यासीन मलिक की वर्चुअल पेशी न होने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने तिहाड़ जेल अधीक्षक से माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
दिल्ली हाईकोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के प्रमुख यासीन मलिक की तिहाड़ जेल से वर्चुअल सुनवाई में अनुपस्थिति पर गंभीर रुख अपनाते हुए जेल अधीक्षक से रिपोर्ट तलब की। यह सुनवाई राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) की उस अपील पर हो रही थी, जिसमें मलिक की उम्रकैद की सजा को बढ़ाकर मृत्युदंड देने की माँग की गई है।
अदालत का निर्देश
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने स्पष्ट आदेश दिया कि संबंधित जेल अधीक्षक यासीन मलिक की अनुपस्थिति के कारणों की जानकारी देते हुए रिपोर्ट दाखिल करें। अदालत ने कहा, 'अगली तारीख पर प्रतिवादी को वर्चुअल रूप से सुनवाई में शामिल कराया जाए।' मामले की अगली सुनवाई दिसंबर 2026 में निर्धारित की गई है।
एनआईए की अपील और तर्क
एनआईए ने 2022 के निचली अदालत के उस फैसले को चुनौती दी है, जिसमें गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) और भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के तहत आरोप स्वीकार करने पर मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। एजेंसी का तर्क है कि किसी आतंकी को महज इसलिए फाँसी से नहीं बचाया जा सकता क्योंकि उसने अपना अपराध स्वीकार कर लिया और मुकदमे का सामना न करने का विकल्प चुना। एनआईए के अनुसार, इस आधार पर छूट देने से सजा-नीति कमज़ोर होगी और आतंकियों को 'दोषी ठहराकर फाँसी से बचने' की राह मिलेगी।
निचली अदालत का पुराना निर्णय
निचली अदालत ने एनआईए की मृत्युदंड की माँग यह कहते हुए अस्वीकार कर दी थी कि मलिक के अपराध 'भारत की अवधारणा के मूल पर हमला' करने वाले थे और उनका उद्देश्य जम्मू-कश्मीर को भारत से अलग करना था। गौरतलब है कि यह मामला टेरर फंडिंग से जुड़ा है जिसमें अभियोजन पक्ष ने मलिक के प्रतिबंधित संगठन लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और उसके प्रमुख हाफिज सईद से संबंध होने के दावे किए हैं।
एनआईए के अतिरिक्त आरोप
हाल की सुनवाइयों में एनआईए ने अदालत को बताया कि मलिक के कई आतंकी संगठनों और एलईटी समर्थकों से कथित संबंध थे। एजेंसी ने यह भी कहा कि वरिष्ठ नेताओं या नौकरशाहों के नाम लेने मात्र से हाफिज सईद और अन्य आतंकियों से उसके कथित संबंध समाप्त नहीं हो जाते। यह ऐसे समय में आया है जब सर्वोच्च न्यायालय सहित विभिन्न अदालतों में आतंक-संबंधी मामलों में सजा की उचित सीमा को लेकर कानूनी विमर्श चल रहा है।
वर्तमान स्थिति और आगे की प्रक्रिया
यासीन मलिक ने किसी वकील को नियुक्त करने के बजाय स्वयं अपना पक्ष रखने का निर्णय लिया है। अगस्त 2024 में अदालत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए उसकी शारीरिक उपस्थिति पर रोक लगा दी थी, तब से वह वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से सुनवाई में शामिल होता रहा है। इस पृष्ठभूमि में बुधवार की अनुपस्थिति ने अदालत को जेल प्रशासन से स्पष्टीकरण माँगने पर विवश किया। दिसंबर में होने वाली अगली सुनवाई तय करेगी कि यह हाई-प्रोफाइल मामला आगे किस दिशा में बढ़ता है।