13 अगस्त 2026
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परिसीमन पर तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव पास: भाजपा बोली — डीएमके और टीवीके एक ही नाव पर

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परिसीमन पर तमिलनाडु विधानसभा का प्रस्ताव पास: भाजपा बोली — डीएमके और टीवीके एक ही नाव पर

सारांश

तमिलनाडु विधानसभा ने लोकसभा सीटें 543 पर स्थिर रखने का प्रस्ताव पास किया — DMK ने समर्थन दिया, BJP ने विरोध। भाजपा प्रवक्ता ने DMK और TVK को 'एक ही नाव पर सवार' बताया। परिसीमन पर उत्तर-दक्षिण की खाई गहराती जा रही है।

मुख्य बातें

तमिलनाडु विधानसभा ने 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी.
जोसेफ विजय का विशेष प्रस्ताव पारित किया, जिसमें लोकसभा सीटें 543 पर स्थायी रखने की माँग है।
DMK ने प्रस्ताव का समर्थन किया; BJP ने विरोध करते हुए इसे 'उत्तर-दक्षिण टकराव' की राजनीति बताया।
भाजपा प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने DMK और TVK को परिसीमन पर 'एक ही नाव पर सवार' करार दिया।
DMK प्रवक्ता टीकेएस इलांगोवन ने कहा कि परिसीमन से दक्षिण के चार राज्यों को केवल 170 सांसद मिलेंगे, जबकि उत्तर को 680 ।
भाजपा विधायक भोजराजन ने तर्क दिया कि बेहतर जन-प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन आवश्यक है।

तमिलनाडु विधानसभा ने 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश किए गए एक विशेष प्रस्ताव को पारित किया, जिसमें केंद्र सरकार से आग्रह किया गया कि लोकसभा की सीटों की संख्या 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखी जाए और राज्यों के बीच संसदीय सीटों का मौजूदा बंटवारा सुरक्षित किया जाए। इस कदम पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) और तमिलगा वेट्री कषगम (TVK) दोनों को एक ही पाले में खड़ा बताया।

भाजपा का हमला: 'एक ही नाव पर सवार'

तमिलनाडु भाजपा के प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने कहा कि डीएमके और टीवीके दोनों परिसीमन के मुद्दे पर 'एक ही नाव पर सवार' हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि डीएमके पूरी तरह उलझन में है — पहले पार्टी ने कहा था कि एक भी सीट कम नहीं होनी चाहिए, और अब उसे यह भरोसा दिलाया जा रहा है कि तमिलनाडु को 20 से अधिक सीटें मिलेंगी।

तिरुपति ने यह भी कहा कि देश के शीर्ष संवैधानिक पदों पर कोई उत्तर भारतीय नहीं है — राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ओडिशा से हैं, उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन तमिलनाडु से हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात से हैं। उनके अनुसार, यह इस बात का प्रमाण है कि परिसीमन को उत्तर-दक्षिण विभाजन के चश्मे से देखना भ्रामक है।

भाजपा विधायक का रुख: परिसीमन जरूरी

भाजपा विधायक भोजराजन ने स्पष्ट किया कि पार्टी ने मुख्यमंत्री विजय के विशेष प्रस्ताव का विरोध किया है। उनका तर्क था कि अधिक जन-प्रतिनिधियों के लिए परिसीमन आवश्यक है ताकि समाज की बेहतर सेवा हो सके। भोजराजन ने जोर देकर कहा कि परिसीमन के मुद्दे को 'उत्तर-दक्षिण टकराव' का रूप देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा, 'अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं के बावजूद हम एक देश हैं — ऐसे आरोप लगाना कि केंद्र सरकार उत्तर और दक्षिण के बीच बंटवारा करेगी, पुरानी बात हो चुकी है।'

डीएमके का पक्ष: परिसीमन 'जरूरी नहीं'

डीएमके के प्रवक्ता टीकेएस इलांगोवन ने पार्टी का रुख स्पष्ट करते हुए कहा कि परिसीमन 'जरूरी नहीं' है। उन्होंने बताया कि डीएमके इसलिए परिसीमन के विरुद्ध है क्योंकि भाजपा सरकार कई आधारों पर लोकसभा सीटों की संख्या बढ़ाकर 850 करना चाहती है, जिसका पार्टी पूर्ण विरोध करती है। इलांगोवन ने कहा कि पार्टी चाहती थी कि परिसीमन के बाद भी मौजूदा निर्वाचन क्षेत्र बने रहें।

