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खनिज संशोधन विधेयक 2026: सीएम हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति मुर्मु को लिखा पत्र, संघीय ढाँचे पर खतरे की चेतावनी

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खनिज संशोधन विधेयक 2026: सीएम हेमंत सोरेन ने राष्ट्रपति मुर्मु को लिखा पत्र, संघीय ढाँचे पर खतरे की चेतावनी

सारांश

झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने खनिज संशोधन विधेयक 2026 को संघीय ढाँचे पर सीधा हमला बताते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पाँच पन्नों का पत्र लिखा। राज्य के गैर-कर राजस्व का 84.9% खनन से आता है — नया कानून सालाना ₹13,215 करोड़ तक के राजस्व पर खतरा पैदा कर सकता है।

मुख्य बातें

सीएम हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को खान एवं खनिज संशोधन विधेयक 2026 पर पाँच पन्नों का पत्र लिखकर हस्तक्षेप की माँग की।
विधेयक की प्रस्तावित धारा 9डी राज्यों द्वारा खनिज भूमि पर लगाए जाने वाले कर और सेस को केंद्र की शर्तों के अधीन कर देगी।
झारखंड के अपने गैर-कर राजस्व का 84.9% खनन क्षेत्र से आता है; मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से 2026-27 में ₹13,215 करोड़ मिलने का अनुमान।
सर्वोच्च न्यायालय की नौ-सदस्यीय संविधान पीठ ने राज्यों को खनिज भूमि पर कर लगाने का अधिकार दिया था, जिसके आधार पर 2024 में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस कानून बना।
मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना सहित 50 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ देने वाली कल्याण योजनाएँ इस राजस्व पर निर्भर हैं।
सोरेन ने राष्ट्रपति को उनके 2015-2021 के झारखंड राज्यपाल कार्यकाल की याद दिलाते हुए संवैधानिक विकल्पों पर उचित निर्णय लेने का आग्रह किया।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 13 अगस्त 2026 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को पाँच पन्नों का विस्तृत पत्र लिखकर संसद के दोनों सदनों से पारित खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पर गंभीर आपत्ति जताई और हस्तक्षेप का आग्रह किया। सोरेन ने इस विधेयक को झारखंड की वित्तीय स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों के संतुलन के लिए सीधी चुनौती बताया। उन्होंने यह पत्र सोशल मीडिया पर भी साझा किया।

विधेयक की आपत्तिजनक धारा क्या है

मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से प्रस्तावित एमएमडीआर अधिनियम की नई धारा 9डी पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उनके अनुसार, इस प्रावधान के लागू होने के बाद यदि राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज वाली भूमि पर कोई कर, सेस या अन्य शुल्क लगाती हैं, तो उन पर केंद्र सरकार की निर्धारित शर्तें और सीमाएँ लागू होंगी। सोरेन ने चेताया कि इसका असर पहले से लगाए गए सेस की बकाया राशि पर भी पड़ सकता है।

गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों वाली संविधान पीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में राज्यों को खनिज वाली भूमि पर कर या सेस लगाने का अधिकार स्वीकार किया था। इसी निर्णय के आधार पर झारखंड विधानसभा ने वर्ष 2024 में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस कानून पारित किया था। अब नया केंद्रीय विधेयक इसी अधिकार को सीमित करने की आशंका उत्पन्न कर रहा है।

झारखंड की अर्थव्यवस्था पर संभावित असर

सोरेन ने झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण के आँकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि वर्ष 2024-25 में राज्य के अपने गैर-कर राजस्व का करीब 84.9 प्रतिशत हिस्सा खनन क्षेत्र से प्राप्त हुआ। मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से 2024-25 में ₹1,379 करोड़ और 2025-26 में ₹7,488 करोड़ की आय हुई। 2026-27 में इससे लगभग ₹13,215 करोड़ मिलने का अनुमान है।

मुख्यमंत्री ने आशंका जताई कि नया कानून लागू होने पर राज्य को प्रतिवर्ष हजारों करोड़ रुपये के संभावित राजस्व का नुकसान हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल वित्तीय प्रश्न नहीं है — बल्कि यह तय करता है कि राज्य अपनी खनिज संपदा पर कितना नियंत्रण रख सकेगा।

जनकल्याण योजनाओं पर खतरा

सोरेन ने मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना का उदाहरण देते हुए बताया कि इस योजना से 50 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता दी जा रही है। इसके अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा की योजनाएँ भी राज्य की वित्तीय क्षमता पर निर्भर हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि सेस राशि किसी एक योजना के लिए सीधे आवंटित नहीं है, परंतु यह अतिरिक्त आय राज्य के समग्र खर्च को सहारा देती है।

