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हरिद्वार के कनखल में दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर: माता सती के आत्मदाह की पौराणिक भूमि

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हरिद्वार के कनखल में दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर: माता सती के आत्मदाह की पौराणिक भूमि

सारांश

हरिद्वार के कनखल में स्थित दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर महज एक तीर्थस्थल नहीं — यह उस पौराणिक घटना की भूमि है जिसने 51 शक्तिपीठों को जन्म दिया। 1810 में रानी धनकौर द्वारा निर्मित यह मंदिर सावन में लाखों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनता है।

मुख्य बातें

दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर हरिद्वार के कनखल में स्थित है और माता सती के आत्मदाह की पौराणिक भूमि माना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होने पर माता सती ने यहीं योगाग्नि से देह त्यागा था।
इसी घटना के बाद भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े हुए और देशभर में 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् 1810 में रानी धनकौर ने कराया था; 1962 में पुनर्निर्माण हुआ।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मंगलवार को एक्स पर मंदिर का भव्य वीडियो साझा कर श्रद्धालुओं को दर्शन का आमंत्रण दिया।
महाशिवरात्रि और सावन में यहाँ हज़ारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं।

हरिद्वार के पवित्र नगर कनखल में स्थित दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर उस ऐतिहासिक पौराणिक घटना का साक्षी है, जहाँ माता सती ने योगाग्नि से अपना शरीर त्यागा था और भगवान शिव का प्रलयंकारी तांडव आरंभ हुआ था। देवभूमि उत्तराखंड के सबसे प्राचीन तीर्थस्थलों में से एक यह मंदिर आस्था, पुराण और इतिहास का अनूठा संगम है।

पौराणिक कथा: यज्ञ, अपमान और आत्मदाह

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, राजा दक्ष प्रजापति ने इसी स्थान पर एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने जानबूझकर अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री माता सती को आमंत्रित नहीं किया। माता सती ने इसे अपने पति का घोर अपमान माना और उसी यज्ञकुंड में योगाग्नि से आत्मदाह कर लिया। इस त्रासद घटना के पश्चात भगवान शिव ने रौद्र रूप धारण कर तांडव किया।

मान्यता है कि इसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के 51 टुकड़े किए, जो देशभर में जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ-वहाँ 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इस प्रकार यह स्थान समस्त शक्तिपीठों की उत्पत्ति का मूल केंद्र माना जाता है।

मंदिर का इतिहास और निर्माण

वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् 1810 में रानी धनकौर द्वारा कराया गया था। इसके बाद 1962 में मंदिर का विस्तृत पुनर्निर्माण हुआ। मंदिर परिसर के निकट ही वह पवित्र स्थान है जहाँ माता सती ने अपना देह त्यागा था, जो आज भी श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। गौरतलब है कि यह मंदिर न केवल शैव आस्था का केंद्र है, बल्कि शाक्त परंपरा के लिए भी उतना ही पवित्र माना जाता है।

मुख्यमंत्री धामी की एक्स पर पोस्ट

मंगलवार को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर मंदिर का एक भव्य वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा, 'हरिद्वार के पवित्र शहर कनखल में स्थित पवित्र दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर, भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था और भक्ति का एक दिव्य केंद्र है। राजा दक्ष प्रजापति से जुड़ा यह प्राचीन तीर्थ स्थल सावन के महीने में शिव भक्तों के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व रखता है। अगर आप हरिद्वार जा रहे हैं, तो दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर में जरूर दर्शन करें और भगवान शिव का आशीर्वाद लें।'

आम जनता और श्रद्धालुओं पर असर

महाशिवरात्रि और सावन के पवित्र महीने में यहाँ हज़ारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मान्यता है कि सावन में भगवान शिव स्वयं इस स्थान पर निवास करते हैं, जिससे इस काल में दर्शन का विशेष फल मिलता है। यहाँ आने वाले श्रद्धालु भगवान शिव के रौद्र और शांत — दोनों रूपों का अनुभव करते हैं।

धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व

यह मंदिर देवभूमि उत्तराखंड की उस समृद्ध आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है जो शताब्दियों से अखंड बनी हुई है। कनखल क्षेत्र, जो हरिद्वार का एक अभिन्न हिस्सा है, प्राचीन काल से ही तीर्थाटन का प्रमुख केंद्र रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, दक्ष प्रजापति मंदिर उन विरले स्थलों में से है जहाँ शैव और शाक्त — दोनों परंपराएँ एकसाथ जीवंत हैं। आने वाले समय में उत्तराखंड सरकार की धार्मिक पर्यटन नीति के तहत इस तीर्थस्थल के और अधिक विकास की संभावना है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भारतीय सांस्कृतिक स्मृति की भी परीक्षा है — यह स्थल बताता है कि पौराणिक आख्यान किस प्रकार भौगोलिक पहचान और सामूहिक चेतना को सदियों तक जीवित रखते हैं। मुख्यमंत्री धामी का एक्स पोस्ट धार्मिक पर्यटन को डिजिटल माध्यम से बढ़ावा देने की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा है जिसे उत्तराखंड सरकार पिछले कुछ वर्षों से अपना रही है। हालाँकि, इस बढ़ते पर्यटन दबाव के बीच मंदिर परिसर और उसके आसपास के पुरातात्त्विक महत्त्व की संरचनाओं के संरक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिए जाने की ज़रूरत है। 51 शक्तिपीठों की उत्पत्ति के केंद्र के रूप में इस स्थल की पहचान इसे केवल उत्तराखंड नहीं, बल्कि अखिल भारतीय आस्था का प्रतीक बनाती है।
RashtraPress
18 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर कहाँ स्थित है?
यह मंदिर उत्तराखंड के हरिद्वार ज़िले के कनखल क्षेत्र में स्थित है। कनखल, हरिद्वार शहर का एक प्राचीन और धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
माता सती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ में आत्मदाह क्यों किया था?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष ने अपने यज्ञ में भगवान शिव और माता सती को आमंत्रित नहीं किया, जिसे माता सती ने अपने पति का अपमान माना। इस अपमान से आहत होकर माता सती ने उसी यज्ञकुंड में योगाग्नि से अपना शरीर त्याग दिया।
51 शक्तिपीठों का संबंध इस मंदिर से कैसे है?
मान्यता है कि माता सती के आत्मदाह के बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके शरीर के 51 टुकड़े किए। ये टुकड़े देशभर में जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ 51 शक्तिपीठों की स्थापना हुई, और दक्ष प्रजापति मंदिर इस पूरी घटना का मूल स्थल माना जाता है।
दक्ष प्रजापति महादेव मंदिर का निर्माण कब हुआ था?
वर्तमान मंदिर का निर्माण सन् 1810 में रानी धनकौर द्वारा कराया गया था। इसके बाद 1962 में मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया।
मंदिर दर्शन के लिए सबसे उपयुक्त समय कौन सा है?
महाशिवरात्रि और सावन का पवित्र महीना इस मंदिर में दर्शन के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि सावन में भगवान शिव स्वयं यहाँ निवास करते हैं, इसलिए इस काल में दर्शन का विशेष फल मिलता है।
राष्ट्र प्रेस
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