दीपंकर भट्टाचार्य का आह्वान: शिक्षा के निजीकरण-केंद्रीयकरण के खिलाफ शिक्षकों को उठानी होगी सामाजिक जिम्मेदारी
सारांश
मुख्य बातें
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने 4 अक्टूबर 2026 को पटना में कहा कि शिक्षा के निजीकरण, व्यापारीकरण और केंद्रीयकरण के विरुद्ध शिक्षकों को अपनी व्यापक सामाजिक भूमिका निभानी होगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि शिक्षा का प्रश्न केवल शिक्षकों की सेवा-शर्तों तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में हो रहे वैचारिक हस्तक्षेप के खिलाफ भी व्यापक बहस और आंदोलन की आवश्यकता है।
सेमिनार का संदर्भ और मुख्य वक्तव्य
पटना के आईएमए हॉल में आयोजित 'शिक्षा बचाओ, देश बचाओ' सेमिनार को संबोधित करते हुए भट्टाचार्य ने नई शिक्षा नीति-2020 के खिलाफ व्यापक शिक्षक एकता और छात्र आंदोलनों के समर्थन का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मीडिया, सिनेमा और शिक्षण संस्थानों के माध्यम से समाज की सोच को प्रभावित करने की कोशिशें जारी हैं, ऐसे में शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
बिहार में शिक्षा की स्थिति
भट्टाचार्य ने कहा कि बिहार में शिक्षा की स्थिति लंबे समय से चिंता का विषय रही है। नीतीश कुमार सरकार ने शिक्षा सुधार आयोग के माध्यम से समान स्कूल प्रणाली की दिशा में पहल की थी, लेकिन उसकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। इसी प्रकार भूमि सुधार आयोग की रिपोर्ट भी लागू नहीं की गई। उन्होंने कहा कि बिहार में जिन क्षेत्रों को सर्वाधिक नुकसान पहुँचा है, उनमें शिक्षा सबसे आगे है।
छात्र आंदोलनों और लोकतांत्रिक मुहिम में शिक्षकों की भूमिका
दीपंकर भट्टाचार्य ने नागरिकता कानून के खिलाफ आंदोलन, किसान-मजदूर आंदोलनों और पेपर लीक के खिलाफ हुए छात्र आंदोलनों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार में स्कूली छात्रों के बीच 'स्कूल ठीक करो' जैसे सवाल उठ रहे हैं। जेनरेशन अल्फा के इन आंदोलनों में शिक्षकों को भी सक्रिय भागीदार बनना चाहिए। उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से बाहर किए जाने पर चिंता व्यक्त की और कहा कि उस प्रक्रिया में शिक्षकों को भी लगाया गया था। अब शिक्षकों को मतदाता सूची से बाहर हुए लोगों के नाम पुनः जुड़वाने की लोकतांत्रिक मुहिम में भूमिका निभानी चाहिए।
आंबेडकर-फुले की विचारधारा का स्मरण
भट्टाचार्य ने डॉ. भीमराव आंबेडकर तथा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के शिक्षा एवं सामाजिक समानता के विचारों को स्मरण करते हुए कहा कि पूरे वर्ष शिक्षा, सामाजिक समानता और फुले-आंबेडकर की विचारधारा के प्रश्नों पर व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह ऐसे समय में आया है जब शिक्षा-नीति संबंधी बहसें राष्ट्रीय स्तर पर तेज हो रही हैं।
अन्य वक्ताओं की राय और मौजूद प्रतिनिधि
सेमिनार के उद्घाटनकर्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. राजीव कुंवर ने कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है, किंतु नई शिक्षा नीति के माध्यम से इसके बढ़ते केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति चिंताजनक है। उन्होंने शिक्षक आंदोलन को व्यापक जनआंदोलन से जोड़ने पर बल दिया। पालीगंज विधायक संदीप सौरभ ने कहा कि बिहार के शिक्षकों को सरकारी शिक्षक का दर्जा मिलने के बावजूद उन्हें अभी तक उचित वेतनमान और समुचित अधिकार नहीं मिल रहे हैं। विधान परिषद सदस्य शशि यादव ने शिक्षा के निजीकरण, व्यापारीकरण और सांप्रदायीकरण के विरुद्ध आवाज़ उठाने तथा छात्र आंदोलनों के साथ एकजुटता का आह्वान किया। कार्यक्रम में बिहार राज्य अराजपत्रित कर्मचारी महासंघ (गोपगुट) के अध्यक्ष रामबली प्रसाद, महासचिव प्रेमचंद सिन्हा, प्राथमिक शिक्षक संघ के राज्य अध्यक्ष प्रदीप राय सहित बड़ी संख्या में शिक्षक, कर्मचारी और शिक्षा आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधि उपस्थित रहे। आगे की राह पर सभी वक्ताओं ने एकमत से कहा कि शिक्षा की रक्षा के लिए सभी शिक्षक संगठनों को एक साझा मंच पर आना होगा।