परिसीमन पर तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव पास: भाजपा बोली — डीएमके और टीवीके एक ही नाव पर
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु विधानसभा ने 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किए गए एक विशेष प्रस्ताव को पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से आग्रह किया गया कि लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखी जाए और राज्यों के बीच संसदीय सीटों का मौजूदा बंटवारा सुरक्षित किया जाए। इस कदम पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और तमिलगा वेट्री कषगम (TVK) दोनों को एक ही पाले में खड़ा बताया।
भाजपा का हमला: 'एक ही नाव पर सवार'
तमिलनाडु भाजपा के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने कहा कि डीएमके और टीवीके दोनों परिसीमन के मुद्दे पर 'एक ही नाव पर सवार' हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि डीएमके पूरी तरह उलझन में है — पहले पार्टी ने कहा था कि एक भी सीट कम नहीं होनी चाहिए, और अब उसे यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि तमिलनाडु को 20 से अधिक सीटें मिलेंगी।
तिरुपति ने यह भी कहा कि देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर कोई उत्तर भारतीय नहीं है — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ओडिशा से हैं, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन तमिलनाडु से हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से हैं। उनके अनुसार, यह इस बात का प्रमाण है कि परिसीमन को उत्तर-दक्षिण विभाजन के चश्मे से देखना भ्रामक है।
भाजपा विधायक का रुख: परिसीमन जरूरी
भाजपा विधायक भोजराजन ने स्पष्ट किया कि पार्टी ने मुख्यमंत्री विजय के विशेष प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका तर्क था कि अधिक जन-प्रतिनिधियों के लिए परिसीमन आवश्यक है ताकि समाज की बेहतर सेवा हो सके। भोजराजन ने जोर देकर कहा कि परिसीमन के मुद्दे को 'उत्तर-दक्षिण टकराव' का रूप देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा, 'अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं के बावजूद हम एक देश हैं — ऐसे आरोप लगाना कि केंद्र सरकार उत्तर और दक्षिण के बीच बंटवारा करेगी, पुरानी बात हो चुकी है।'
डीएमके का पक्ष: परिसीमन 'जरूरी नहीं'
डीएमके के प्रवक्ता टीकेएस इलांगोवन ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि परिसीमन 'जरूरी नहीं' है। उन्होंने बताया कि डीएमके इसलिए परिसीमन के विरुद्ध है क्योंकि भाजपा सरकार कई आधारों पर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना चाहती है, जिसका पार्टी पूर्ण विरोध करती है। इलांगोवन ने कहा कि पार्टी चाहती थी कि परिसीमन के बाद भी मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र बने रहें।
इलांगोवन ने आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि यदि परिसीमन लागू हुआ तो दक्षिण के चारों राज्यों को मिलाकर करीब 170 सांसद मिलेंगे, जबकि शेष उत्तरी राज्यों को 680 सांसद — यह असंतुलन दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हाशियेबंदी को और गहरा करेगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार चाहे किसी की भी हो, दक्षिणी राज्यों को नजरअंदाज किया जाता रहेगा।
आम जनता और राजनीति पर असर
यह ऐसे समय में आया है जब परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में व्यापक चिंता है। गौरतलब है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या-आधारित परिसीमन में नुकसान उठाने की आशंका लंबे समय से जताई जाती रही है। तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव उस व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है जो आने वाले वर्षों में केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को परिभाषित कर सकती है।
आगे देखें तो यह प्रस्ताव संसदीय रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह केंद्र पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अन्य दक्षिणी राज्यों की विधानसभाएँ भी इसी तरह के कदम उठा सकती हैं।