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चीनी महंगाई की जड़ एथेनॉल नहीं, जमाखोरी और बाज़ार की धारणा: पद्मश्री डॉ. बख्शी राम

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चीनी महंगाई की जड़ एथेनॉल नहीं, जमाखोरी और बाज़ार की धारणा: पद्मश्री डॉ. बख्शी राम

सारांश

पद्मश्री डॉ. बख्शी राम ने साफ़ कहा — चीनी महंगाई की वजह एथेनॉल नहीं, बल्कि जमाखोरी और बाज़ार की धारणा है। देश में 30-31 मिलियन टन उत्पादन और 60-70 लाख टन बफर स्टॉक के बावजूद कृत्रिम कमी बनाई जा रही है। सरकार के आयात और स्टॉक-सीमा कदमों से जल्द राहत मिलने की उम्मीद है।

मुख्य बातें

बख्शी राम ने 24 अगस्त को कहा कि चीनी की बढ़ती कीमतों के लिए एथेनॉल उत्पादन ज़िम्मेदार नहीं है।
पिछले सीज़न में देश में 30-31 मिलियन टन चीनी उत्पादन हुआ, जबकि खपत 27-28 मिलियन टन रही; 60-70 लाख टन बफर स्टॉक भी उपलब्ध है।
जमाखोरी, बाज़ार धारणा और आपूर्ति संबंधी आशंकाएँ कीमत वृद्धि के प्रमुख कारण बताए गए।
सरकार द्वारा 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात और व्यापारियों पर 400 टन स्टॉक सीमा लगाई गई।
15 अक्टूबर से अगेती पेराई शुरू होने पर बाज़ार में नई चीनी की आपूर्ति बढ़ेगी और कीमतों पर दबाव कम होगा।
सरकारी एजेंसियाँ चीनी मिलों और गोदामों का निरीक्षण कर कृत्रिम कमी रोकने में सक्रिय हैं।

देश में चीनी की बढ़ती कीमतों पर छिड़ी बहस के बीच著名 कृषि वैज्ञानिक और आईसीएआर-शुगरकेन ब्रीडिंग इंस्टीट्यूट, कोयंबटूर के पूर्व निदेशक पद्मश्री डॉ. बख्शी राम ने 24 अगस्त को स्पष्ट किया कि मौजूदा मूल्य वृद्धि को एथेनॉल उत्पादन से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। उनके अनुसार देश में चीनी का उत्पादन घरेलू खपत से अधिक है और पर्याप्त बफर स्टॉक उपलब्ध है। जमाखोरी, बाज़ार में बनी धारणा और आपूर्ति को लेकर फैलाई गई आशंकाएँ ही कीमतों में हालिया तेज़ी के असली कारण हैं।

एथेनॉल और चीनी उत्पादन का संबंध

डॉ. बख्शी राम ने बताया कि देश में एथेनॉल उत्पादन सरकार की सीधी निगरानी में होता है और यह निर्णय चीनी की उपलब्धता तथा स्टॉक की स्थिति को ध्यान में रखकर किया जाता है। सरकार समय-समय पर तय करती है कि एथेनॉल के लिए बी-हैवी शीरा, सी-शीरा या सिरप का कितना उपयोग किया जाएगा। उन्होंने कहा, "एथेनॉल कार्यक्रम से चीनी मिलों को वित्तीय मज़बूती मिली है और किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर होने लगा है। इसलिए चीनी की कीमतों में हालिया बढ़ोतरी के लिए एथेनॉल को ज़िम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।"

उत्पादन और बफर स्टॉक की वास्तविक स्थिति

डॉ. बख्शी राम ने आँकड़ों के साथ स्पष्ट किया कि पिछले सीज़न में देश में लगभग 30 से 31 मिलियन टन चीनी का उत्पादन हुआ, जबकि घरेलू खपत करीब 27 से 28 मिलियन टन के आसपास रहती है। इसके अतिरिक्त प्रतिवर्ष 60 से 70 लाख टन तक का बफर स्टॉक भी देश में मौजूद रहता है। उन्होंने कहा, "ऐसे में चीनी की वास्तविक कमी जैसी कोई स्थिति नहीं है।" यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब बाज़ार में कमी की अफवाहें उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ा रही हैं।

अगेती पेराई से राहत की उम्मीद

चीनी मिलों को 15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने की सलाह पर डॉ. बख्शी राम ने कहा कि इससे बाज़ार में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी, हालाँकि इसका असर शुगर रिकवरी पर पड़ सकता है। उन्होंने बताया कि सामान्यतः दिवाली के बाद पेराई शुरू होने पर गन्ने में चीनी की मात्रा अधिक होती है और रिकवरी बेहतर रहती है। उनके अनुसार, "यदि मिलें 15 अक्टूबर या उससे पहले पेराई शुरू करती हैं तो बाज़ार में नई चीनी जल्दी उपलब्ध होगी, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी और जमाखोरी की प्रवृत्ति पर भी असर पड़ सकता है।"

