परिसीमन पर तमिलनाडु में सियासी एकता: DMK ने TVK प्रस्ताव का समर्थन किया, उदयनिधि बोले — लोकसभा सीटें नहीं घटेंगी
सारांश
मुख्य बातें
तमिलनाडु विधानसभा में 12 अगस्त 2026 को परिसीमन के संवेदनशील मुद्दे पर दुर्लभ राजनीतिक एकजुटता देखने को मिली, जब विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय की TVK सरकार द्वारा लाए गए परिसीमन प्रस्ताव को द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) की ओर से पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भविष्य के किसी भी परिसीमन में तमिलनाडु की लोकसभा सीटों की संख्या किसी भी स्थिति में कम नहीं होनी चाहिए।
मुख्य घटनाक्रम
विधानसभा में प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान उदयनिधि स्टालिन ने कहा, 'DMK ने लगातार उस किसी भी परिसीमन प्रक्रिया का विरोध किया है जिससे राज्य को नुकसान हो सकता है।' उन्होंने यह भी याद दिलाया कि DMK अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन उन पहले राष्ट्रीय नेताओं में थे जिन्होंने जनसंख्या-आधारित परिसीमन के संभावित दुष्परिणामों के प्रति देश को सचेत किया था।
उदयनिधि ने बताया कि फरवरी 2024 में स्टालिन के नेतृत्व में विधानसभा ने परिसीमन पर एक प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 5 मार्च को सर्वदलीय बैठक बुलाई गई, जिसमें TVK सहित विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। स्टालिन ने सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख दलों के नेताओं को पत्र भी लिखे थे, और चेन्नई में विभिन्न राज्यों के नेताओं की संयुक्त कार्रवाई समिति की बैठक भी आयोजित की गई थी।
परिसीमन से तमिलनाडु को क्या खतरा
उदयनिधि स्टालिन ने आशंका जताई कि परिसीमन के संवैधानिक प्रावधानों को पुनः लागू किए जाने पर 2027 की जनगणना के आँकड़ों के आधार पर संसदीय सीटों का पुनर्वितरण हो सकता है। इससे उन दक्षिणी राज्यों को नुकसान होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है।
यह ऐसे समय में आया है जब राष्ट्रीय स्तर पर परिसीमन की बहस तेज़ हो रही है और दक्षिणी राज्य अपनी लोकसभा हिस्सेदारी को लेकर चिंतित हैं। गौरतलब है कि तमिलनाडु ने दशकों में जनसंख्या वृद्धि दर को काफी नियंत्रित किया है, जो जनसंख्या-आधारित परिसीमन में उसके लिए उलटा असर डाल सकता है।
DMK की प्रमुख माँगें
उदयनिधि स्टालिन ने माँग रखी कि परिसीमन से जुड़ी मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था को अगले 25 वर्षों के लिए बढ़ाया जाए, ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को संसदीय प्रतिनिधित्व में कटौती के रूप में दंडित न किया जाए।
इसके साथ ही उन्होंने संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण के प्रति DMK की प्रतिबद्धता दोहराई। हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि महिला आरक्षण को परिसीमन से जोड़ा जाता है, तो यह प्रक्रिया 1971 की जनसंख्या के आँकड़ों के आधार पर होनी चाहिए — न कि नई जनगणना के आधार पर।
राजनीतिक एकता का संकेत
DMK का यह समर्थन विधानसभा में तमिलनाडु के संसदीय प्रतिनिधित्व की रक्षा करने और महिला आरक्षण को आगे बढ़ाने पर व्यापक राजनीतिक सहमति का संकेत देता है। सत्तारूढ़ TVK और विपक्षी DMK का एक ही मंच पर खड़ा होना तमिलनाडु की राजनीति में असाधारण माना जा रहा है।
आगे क्या होगा
यह प्रस्ताव केंद्र सरकार को तमिलनाडु की सामूहिक राजनीतिक इच्छाशक्ति से अवगत कराने का प्रयास है। अब देखना होगा कि अन्य दक्षिणी राज्य इस मुद्दे पर किस हद तक एकजुट होते हैं और केंद्र की ओर से क्या प्रतिक्रिया आती है।