बलिदान की विरासत को जीवंत रखने का प्रयास था।
विरासत: गन हिल आज भी सुनाती है वीरों की गाथा
आज गन हिल की चोटी पर लहराता तिरंगा उस संकल्प का प्रतीक है जिसने असंभव को संभव कर दिखाया। द्रास की बर्फीली चोटियों पर लिखी गई यह विजय-गाथा भारतीय सैन्य इतिहास में तोपखाने और पैदल सेना के अद्वितीय समन्वय की मिसाल के रूप में दर्ज है। आने वाली पीढ़ियों के लिए यह स्थल राष्ट्रीय गौरव और सैन्य पराक्रम का एक जीवंत स्मारक बना रहेगा।