सरकारी कदमों का स्वागत

सरकार द्वारा 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात और व्यापारियों पर 400 टन स्टॉक सीमा लगाने के फैसले का स्वागत करते हुए डॉ. बख्शी राम ने कहा कि इससे बाज़ार को स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकार कीमतों को नियंत्रण में रखने के लिए सक्रिय है। उन्होंने कहा, "जब व्यापारियों और जमाखोरों को यह संकेत मिलेगा कि ज़रूरत पड़ने पर सरकार आयात की मात्रा और बढ़ा सकती है, तो कृत्रिम कमी पैदा करने की कोशिशें कमज़ोर पड़ेंगी।" गौरतलब है कि कुछ वर्ष पहले अत्यधिक उत्पादन के कारण कीमतें गिर गई थीं और तब कई मिलें किसानों को समय पर भुगतान नहीं कर पाई थीं — एथेनॉल नीति ने उस स्थिति को बदला।

निगरानी और आगे की राह

डॉ. बख्शी राम ने बताया कि हाल ही में विभिन्न सरकारी एजेंसियों की टीमें चीनी मिलों और गोदामों का निरीक्षण कर रही हैं। अधिकारी स्वयं गोदामों में जाकर उपलब्ध स्टॉक की जाँच कर रहे हैं ताकि कृत्रिम कमी न बनाई जा सके। उन्होंने विश्वास जताया कि सरकार की सक्रिय निगरानी से चीनी की उपलब्धता और कीमतों दोनों में जल्द स्थिरता आएगी और यदि आवश्यक हुआ तो आयात की मात्रा बढ़ाने जैसे अतिरिक्त कदम भी उठाए जा सकते हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

तो कीमतें क्यों बढ़ रही हैं — और इसका जवाब वितरण श्रृंखला की निगरानी की कमज़ोरियों में छिपा है। सरकार के स्टॉक-सीमा और आयात कदम सही दिशा में हैं, लेकिन जब तक गोदाम-स्तर पर पारदर्शी और नियमित निरीक्षण तंत्र स्थायी रूप से नहीं बनता, जमाखोरी का चक्र हर सीज़न दोहराता रहेगा। एथेनॉल नीति की सफलता को इस विवाद में घसीटना किसानों और मिलों दोनों के लिए नुकसानदेह है।
RashtraPress
24 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या एथेनॉल उत्पादन से चीनी महंगी हो रही है?
पद्मश्री डॉ. बख्शी राम के अनुसार नहीं। एथेनॉल उत्पादन सरकार की निगरानी में चीनी उपलब्धता को ध्यान में रखकर तय किया जाता है और देश में उत्पादन घरेलू खपत से अधिक है, इसलिए एथेनॉल को कीमत वृद्धि का कारण नहीं माना जा सकता।
भारत में चीनी का उत्पादन और बफर स्टॉक कितना है?
पिछले सीज़न में देश में लगभग 30 से 31 मिलियन टन चीनी का उत्पादन हुआ, जबकि घरेलू खपत 27 से 28 मिलियन टन के आसपास रहती है। इसके अलावा प्रतिवर्ष 60 से 70 लाख टन तक का बफर स्टॉक भी उपलब्ध रहता है।
सरकार ने चीनी की कीमतें नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं?
सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी का शुल्क-मुक्त आयात करने और व्यापारियों पर 400 टन की स्टॉक सीमा लगाने का फैसला किया है। साथ ही सरकारी एजेंसियाँ चीनी मिलों और गोदामों का निरीक्षण कर रही हैं ताकि कृत्रिम कमी न बनाई जा सके।
15 अक्टूबर से पेराई शुरू करने से चीनी की कीमतों पर क्या असर होगा?
डॉ. बख्शी राम के अनुसार अगेती पेराई से बाज़ार में नई चीनी जल्दी उपलब्ध होगी, जिससे आपूर्ति बढ़ेगी और जमाखोरी पर अंकुश लगेगा। हालाँकि इससे शुगर रिकवरी दर पर कुछ असर पड़ सकता है क्योंकि दिवाली के बाद गन्ने में चीनी की मात्रा अधिक होती है।
एथेनॉल नीति का किसानों और चीनी मिलों पर क्या प्रभाव पड़ा है?
डॉ. बख्शी राम ने बताया कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से चीनी मिलों को अतिरिक्त आय का स्रोत मिला और उनकी वित्तीय स्थिति मज़बूत हुई। इसका सीधा लाभ किसानों को मिला क्योंकि गन्ने के बकाया भुगतान समय पर होने लगे, जो पहले एक बड़ी समस्या थी।
राष्ट्र प्रेस
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