25 अगस्त 2026
LIVE
Get it on Google Play Download on the App Store

यूपी कॉलेज ड्रेस कोड विवाद: एसटी हसन बोले — धार्मिक पहचान में दखल बर्दाश्त नहीं

शेयर करें:
ऑडियो वॉइस लोड हो रही है…
यूपी कॉलेज ड्रेस कोड विवाद: एसटी हसन बोले — धार्मिक पहचान में दखल बर्दाश्त नहीं

सारांश

उत्तर प्रदेश के कॉलेजों में अनिवार्य ड्रेस कोड लागू होते ही सियासी बहस तेज हो गई है। सपा नेता एसटी हसन ने साफ कहा — पगड़ी, हिजाब और टोपी जैसी धार्मिक पहचानों को यूनिफॉर्म नीति से बाहर रखा जाए। यह विवाद उच्च शिक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और राजनीति के चौराहे पर खड़ा है।

मुख्य बातें

समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन ने 22 मई को यूपी कॉलेज ड्रेस कोड नीति पर आपत्ति दर्ज कराई।
हसन ने कहा कि पगड़ी, हिजाब और टोपी जैसी धार्मिक पहचानों में ड्रेस कोड के नाम पर दखल नहीं होना चाहिए।
उनके अनुसार ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एमफिल और पीएचडी स्तर पर ड्रेस कोड थोपना व्यावहारिक नहीं।
राज्य सरकार ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के निर्देशों पर यह नीति लागू की; उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय ने अनुशासन और समानता को उद्देश्य बताया।
नए नियमों के तहत जींस, टी-शर्ट, शॉर्ट्स पर प्रतिबंध और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रावधान।

उत्तर प्रदेश के विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में अनिवार्य ड्रेस कोड लागू करने के सरकारी फैसले पर समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता एसटी हसन ने 22 मई को कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। हसन ने स्पष्ट कहा कि ड्रेस कोड की आड़ में किसी भी छात्र की धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक परंपराओं में हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है। उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के निर्देशों पर राज्य सरकार ने उच्च शिक्षण संस्थानों में यूनिफॉर्म अनिवार्य करने का ऐलान किया है।

क्या है सरकार का फैसला

उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में ड्रेस कोड अनिवार्य कर दिया है। उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के अनुसार, इस निर्णय के पीछे तीन प्रमुख उद्देश्य हैं — अमीरी-गरीबी का भेदभाव समाप्त करना, कैंपस में अकादमिक माहौल बेहतर बनाना और छात्रों में अनुशासन स्थापित करना। नए नियमों के तहत जींस, टी-शर्ट और शॉर्ट्स जैसे कैजुअल परिधानों पर प्रतिबंध लगाया जाएगा और यूनिफॉर्म के बिना कैंपस में प्रवेश नहीं मिलेगा। नियम का उल्लंघन करने वाले छात्रों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई का भी प्रावधान है।

एसटी हसन की मुख्य आपत्तियाँ

सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि स्कूल स्तर तक ड्रेस कोड लागू करना संभव हो सकता है, परंतु ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन, एमफिल और पीएचडी के छात्रों पर इसे थोपना व्यावहारिक नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि ड्रेस कोड लागू भी किया जाए तो उसमें केवल पैंट-शर्ट या सलवार-कुर्ता जैसी सामान्य व्यवस्था होनी चाहिए।

हसन ने विशेष रूप से जोर दिया कि सिख समुदाय की पगड़ी और मुस्लिम छात्राओं के हिजाब जैसी धार्मिक प्रथाओं पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं लगाई जानी चाहिए। उन्होंने कहा, 'अगर कोई पगड़ी बाँध रहा है, कोई हिजाब पहन रहा है या कोई टोपी लगा रहा है — इन धार्मिक पहचानों को ड्रेस कोड की परिधि से बाहर रखा जाना चाहिए।'

