खनिज संशोधन विधेयक 2026 के खिलाफ झारखंड विधानसभा का विशेष सत्र बुलाए सरकार: मंत्री दीपक बिरुआ
सारांश
मुख्य बातें
झारखंड के परिवहन, राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दीपक बिरुआ ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 के विरोध में राज्य विधानसभा का तत्काल विशेष सत्र बुलाने की माँग की है। उन्होंने 14 अगस्त को सोशल मीडिया पर पोस्ट कर स्पष्ट किया कि यह विधेयक केवल करों का मामला नहीं, बल्कि झारखंड के संवैधानिक अधिकारों और वित्तीय स्वायत्तता पर सीधा प्रहार है।
मुख्य माँग और रणनीति
बिरुआ ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि विशेष सत्र में केंद्र के संशोधन विधेयक के विरुद्ध और राज्यों के संवैधानिक कर-अधिकारों के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया जाए। उन्होंने कहा कि इस प्रस्ताव पर विपक्षी दलों को भी अपना रुख सार्वजनिक करने की चुनौती दी जानी चाहिए, ताकि राज्य के हित पर सभी पक्षों की स्थिति स्पष्ट हो सके।
मंत्री का कहना है कि झारखंड को इस मुद्दे पर रक्षात्मक रवैया छोड़कर संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक — तीनों मोर्चों पर केंद्र सरकार से लड़ना होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का संदर्भ
बिरुआ ने वर्ष 2024 में सर्वोच्च न्यायालय की नौ न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ के उस ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया, जिसमें अदालत ने राज्यों के खनिज और खनिज-वहन भूमि पर कर एवं सेस लगाने के अधिकार को मान्यता दी थी। उनके अनुसार, नया संशोधन विधेयक इसी न्यायिक निर्णय की भावना के विपरीत है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि राज्य सरकार संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सीधे सर्वोच्च न्यायालय में जाकर इस नए कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने पर विचार करे। यह प्रावधान राज्यों को केंद्र के खिलाफ सीधे शीर्ष अदालत का दरवाज़ा खटखटाने का अधिकार देता है।
जीएसटी की तर्ज पर मुआवज़े की माँग
बिरुआ ने चेतावनी दी कि यदि केंद्र सरकार राज्यों की कर-शक्तियों को सीमित या समाप्त करती है, तो झारखंड को संसद और वित्तीय मंचों पर जीएसटी की तर्ज पर प्रतिवर्ष विशेष वैधानिक क्षतिपूर्ति पैकेज की माँग उठानी चाहिए।
उन्होंने तर्क दिया कि जब खनिज संपदा झारखंड की है, विस्थापन का दंश यहाँ के लोग झेलते हैं, तो उससे अर्जित राजस्व पर निर्णय नई दिल्ली से क्यों हो। यह सवाल झारखंड की राजनीति में 'जल, जंगल, ज़मीन' के बहुचर्चित मुद्दे से सीधे जुड़ता है।
पंचायत स्तर तक अभियान की अपील
मंत्री ने इस संघर्ष को जन-आंदोलन का रूप देने पर ज़ोर दिया। उनका कहना है कि आदिवासियों, मूलवासियों और स्थानीय समुदायों को इस लड़ाई से जोड़ने के लिए पंचायत स्तर पर व्यापक जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए, ताकि आम जनता समझ सके कि यह विधेयक उनके हितों को किस तरह प्रभावित करता है।
यह ऐसे समय में आया है जब खनिज-संपन्न राज्य और केंद्र के बीच राजस्व-बँटवारे को लेकर तनाव पहले से बढ़ा हुआ है। आने वाले दिनों में झारखंड सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और विपक्ष का रुख इस विवाद की दिशा तय करेगा।