एमएमडीआर संशोधन पर झारखंड में लेटर वार: वित्त मंत्री किशोर बोले — ₹14,000 करोड़ राजस्व खतरे में, मरांडी ने सेस नीति पर उठाए सवाल
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड में खनिज राजस्व को लेकर राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी के बीच तीखी पत्र-युद्ध छिड़ गई है। 28 अगस्त को सामने आए इस विवाद की जड़ में केंद्र सरकार का प्रस्तावित खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम — एमएमडीआर संशोधन है, जिसे किशोर ने राज्य के आर्थिक हितों के लिए सीधा खतरा बताया है।
वित्त मंत्री का पक्ष: ₹14,000 करोड़ और ₹1.36 लाख करोड़ की बकाया वसूली दांव पर
वित्त मंत्री किशोर ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के आलोक में झारखंड विधानसभा ने खनन क्षेत्रों में सेस लगाने का विधेयक पारित किया था। इससे वित्त वर्ष 2026-27 में राज्य को करीब ₹14,000 करोड़ का राजस्व मिलने का अनुमान था। उनके अनुसार, एमएमडीआर कानून में प्रस्तावित धारा 9डी जोड़े जाने से यह संभावित आय खतरे में पड़ सकती है।
किशोर ने यह भी आशंका जताई कि संशोधन का असर विभिन्न कोयला कंपनियों पर झारखंड की करीब ₹1.36 लाख करोड़ की बकाया राशि की वसूली पर पड़ सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि खनन से आर्थिक लाभ केंद्र को मिलता है, जबकि झारखंड को विस्थापन, भूमि से बेदखली, प्रदूषण, खराब सड़कें और स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है। उन्होंने मरांडी से राज्य के हित में इस मुद्दे पर आवाज उठाने का आग्रह किया।
मरांडी का पलटवार: सेस नीति और वित्तीय प्रबंधन पर सवाल
नेता प्रतिपक्ष मरांडी ने जवाब में कहा कि एमएमडीआर संशोधन किसी एक राज्य के लिए नहीं, बल्कि पूरे देश में समान रूप से लागू होगा। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि यह संशोधन राष्ट्रीय स्तर पर है, तो केवल झारखंड सरकार को ही इससे आपत्ति क्यों है।
मरांडी के अनुसार, पिछले वर्ष सेस से करीब ₹7,500 करोड़ प्राप्त हुए, लेकिन इसी दौरान खनन रॉयल्टी बजट अनुमान के ₹22,000 करोड़ के मुकाबले घटकर करीब ₹16,000 करोड़ रह गई। उन्होंने दावा किया कि कोयले पर ₹450 प्रति टन और लौह अयस्क पर ₹600 प्रति टन का अतिरिक्त उपकर लगाए जाने से झारखंड के वैध खनिज बाजार अप्रतिस्पर्धी हो गए हैं।
सिंहभूम में खदानें बंद, मजदूरों पर रोजगार का संकट
मरांडी ने कहा कि ऊंचे उपकर के कारण सिंहभूम क्षेत्र में कई खदानें और आयरन क्रशर बंद पड़े हैं, जिससे स्थानीय मजदूरों के सामने रोजगार का गंभीर संकट पैदा हुआ है। उन्होंने ओडिशा का उदाहरण देते हुए कहा कि उस राज्य ने बड़ी संख्या में खनिज ब्लॉकों की नीलामी कर कई खदानें चालू कीं, जिससे पिछले कुछ वर्षों में करीब ₹87,000 करोड़ का राजस्व प्राप्त हुआ।
इसके विपरीत, उन्होंने झारखंड में कई लौह अयस्क खदानों के बंद होने और केंद्र द्वारा आवंटित कुछ कोल ब्लॉकों के चालू नहीं होने पर सवाल उठाए। उनका दावा है कि खदानों की नीलामी और उत्पादन बढ़ाकर झारखंड हर साल ₹20,000 से ₹25,000 करोड़ अतिरिक्त कमा सकता था।
सेस दरों की तुलनात्मक समीक्षा और नीतिगत सवाल
मरांडी ने सेस दरों की तुलना करते हुए बताया कि ओडिशा में अतिरिक्त उपकर नहीं है, जबकि छत्तीसगढ़ में यह करीब ₹22.50 प्रति टन है। ऐसे में झारखंड में कोयले और लौह अयस्क पर ₹600 प्रति टन तक उपकर लगाने से पहले पड़ोसी राज्यों की नीतियों का तुलनात्मक अध्ययन किया गया था या नहीं, यह उन्होंने जानना चाहा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रस्तावित एमएमडीआर संशोधन केवल प्रमुख खनिजों पर लागू है और लघु खनिजों पर इसका कोई असर नहीं होगा।
वित्तीय प्रबंधन पर भी निशाना
नेता प्रतिपक्ष ने राज्य के वित्तीय प्रबंधन पर भी सवाल उठाए। उन्होंने दावा किया कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में विभागों ने कुल बजट का एक प्रतिशत भी खर्च नहीं किया। उन्होंने बालू घाटों और पत्थर खदानों की नीलामी में कथित देरी, उपयोगिता प्रमाण पत्र जमा न होने, निकाय चुनाव और राज्य वित्त आयोग के गठन में देरी के कारण केंद्रीय अनुदान के नुकसान का भी आरोप लगाया। यह विवाद झारखंड में खनिज राजस्व नीति और केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों पर गहरे सवाल खड़े करता है — और आने वाले दिनों में विधानसभा में इस मुद्दे के और तीखे होने की संभावना है।