युवाओं की भावना का हवाला

हसन ने यह भी दावा किया कि आज का युवा ड्रेस कोड को पसंद नहीं करता और यही 'जमीनी हकीकत' है। आलोचकों का कहना है कि उच्च शिक्षा में, जहाँ छात्र वयस्क होते हैं, इस तरह के प्रतिबंध व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से टकराव पैदा कर सकते हैं। गौरतलब है कि हिजाब विवाद पहले भी कर्नाटक सहित कई राज्यों में न्यायिक और राजनीतिक बहस का केंद्र रह चुका है।

राजनीतिक पृष्ठभूमि

यह विवाद ऐसे समय में उभरा है जब उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनावों की तैयारियाँ पृष्ठभूमि में चल रही हैं। सपा ने इस मुद्दे को अल्पसंख्यक और युवा वर्ग की भावनाओं से जोड़ते हुए सरकार पर निशाना साधा है। सत्तारूढ़ दल की ओर से अभी तक इन आपत्तियों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।

आगे क्या होगा

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ड्रेस कोड के दिशानिर्देशों में धार्मिक परिधानों को लेकर कोई स्पष्ट अपवाद शामिल किया जाएगा या नहीं। विपक्ष की माँग है कि सरकार इस विषय पर हितधारकों से परामर्श करे और नीति को अंतिम रूप देने से पहले धार्मिक विविधता का सम्मान सुनिश्चित करे।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि नीति में धार्मिक अपवादों को लेकर स्पष्टता क्यों नहीं है। हिजाब विवाद कर्नाटक में न्यायालय तक पहुँच चुका है — उत्तर प्रदेश सरकार के पास इससे सीखने का अवसर था। ड्रेस कोड को धार्मिक विविधता के साथ संतुलित करना प्रशासनिक चुनौती से कहीं अधिक संवैधानिक दायित्व है, और इस मुद्दे पर चुप्पी भविष्य में बड़े टकराव की ज़मीन तैयार कर सकती है।
RashtraPress
25 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

यूपी के कॉलेजों में ड्रेस कोड क्यों लागू किया गया?
उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्यपाल आनंदीबेन पटेल के निर्देशों पर विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में ड्रेस कोड अनिवार्य किया है। उच्च शिक्षा मंत्री योगेंद्र उपाध्याय के अनुसार इसका उद्देश्य अमीरी-गरीबी का भेद मिटाना, अकादमिक माहौल सुधारना और अनुशासन लाना है।
एसटी हसन ने ड्रेस कोड पर क्या आपत्ति जताई?
सपा नेता एसटी हसन ने कहा कि ड्रेस कोड के नाम पर किसी की धार्मिक पहचान — जैसे सिख समुदाय की पगड़ी या मुस्लिम छात्राओं का हिजाब — में दखल नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ग्रेजुएशन और उससे ऊपर के स्तर पर यूनिफॉर्म थोपना व्यावहारिक नहीं है।
नए ड्रेस कोड में क्या प्रतिबंधित है?
नए नियमों के तहत कैंपस में जींस, टी-शर्ट और शॉर्ट्स जैसे कैजुअल कपड़े प्रतिबंधित होंगे। यूनिफॉर्म के बिना आने वाले छात्रों को प्रवेश नहीं मिलेगा और उल्लंघन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
क्या धार्मिक परिधानों को ड्रेस कोड से छूट मिलेगी?
अभी तक सरकार की ओर से धार्मिक परिधानों को लेकर कोई स्पष्ट अपवाद घोषित नहीं किया गया है। सपा सहित विपक्षी दलों ने माँग की है कि नीति को अंतिम रूप देने से पहले इस पर स्पष्टता लाई जाए।
यह विवाद राजनीतिक रूप से क्यों महत्वपूर्ण है?
यह मुद्दा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की पृष्ठभूमि में उठा है, जहाँ अल्पसंख्यक और युवा मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। सपा ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता और युवाओं के अधिकारों से जोड़कर सरकार पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिश की है।
राष्ट्र प्रेस
सिलसिला

जुड़े बिंदु

इस ख़बर के पीछे की कड़ियाँ — सबसे नई पहले।

8 बिंदु
  1. नवीनतम 2 महीने पहले
  2. 3 महीने पहले
  3. 3 महीने पहले
  4. 3 महीने पहले
  5. 6 महीने पहले
  6. 6 महीने पहले
  7. 9 महीने पहले
  8. 11 महीने पहले