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दादाभाई नैरोजी: ब्रिटिश संसद पहुँचने वाले पहले भारतीय, 1849 में खोला था लड़कियों का स्कूल

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दादाभाई नैरोजी: ब्रिटिश संसद पहुँचने वाले पहले भारतीय, 1849 में खोला था लड़कियों का स्कूल

सारांश

दादाभाई नैरोजी सिर्फ पहले भारतीय सांसद नहीं थे — वे वह शख्स थे जिन्होंने आँकड़ों से साबित किया कि ब्रिटेन भारत को लूट रहा है। 1849 में लड़कियों का स्कूल, 1892 में ब्रिटिश संसद — उनका सफर भारतीय राष्ट्रवाद की बौद्धिक रीढ़ है।

मुख्य बातें

दादाभाई नैरोजी का निधन 30 जून 1917 को मुंबई में हुआ; वे 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' के नाम से विख्यात थे।
जन्म 4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में; प्रारंभिक शिक्षा एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में।
वर्ष 1849 में लड़कियों के लिए स्कूल खोला; रूढ़िवादी विरोध के बावजूद पाँच वर्षों में छात्राओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि।
1892 से 1895 तक यूके हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य — यह उपलब्धि पाने वाले पहले भारतीय।
दो दशकों के आर्थिक विश्लेषण से 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसने ब्रिटिश शोषण को उजागर किया।

दादाभाई नैरोजी — जिन्हें 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है — ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स तक पहुँचने वाले पहले भारतीय थे। 30 जून 1917 को मुंबई में उनका निधन हुआ था। राजनेता, शिक्षाविद, उद्योगपति और समाज सुधारक के रूप में उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बौद्धिक नींव रखने वाला था।

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नैरोजी की शुरुआती शिक्षा एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में हुई। उन्हें बड़ोदरा के महाराजा का संरक्षण प्राप्त हुआ और उन्होंने उस रियासत में दीवान के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं। इसके साथ ही उन्होंने एक प्रोफेसर के तौर पर भी अध्यापन कार्य किया।

लड़कियों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम

नैरोजी ने वर्ष 1849 में लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की — एक ऐसा निर्णय जिसने तत्कालीन रूढ़िवादी समाज का कड़ा विरोध झेला। परंतु उनमें जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने की असाधारण क्षमता थी। पाँच वर्षों के भीतर ही उस स्कूल में छात्राओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो गई। इस अनुभव ने उन्हें लैंगिक समानता की माँग उठाने के लिए और प्रेरित किया।

आर्थिक शोषण का पर्दाफाश: 'ड्रेन थ्योरी'

वर्ष 1855 में जब नैरोजी ने पहली बार ब्रिटेन की यात्रा की, तो वहाँ की समृद्धि और भारत की दरिद्रता के बीच की खाई ने उन्हें झकझोर दिया। इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उन्होंने दो दशकों तक गहन आर्थिक विश्लेषण किया। उनके शोध ने यह उजागर किया कि अंग्रेज़ भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से लूटकर ब्रिटेन ले जा रहे हैं — यह सिद्धांत 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' के नाम से इतिहास में दर्ज हुआ। यह भारत की गरीबी ही थी जिसने उन्हें ब्रिटिश संसद तक पहुँचने के लिए प्रेरित किया।

ब्रिटिश संसद में भारत की आवाज़

नैरोजी 1892 से 1895 तक यूके हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य रहे — यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। संसद के भीतर से उन्होंने भारतीयों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार और वहाँ की जनता के सामने रखा। उन्होंने भारत में स्वशासन, महिला अधिकार और आर्थिक न्याय जैसे विषयों पर मुखरता से आवाज़ उठाई।

विरासत और महत्व

दादाभाई नैरोजी का योगदान केवल राजनीतिक नहीं था — वे उस बौद्धिक परंपरा के प्रणेता थे जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को तथ्यों और तर्क की ज़मीन पर खड़ा किया। उनके विचारों ने बाद की पीढ़ी के नेताओं को गहराई से प्रभावित किया। उनकी पुण्यतिथि पर भारत उनके अमूल्य योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है।

संपादकीय दृष्टिकोण

जबकि उनका असली योगदान यह था कि उन्होंने साम्राज्यवादी शोषण को भावना से नहीं, बल्कि आँकड़ों से चुनौती दी। 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' का उनका सिद्धांत आज के वैश्विक आर्थिक असमानता के विमर्श में भी प्रासंगिक है। 1849 में लड़कियों का स्कूल खोलना और फिर लैंगिक समानता की माँग उठाना — यह बताता है कि वे राष्ट्रीय मुक्ति को सामाजिक सुधार से अलग नहीं देखते थे। मुख्यधारा की कवरेज उनके इस समग्र दृष्टिकोण को प्रायः नज़रअंदाज़ कर देती है।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दादाभाई नैरोजी कौन थे और उन्हें 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' क्यों कहा जाता है?
दादाभाई नैरोजी भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी, राजनेता, शिक्षाविद और समाज सुधारक थे, जिनका जन्म 4 सितंबर 1825 को हुआ था। भारतीय राजनीति और राष्ट्रवाद में उनके दीर्घकालीन और बहुआयामी योगदान के कारण उन्हें 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' की उपाधि दी गई।
दादाभाई नैरोजी ब्रिटिश संसद में कब पहुँचे और यह क्यों महत्वपूर्ण था?
दादाभाई नैरोजी 1892 से 1895 तक यूके हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य रहे और ऐसा करने वाले वे पहले भारतीय थे। संसद में रहते हुए उन्होंने भारतीयों की समस्याओं, आर्थिक शोषण और महिला अधिकारों को ब्रिटिश सरकार के सामने सीधे रखा।
दादाभाई नैरोजी की 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' थ्योरी क्या थी?
1855 में ब्रिटेन की यात्रा के बाद नैरोजी ने दो दशकों तक आर्थिक विश्लेषण किया और यह साबित किया कि अंग्रेज़ भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से लूटकर ब्रिटेन ले जा रहे हैं। यह सिद्धांत 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' के नाम से इतिहास में दर्ज हुआ और भारतीय राष्ट्रवाद की बौद्धिक आधारशिला बना।
दादाभाई नैरोजी ने लड़कियों की शिक्षा के लिए क्या किया?
नैरोजी ने वर्ष 1849 में लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला, जिसका उस समय रूढ़िवादी समाज ने कड़ा विरोध किया। उनकी दृढ़ता और संवाद-कौशल के कारण पाँच वर्षों के भीतर उस स्कूल में छात्राओं की संख्या उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई, और बाद में उन्होंने लैंगिक समानता की माँग भी उठाई।
दादाभाई नैरोजी का निधन कब और कहाँ हुआ?
दादाभाई नैरोजी का निधन 30 जून 1917 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) में हुआ। उनकी पुण्यतिथि पर भारत उनके राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है।
राष्ट्र प्रेस
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