दादाभाई नैरोजी: ब्रिटिश संसद पहुँचने वाले पहले भारतीय, 1849 में खोला था लड़कियों का स्कूल
सारांश
मुख्य बातें
दादाभाई नैरोजी — जिन्हें 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' कहा जाता है — ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स तक पहुँचने वाले पहले भारतीय थे। 30 जून 1917 को मुंबई में उनका निधन हुआ था। राजनेता, शिक्षाविद, उद्योगपति और समाज सुधारक के रूप में उनका जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की बौद्धिक नींव रखने वाला था।
प्रारंभिक जीवन और शिक्षा
4 सितंबर 1825 को एक पारसी परिवार में जन्मे दादाभाई नैरोजी की शुरुआती शिक्षा एलफिंस्टन इंस्टीट्यूट स्कूल में हुई। उन्हें बड़ोदरा के महाराजा का संरक्षण प्राप्त हुआ और उन्होंने उस रियासत में दीवान के रूप में भी अपनी सेवाएँ दीं। इसके साथ ही उन्होंने एक प्रोफेसर के तौर पर भी अध्यापन कार्य किया।
लड़कियों की शिक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम
नैरोजी ने वर्ष 1849 में लड़कियों के लिए एक स्कूल की स्थापना की — एक ऐसा निर्णय जिसने तत्कालीन रूढ़िवादी समाज का कड़ा विरोध झेला। परंतु उनमें जनमत को अपने पक्ष में मोड़ने की असाधारण क्षमता थी। पाँच वर्षों के भीतर ही उस स्कूल में छात्राओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हो गई। इस अनुभव ने उन्हें लैंगिक समानता की माँग उठाने के लिए और प्रेरित किया।
आर्थिक शोषण का पर्दाफाश: 'ड्रेन थ्योरी'
वर्ष 1855 में जब नैरोजी ने पहली बार ब्रिटेन की यात्रा की, तो वहाँ की समृद्धि और भारत की दरिद्रता के बीच की खाई ने उन्हें झकझोर दिया। इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए उन्होंने दो दशकों तक गहन आर्थिक विश्लेषण किया। उनके शोध ने यह उजागर किया कि अंग्रेज़ भारत की संपत्ति को व्यवस्थित रूप से लूटकर ब्रिटेन ले जा रहे हैं — यह सिद्धांत 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' के नाम से इतिहास में दर्ज हुआ। यह भारत की गरीबी ही थी जिसने उन्हें ब्रिटिश संसद तक पहुँचने के लिए प्रेरित किया।
ब्रिटिश संसद में भारत की आवाज़
नैरोजी 1892 से 1895 तक यूके हाउस ऑफ कॉमन्स के सदस्य रहे — यह उपलब्धि हासिल करने वाले वे पहले भारतीय थे। संसद के भीतर से उन्होंने भारतीयों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार और वहाँ की जनता के सामने रखा। उन्होंने भारत में स्वशासन, महिला अधिकार और आर्थिक न्याय जैसे विषयों पर मुखरता से आवाज़ उठाई।
विरासत और महत्व
दादाभाई नैरोजी का योगदान केवल राजनीतिक नहीं था — वे उस बौद्धिक परंपरा के प्रणेता थे जिसने भारतीय राष्ट्रवाद को तथ्यों और तर्क की ज़मीन पर खड़ा किया। उनके विचारों ने बाद की पीढ़ी के नेताओं को गहराई से प्रभावित किया। उनकी पुण्यतिथि पर भारत उनके अमूल्य योगदान को श्रद्धापूर्वक स्मरण करता है।