खनिज संशोधन विधेयक 2026: सीएम हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति मुर्मु को लिखा पत्र, संघीय ढाँचे पर खतरे की चेतावनी
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पाँच पन्नों का विस्तृत पत्र लिखकर संसद के दोनों सदनों से पारित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर गंभीर आपत्ति जताई और हस्तक्षेप का आग्रह किया। सोरेन ने इस विधेयक को झारखंड की वित्तीय स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों के संतुलन के लिए सीधी चुनौती बताया। उन्होंने यह पत्र सोशल मीडिया पर भी साझा किया।
विधेयक की आपत्तिजनक धारा क्या है
मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से प्रस्तावित एमएमडीआर अधिनियम की नई धारा 9डी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनके अनुसार, इस प्रावधान के लागू होने के बाद यदि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली भूमि पर कोई कर, सेस या अन्य शुल्क लगाती हैं, तो उन पर केंद्र सरकार की निर्धारित शर्तें और सीमाएँ लागू होंगी। सोरेन ने चेताया कि इसका असर पहले से लगाए गए सेस की बकाया राशि पर भी पड़ सकता है।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्यों को खनिज वाली भूमि पर कर या सेस लगाने का अधिकार स्वीकार किया था। इसी निर्णय के आधार पर झारखंड विधानसभा ने वर्ष 2024 में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस कानून पारित किया था। अब नया केंद्रीय विधेयक इसी अधिकार को सीमित करने की आशंका उत्पन्न कर रहा है।
झारखंड की अर्थव्यवस्था पर संभावित असर
सोरेन ने झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024-25 में राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत हिस्सा खनन क्षेत्र से प्राप्त हुआ। मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से 2024-25 में ₹1,379 करोड़ और 2025-26 में ₹7,488 करोड़ की आय हुई। 2026-27 में इससे लगभग ₹13,215 करोड़ मिलने का अनुमान है।
मुख्यमंत्री ने आशंका जताई कि नया कानून लागू होने पर राज्य को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल वित्तीय प्रश्न नहीं है — बल्कि यह तय करता है कि राज्य अपनी खनिज संपदा पर कितना नियंत्रण रख सकेगा।
जनकल्याण योजनाओं पर खतरा
सोरेन ने मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का उदाहरण देते हुए बताया कि इस योजना से 50 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा की योजनाएँ भी राज्य की वित्तीय क्षमता पर निर्भर हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि सेस राशि किसी एक योजना के लिए सीधे आवंटित नहीं है, परंतु यह अतिरिक्त आय राज्य के समग्र खर्च को सहारा देती है।
आदिवासी समाज और विस्थापन का ऐतिहासिक संदर्भ
मुख्यमंत्री ने पत्र में झारखंड की खनिज संपदा से जुड़े दीर्घकालिक सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि देश के औद्योगिक विकास में झारखंड ने बड़ा योगदान दिया है, लेकिन खनन की कीमत यहाँ के लोगों — विशेषकर आदिवासी समाज — को विस्थापन, भूमि हानि, प्रदूषण और पारंपरिक आजीविका के नष्ट होने के रूप में चुकानी पड़ी है। ऐसे में खनन से होने वाली आय का उचित हिस्सा खनन-प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर व्यय होना संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।
सोरेन ने राष्ट्रपति को उनके झारखंड से व्यक्तिगत जुड़ाव की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि 2015 से 2021 तक राज्यपाल के रूप में मुर्मु ने आदिवासी और खनन-प्रभावित क्षेत्रों को करीब से देखा है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से विधेयक के प्रभावों पर गंभीरता से विचार कर संविधान के तहत उपलब्ध विकल्पों के आधार पर उचित निर्णय लेने का आग्रह किया है।
आगे क्या होगा
यह ऐसे समय में आया है जब खनिज-समृद्ध राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व-साझेदारी का विवाद नया नहीं है — झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य लंबे समय से खनिज रॉयल्टी की दरों और नियंत्रण पर केंद्र से असहमति रखते आए हैं। राष्ट्रपति के फैसले पर अब सभी की नजरें टिकी हैं — यदि वे विधेयक पर पुनर्विचार के लिए संसद को लौटाती हैं या सुप्रीम कोर्ट की राय माँगती हैं, तो यह संघीय बहस का नया अध्याय होगा।