10 अगस्त 2026
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लोकसभा में MMDR संशोधन विधेयक 2026 पेश, राज्यों के खनिज कर अधिकार होंगे सीमित

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लोकसभा में MMDR संशोधन विधेयक 2026 पेश, राज्यों के खनिज कर अधिकार होंगे सीमित

सारांश

केंद्र सरकार ने लोकसभा में MMDR संशोधन विधेयक 2026 पेश कर राज्यों के खनिज कराधान अधिकारों पर सीधी रोक लगाने का प्रस्ताव किया है। यह विधेयक खनन क्षेत्र में निवेश-अनुकूल माहौल बनाने की कोशिश है, लेकिन संघवाद और राज्यों के राजस्व अधिकारों पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

मुख्य बातें

कोयला और खान मंत्री जी.
किशन रेड्डी ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में MMDR संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया।
विधेयक राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों पर कोई भी कर, उपकर या शुल्क लगाने से पूरी तरह प्रतिबंधित करता है।
केंद्र सरकार को खनिज-युक्त भूमि के विनियमन का अधिकार देने का प्रस्ताव है।
विधेयक के लागू होने से पहले वसूले जा चुके कर वापस नहीं होंगे; अवसूली राशि अमान्य मानी जाएगी।
सरकार का तर्क है कि असमान कराधान से सप्लाई चेन बाधित होती है और खनिज आयात बढ़ता है।

केंद्र सरकार ने 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में खान और खनिज (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 पेश किया, जो राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों पर कोई भी कर, उपकर या शुल्क लगाने से रोकेगा। कोयला और खान मंत्री जी. किशन रेड्डी द्वारा सदन में प्रस्तुत यह विधेयक खनन क्षेत्र में एकरूपता, स्थिरता और निवेश-अनुकूल वातावरण बनाने की दिशा में केंद्र का बड़ा कदम माना जा रहा है।

विधेयक में क्या है प्रमुख प्रावधान

विधेयक में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि 'राज्य सरकार द्वारा खनिज अधिकारों पर कोई कर, उपकर या ऐसा ही कोई अन्य शुल्क — चाहे उसे किसी भी नाम से पुकारा जाए — नहीं लगाया जाएगा।' यह प्रतिबंध खनिज-युक्त भूमि पर भी लागू होगा, विशेष रूप से उन मामलों में जहाँ शुल्क खनिज की मात्रा, मूल्य या रॉयल्टी के आधार पर तय होते हैं।

हालाँकि, यदि केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों के अनुसार कोई शुल्क लगाया गया हो, तो वह इस प्रतिबंध के दायरे से बाहर रहेगा। इसके साथ ही, विधेयक में एमएमडीआर अधिनियम में एक नया अनुभाग जोड़ने का प्रस्ताव है।

पूर्व-लागू करों पर स्थिति

विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस संशोधन के लागू होने से पहले जो कर या शुल्क राज्य सरकारों द्वारा पहले ही वसूल किए जा चुके हैं, उन्हें वापस नहीं किया जाएगा। दूसरी ओर, जो राशि अभी तक जमा या वसूल नहीं हुई, उसे अमान्य माना जाएगा। यह प्रावधान पिछली तारीख से कर लगाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाने के उद्देश्य से जोड़ा गया है।

केंद्र का तर्क और मंत्री का बयान

मंत्री रेड्डी ने सदन में कहा कि राज्यों के बीच खनिज करों में बड़ी असमानता से सप्लाई चेन बाधित होती है और घरेलू उद्योगों की लागत बढ़ती है। उन्होंने चेतावनी दी कि अत्यधिक या असंतुलित कर उद्योगों को स्थानीय खनिज स्रोतों की बजाय आयात की ओर धकेल सकते हैं, जिससे परिवहन लागत और प्रदूषण दोनों बढ़ेंगे।

रेड्डी ने कहा, 'पर्याप्त स्थानीय खनिज संसाधन होने के बावजूद खनिजों के आयात में बढ़ोतरी का जोखिम है, क्योंकि घरेलू खनिज की आपूर्ति महंगी हो जाती है।' उन्होंने यह भी जोड़ा कि पूर्वव्यापी कराधान से कानूनी अनिश्चितता उत्पन्न होती है और निवेशकों का भरोसा कमज़ोर होता है।