आदिवासी समाज और विस्थापन का ऐतिहासिक संदर्भ

मुख्यमंत्री ने पत्र में झारखंड की खनिज संपदा से जुड़े दीर्घकालिक सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि देश के औद्योगिक विकास में झारखंड ने बड़ा योगदान दिया है, लेकिन खनन की कीमत यहाँ के लोगों — विशेषकर आदिवासी समाज — को विस्थापन, भूमि हानि, प्रदूषण और पारंपरिक आजीविका के नष्ट होने के रूप में चुकानी पड़ी है। ऐसे में खनन से होने वाली आय का उचित हिस्सा खनन-प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर व्यय होना संवैधानिक और नैतिक दायित्व है।

सोरेन ने राष्ट्रपति को उनके झारखंड से व्यक्तिगत जुड़ाव की भी याद दिलाई। उन्होंने कहा कि 2015 से 2021 तक राज्यपाल के रूप में मुर्मु ने आदिवासी और खनन-प्रभावित क्षेत्रों को करीब से देखा है। मुख्यमंत्री ने राष्ट्रपति से विधेयक के प्रभावों पर गंभीरता से विचार कर संविधान के तहत उपलब्ध विकल्पों के आधार पर उचित निर्णय लेने का आग्रह किया है।

आगे क्या होगा

यह ऐसे समय में आया है जब खनिज-समृद्ध राज्यों और केंद्र के बीच राजस्व-साझेदारी का विवाद नया नहीं है — झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे राज्य लंबे समय से खनिज रॉयल्टी की दरों और नियंत्रण पर केंद्र से असहमति रखते आए हैं। राष्ट्रपति के फैसले पर अब सभी की नजरें टिकी हैं — यदि वे विधेयक पर पुनर्विचार के लिए संसद को लौटाती हैं या सुप्रीम कोर्ट की राय माँगती हैं, तो यह संघीय बहस का नया अध्याय होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

नया केंद्रीय विधेयक उसी अधिकार को सीमित करता प्रतीत होता है। 84.9% गैर-कर राजस्व की खनन पर निर्भरता झारखंड की संरचनात्मक कमज़ोरी भी उजागर करती है — जिसे विविधीकरण की ज़रूरत है, न केवल केंद्र से लड़ाई की। असली सवाल यह है कि राष्ट्रपति संवैधानिक विकल्पों का उपयोग करती हैं या नहीं — और यदि नहीं, तो यह विवाद न्यायपालिका की दहलीज़ तक पहुँचना तय है।
RashtraPress
14 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

खान एवं खनिज संशोधन विधेयक 2026 क्या है और इसमें क्या बदलाव प्रस्तावित हैं?
यह संसद के दोनों सदनों से पारित केंद्रीय विधेयक है जो एमएमडीआर अधिनियम में नई धारा 9डी जोड़ता है। इस धारा के तहत राज्य सरकारें खनिज अधिकारों या खनिज भूमि पर कोई भी कर, सेस या शुल्क लगाने से पहले केंद्र की निर्धारित शर्तों और सीमाओं का पालन करने के लिए बाध्य होंगी।
झारखंड को इस विधेयक से कितना राजस्व नुकसान हो सकता है?
झारखंड आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य के गैर-कर राजस्व का 84.9% खनन क्षेत्र से आता है। मिनरल बेयरिंग लैंड सेस से 2026-27 में ₹13,215 करोड़ मिलने का अनुमान है। सीएम सोरेन ने चेताया है कि नया कानून लागू होने पर राज्य को हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय के किस फैसले का पत्र में उल्लेख किया गया है?
सीएम सोरेन ने सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों वाली संविधान पीठ के उस फैसले का उल्लेख किया है जिसमें राज्यों को खनिज भूमि पर कर या सेस लगाने का संवैधानिक अधिकार माना गया था। इसी फैसले के आधार पर झारखंड विधानसभा ने 2024 में मिनरल बेयरिंग लैंड सेस कानून बनाया था।
इस विधेयक से झारखंड की जनकल्याण योजनाओं पर क्या असर पड़ेगा?
सोरेन के अनुसार मुख्यमंत्री मंईयां सम्मान योजना जिससे 50 लाख से अधिक महिलाओं को आर्थिक सहायता मिलती है, सहित शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल और ग्रामीण विकास की योजनाएँ राज्य की वित्तीय क्षमता पर निर्भर हैं। खनन राजस्व में कमी इन सभी योजनाओं के क्रियान्वयन को प्रभावित कर सकती है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु से हस्तक्षेप क्यों माँगा गया है?
सोरेन ने राष्ट्रपति से संविधान के तहत उपलब्ध विकल्पों के आधार पर उचित निर्णय लेने का आग्रह किया है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मुर्मु 2015 से 2021 तक झारखंड की राज्यपाल रहीं और उन्होंने आदिवासी व खनन-प्रभावित क्षेत्रों की समस्याओं को करीब से देखा है, इसलिए वे इस मामले की संवेदनशीलता को बेहतर समझती हैं।
राष्ट्र प्रेस
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