इलांगोवन ने आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि यदि परिसीमन लागू हुआ तो दक्षिण के चारों राज्यों को मिलाकर करीब 170 सांसद मिलेंगे, जबकि शेष उत्तरी राज्यों को 680 सांसद — यह असंतुलन दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक हाशियेबंदी को और गहरा करेगा। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सरकार चाहे किसी की भी हो, दक्षिणी राज्यों को नजरअंदाज किया जाता रहेगा।

आम जनता और राजनीति पर असर

यह ऐसे समय में आया है जब परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राज्यों में व्यापक चिंता है। गौरतलब है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को जनसंख्या-आधारित परिसीमन में नुकसान उठाने की आशंका लंबे समय से जताई जाती रही है। तमिलनाडु विधानसभा का यह प्रस्ताव उस व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा है जो आने वाले वर्षों में केंद्र और राज्यों के बीच संबंधों को परिभाषित कर सकती है।

आगे देखें तो यह प्रस्ताव संसदीय रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह केंद्र पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। अन्य दक्षिणी राज्यों की विधानसभाएँ भी इसी तरह के कदम उठा सकती हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं — यही इसकी सबसे बड़ी सीमा है। असली सवाल यह है कि क्या दक्षिणी राज्य परिसीमन आयोग के गठन से पहले एकजुट होकर संवैधानिक संशोधन की माँग उठा सकते हैं। भाजपा का 'उत्तर-दक्षिण टकराव नहीं' वाला तर्क तब तक कमज़ोर रहेगा जब तक वह जनसंख्या-आधारित परिसीमन में दक्षिणी राज्यों के नुकसान का कोई ठोस विकल्प नहीं देती। DMK की स्थिति भी विरोधाभासी है — एक ओर परिसीमन का विरोध, दूसरी ओर TVK के साथ गठजोड़ की राजनीति — जो भाजपा को हमले का मौका देती है।
RashtraPress
13 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

तमिलनाडु विधानसभा का परिसीमन प्रस्ताव क्या है?
यह 12 अगस्त 2026 को मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय द्वारा पेश और पारित विशेष प्रस्ताव है, जिसमें केंद्र से माँग की गई है कि लोकसभा की सीटें 543 पर स्थायी रूप से बनाए रखी जाएँ और राज्यों के बीच संसदीय सीटों का मौजूदा बंटवारा सुरक्षित किया जाए। यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन केंद्र पर राजनीतिक दबाव बनाने का प्रयास है।
भाजपा ने DMK और TVK को 'एक ही नाव पर' क्यों कहा?
भाजपा प्रवक्ता नारायणन तिरुपति ने आरोप लगाया कि DMK परिसीमन पर अपना रुख बदलती रही है — पहले किसी भी सीट में कटौती का विरोध, और अब तमिलनाडु को 20 से अधिक सीटें मिलने का भरोसा दिलाया जा रहा है। उनके अनुसार TVK भी इसी भ्रम की राजनीति में शामिल है।
परिसीमन से दक्षिण भारत को क्या नुकसान होगा?
DMK प्रवक्ता टीकेएस इलांगोवन के अनुसार, जनसंख्या-आधारित परिसीमन लागू होने पर दक्षिण के चारों राज्यों को मिलाकर करीब 170 सांसद मिलेंगे, जबकि उत्तरी राज्यों को 680 — यह असंतुलन दक्षिणी राज्यों की संसद में आवाज़ को कमज़ोर करेगा। जनसंख्या नियंत्रण में सफल रहे दक्षिणी राज्यों को इस प्रक्रिया में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
भाजपा का परिसीमन पर क्या रुख है?
भाजपा विधायक भोजराजन ने कहा कि बेहतर जन-प्रतिनिधित्व के लिए परिसीमन जरूरी है ताकि अधिक सांसद समाज की बेहतर सेवा कर सकें। पार्टी ने परिसीमन को उत्तर-दक्षिण विभाजन का मुद्दा मानने से इनकार किया और मुख्यमंत्री विजय के प्रस्ताव का विरोध किया।
इस प्रस्ताव का आगे क्या असर होगा?
यह प्रस्ताव संसदीय रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन यह केंद्र-राज्य संबंधों में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत है। अन्य दक्षिणी राज्य भी इसी तरह के प्रस्ताव पारित कर सकते हैं, जिससे परिसीमन आयोग के गठन से पहले केंद्र पर दबाव बढ़ सकता है।
राष्ट्र प्रेस
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