दादाभाई नौरोजी जयंती: गडकरी, धामी, मौर्य सहित देशभर के नेताओं ने किया नमन
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के स्तंभ और राजनीति के 'ग्रैंड ओल्ड मैन' कहे जाने वाले दादाभाई नौरोजी की जयंती पर शुक्रवार, 4 सितंबर को देशभर के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। केंद्रीय मंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक — सभी ने उनके राष्ट्रीय योगदान को स्मरण किया।
केंद्रीय मंत्री और राज्य प्रमुखों की श्रद्धांजलि
केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा, 'महान स्वतंत्रता सेनानी दादाभाई नौरोजी जी की जयंती पर उन्हें विनम्र अभिवादन।' उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उन्हें प्रखर शिक्षाविद् और समाज सुधारक बताते हुए कहा, 'राष्ट्र की स्वतंत्रता, शिक्षा और सामाजिक जागरण के लिए आपका समर्पण हम सभी के लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।'
आर्थिक चिंतन को मिली विशेष स्वीकृति
उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने दादाभाई नौरोजी के आर्थिक विचारों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 'उन्होंने ब्रिटिश शासन की शोषणकारी आर्थिक नीतियों को उजागर कर स्वराज और राष्ट्र की आर्थिक स्वतंत्रता की चेतना को सशक्त किया।' गौरतलब है कि नौरोजी का 'ड्रेन ऑफ वेल्थ' सिद्धांत भारतीय राष्ट्रवादी आर्थिक विचार की नींव माना जाता है।
बिहार और भाजपा नेताओं का नमन
बिहार सरकार में मंत्री विजय कुमार सिन्हा ने उन्हें 'महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् व समाज सुधारक' बताते हुए श्रद्धांजलि दी। भारतीय जनता पार्टी (BJP) विधायक मुकेश शर्मा ने कहा कि नौरोजी का राष्ट्र की स्वतंत्रता और जनसेवा के प्रति समर्पण सदैव प्रेरणादायी रहेगा। भाजपा नेता भगवानदास सबनानी ने भी उनके 'प्रखर विचार और राष्ट्रसेवा की प्रेरणादायी विरासत' को याद किया।
दादाभाई नौरोजी की विरासत
दादाभाई नौरोजी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC) के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और ब्रिटिश संसद में निर्वाचित होने वाले पहले भारतीय सांसद भी। उनके आर्थिक विश्लेषण ने औपनिवेशिक शोषण के विरुद्ध भारत की वैचारिक लड़ाई को एक ठोस आधार दिया। यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब उनकी जयंती पर राजनीतिक दलों की विविध पृष्ठभूमि के नेता एकजुट होकर उन्हें स्मरण करते हैं।
आगे की दृष्टि
नौरोजी की जयंती हर वर्ष राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संग्राम की स्मृति को ताज़ा करने का अवसर बनती है। विभिन्न दलों के नेताओं की सहभागिता यह दर्शाती है कि उनकी विरासत दलीय सीमाओं से परे आज भी प्रासंगिक बनी हुई है।