केंद्र-राज्य संबंधों पर असर

यह विधेयक ऐसे समय में आया है जब खनिज-संपन्न राज्य — विशेषकर झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ — खनिज राजस्व पर अपने अधिकारों को लेकर सक्रिय रहे हैं। गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय ने हाल के वर्षों में खनिज कराधान पर राज्यों के अधिकार से जुड़े कई महत्त्वपूर्ण फैसले सुनाए हैं, जिनके बाद केंद्र-राज्य विवाद और गहरे हुए थे। आलोचकों का कहना है कि यह विधेयक संवैधानिक संघवाद की भावना के विरुद्ध जा सकता है।

आगे की राह

विधेयक को अब लोकसभा में विस्तृत चर्चा और मतदान के लिए रखा जाएगा। विपक्षी दलों की प्रतिक्रिया और खनिज-संपन्न राज्यों की आपत्तियाँ इसके संसदीय मार्ग को प्रभावित कर सकती हैं। यदि यह विधेयक पारित होता है, तो यह भारत के खनन क्षेत्र के नियामक ढाँचे में एक निर्णायक बदलाव होगा।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन इसकी असली परीक्षा संघवाद की कसौटी पर होगी। झारखंड, ओडिशा और छत्तीसगढ़ जैसे खनिज-संपन्न राज्य अपने राजस्व के एक बड़े स्रोत से वंचित हो सकते हैं, जो पहले से ही केंद्र-राज्य वित्तीय विभाजन को लेकर असंतुष्ट हैं। सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसलों के बाद इस विधेयक का आना संकेत देता है कि केंद्र उन फैसलों के निहितार्थों को विधायी रास्ते से पलटना चाहता है। बिना व्यापक राज्य-स्तरीय परामर्श के लाया गया यह कदम संसद में तीखी बहस और संभावित कानूनी चुनौतियों को आमंत्रण दे सकता है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

MMDR संशोधन विधेयक 2026 क्या है?
यह खान और खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम में प्रस्तावित संशोधन है, जिसे 10 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया गया। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य सरकारों को खनिज अधिकारों पर कोई भी कर या शुल्क लगाने से रोकना और खनन क्षेत्र में एकरूपता लाना है।
इस विधेयक से राज्य सरकारों पर क्या असर पड़ेगा?
राज्य सरकारें अब खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर स्वतंत्र रूप से कर, उपकर या शुल्क नहीं लगा सकेंगी। इससे खनिज-संपन्न राज्यों के राजस्व पर सीधा असर पड़ सकता है, जो इन करों से महत्त्वपूर्ण आमदनी अर्जित करते हैं।
क्या पहले से वसूले गए खनिज कर वापस मिलेंगे?
नहीं। विधेयक में स्पष्ट है कि इस संशोधन के लागू होने से पहले राज्य सरकारों द्वारा जो कर या शुल्क पहले ही वसूल किए जा चुके हैं, वे वापस नहीं किए जाएंगे। हालाँकि, जो राशि अभी तक जमा या वसूल नहीं हुई, उसे अमान्य माना जाएगा।
केंद्र सरकार ने यह विधेयक क्यों लाया?
सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में खनिज करों की असमानता से सप्लाई चेन बाधित होती है, उद्योगों की लागत बढ़ती है और खनिज आयात को बढ़ावा मिलता है। मंत्री रेड्डी के अनुसार, पूर्वव्यापी कराधान से निवेशकों का भरोसा भी कमज़ोर होता है।
इस विधेयक का खनन उद्योग पर क्या दीर्घकालिक प्रभाव होगा?
यदि यह विधेयक पारित होता है, तो खनन क्षेत्र में कर-संबंधी अनिश्चितता कम होगी और निवेश आकर्षित करना आसान हो सकता है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि राज्यों के राजस्व अधिकार सीमित होने से केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव बढ़ सकता है और कानूनी विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
राष्ट्र प्रेस
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