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क्या दक्षिण भारत के लिए पोंगल का पर्व है विशेष? जानें दान-पुण्य का महत्व!

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क्या दक्षिण भारत के लिए पोंगल का पर्व है विशेष? जानें दान-पुण्य का महत्व!

सारांश

दक्षिण भारत में पोंगल पर्व पर दान-पुण्य का महत्व अत्यधिक है। जानें कैसे इस अवसर पर गोसेवा और विवाहित बेटियों को दान देने की परंपरा को विशेष मान्यता दी जाती है। इस लेख में जानिए चार दिवसीय पोंगल की दान परंपराओं के बारे में।

मुख्य बातें

दक्षिण भारत में पोंगल पर्व पर दान का महत्व है।
हरिदास का दान धार्मिक परंपरा का हिस्सा है।
मट्टू पोंगल पर गायों को विशेष मान्यता मिलती है।
विवाहित बेटियों को उपहार देने से परिवार में खुशहाली आती है।
दान-पुण्य से समाज में एकता का भाव बढ़ता है।

नई दिल्ली, १२ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। पूरे भारत में १४ जनवरी को मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाएगा, जिसमें स्नान के साथ दान-पुण्य का अत्यधिक महत्व है। जबकि उत्तर भारत में उड़द की दाल और चावल का दान विशेष रूप से शुभ माना जाता है, दक्षिण भारत के राज्यों में गोसेवा, विवाहित बेटियों और ब्राह्मणों को दान देने को अधिक महत्व दिया जाता है। आइए, हम आपको चार दिवसीय पोंगल के दौरान दक्षिण भारत की दान परंपराओं के बारे में बताएं।

दक्षिण भारत में मकर संक्रांति के दिन दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इस दिन हरिदास का दान करने की परंपरा है। इस दिन भगवान विष्णु के भक्त हरिदास सिर पर पीतल का पात्र रखकर मंदिर और आस-पास के क्षेत्रों में घूमते हैं और घर-घर जाकर चावल, फल, गुड़ और कपड़े दान करते हैं।

दान लेने वाला व्यक्ति हरिदास के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त करता है। मान्यता है कि हरिदास को दान देने के लिए नहीं बुलाया जाता, बल्कि वे बिना बुलाए ही हर घर में दान लेकर आते हैं। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है।

मट्टू पोंगल चार दिवसीय पोंगल का तीसरा दिन होता है। इस दिन गाय और बैलों की सेवा की जाती है। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में इस दिन गाय को सजाकर उसका पूजन किया जाता है और विशेष रूप से घर पर तैयार चावल और गुड़ का प्रसाद दिया जाता है। इसमें गाय के अलावा अन्य पशु भी शामिल हैं।

कर्नाटक में मकर पोंगल पर विशेष रूप से तिल, गुड़, और नारियल के मिश्रण का दान किया जाता है और इसे भगवान को चढ़ाया जाता है। इसे क्षेत्रीय भाषा में 'एल्लु-बेल्ला' कहा जाता है। मान्यता है कि इस दान से सभी पापों का नाश होता है और परिवार में प्रेम और सुख-समृद्धि बढ़ती है।

दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में 'पुट्टिनिल्लू', यानी मायके का उपहार और ब्राह्मणों के दान की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें विवाहित बेटियों को घर बुलाकर कपड़े, गहने और अनाज भेंट किए जाते हैं। मान्यता है कि विवाहित बेटियों को दान देने से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है। साथ ही, ब्राह्मणों को सामर्थ्यानुसार चावल, दाल, सब्जियां, घी और पैसे भेंट किए जाते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

जिससे समाज में एकता और सहयोग की भावना बनती है।
RashtraPress
26 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

पोंगल पर्व कब मनाया जाता है?
पोंगल पर्व हर साल १४ जनवरी को मनाया जाता है।
दक्षिण भारत में दान का क्या महत्व है?
दक्षिण भारत में दान देने को अक्षय पुण्य का स्रोत माना जाता है।
मट्टू पोंगल क्या होता है?
मट्टू पोंगल पोंगल का तीसरा दिन होता है, जब गाय और बैलों की सेवा की जाती है।
हरिदास का दान क्या है?
हरिदास का दान एक परंपरा है जिसमें भक्त घर-घर जाकर दान करते हैं।
विवाहित बेटियों को दान देने का महत्व क्या है?
विवाहित बेटियों को दान देने से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है।
राष्ट्र प्रेस
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