नरेश बालियान की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली पुलिस को नोटिस, मकोका मामले में 4 सप्ताह में माँगा जवाब
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 24 अगस्त 2026 को आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व विधायक नरेश बालियान की जमानत याचिका पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी किया और चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। यह मामला महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट (मकोका) के तहत दर्ज है, जो संगठित अपराध से जुड़े आरोपों में लागू होता है।
मामले की पृष्ठभूमि
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने यह नोटिस उस याचिका पर जारी किया, जिसमें दिल्ली उच्च न्यायालय के 3 अगस्त के उस फैसले को चुनौती दी गई है जिसमें बालियान को जमानत देने से इनकार किया गया था। उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि मकोका जैसे विशेष कानूनों के तहत दर्ज गंभीर अपराधों में केवल लंबे समय तक न्यायिक हिरासत में रहना जमानत का निर्णायक आधार नहीं बन सकता।
गौरतलब है कि दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने बालियान को 4 दिसंबर 2024 को गिरफ्तार किया था। उन पर फरार गैंगस्टर कपिल सांगवान उर्फ नंदू द्वारा संचालित कथित संगठित अपराध सिंडिकेट से जुड़े होने के आरोप हैं।
आरोपों का विवरण
जाँच एजेंसियों के अनुसार, बालियान पर आरोप है कि उन्होंने सांगवान के सिंडिकेट के लिए 'सहयोगकर्ता' (फैसिलिटेटर) की भूमिका निभाई। आरोपों में जबरन वसूली के लिए लक्ष्यों की पहचान करना, फर्जी संपत्ति समझौते तैयार करना और बेहद कम कीमत पर जबरदस्ती संपत्तियाँ बिकवाना शामिल है।
इसके अतिरिक्त, कुछ ऑडियो क्लिप भी सामने आए थे, जिनमें बालियान को कथित तौर पर गैंगस्टर सांगवान के साथ बातचीत करते सुना जा सकता है। इन क्लिप से कथित तौर पर संकेत मिले कि नई दिल्ली में बिल्डरों और अन्य व्यक्तियों को धमकाकर उनसे धन ऐंठने की योजना बनाई जा रही थी।
बालियान का पक्ष
बालियान ने लगातार अपने ऊपर लगे सभी आरोपों को नकारा है। उन्होंने मकोका के तहत मामला दर्ज किए जाने को कानून का दुरुपयोग और राजनीतिक प्रतिशोध की कार्रवाई बताया है। उनके वकीलों का तर्क है कि विशेष कानून का प्रयोग बिना पर्याप्त साक्ष्य आधार के किया गया है।
आगे क्या होगा
सर्वोच्च न्यायालय के नोटिस के बाद दिल्ली पुलिस को चार सप्ताह के भीतर अपना जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद अदालत मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय करेगी। यह मामला इस दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण है कि मकोका जैसे कड़े कानूनों के तहत जमानत की शर्तों की व्याख्या पर सर्वोच्च न्यायालय की राय आने वाले समय में कई समान मामलों को प्रभावित कर सकती है।