चीनी महंगी होने की असली वजह एथेनॉल नहीं, गन्ने का कम उत्पादन और घटती रिकवरी: कृषि विशेषज्ञ
सारांश
मुख्य बातें
देश में चीनी की बढ़ती कीमतों को लेकर चल रही बहस के बीच कृषि और चीनी उद्योग के जानकारों ने स्पष्ट किया है कि इस तेज़ी के पीछे एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का डायवर्जन नहीं, बल्कि गन्ने के उत्पादन में गिरावट और चीनी रिकवरी में कमी प्रमुख कारण हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार घरेलू आपूर्ति, एथेनॉल और निर्यात के बीच निरंतर संतुलन बनाए रखती है और उपभोक्ताओं की ज़रूरतों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती है।
एथेनॉल डायवर्जन पर विशेषज्ञ की राय
नेशनल शुगर इंस्टीट्यूट, कानपुर के पूर्व निदेशक प्रोफेसर नरेंद्र मोहन ने कहा कि हाल के दिनों में चीनी की कीमतों में आई तेज़ी कुछ हद तक अप्रत्याशित ज़रूर है, लेकिन इसके लिए सीधे तौर पर एथेनॉल उत्पादन को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने बताया कि सरकार हर वर्ष चीनी उत्पादन का आकलन करते समय यह सुनिश्चित करती है कि देश की घरेलू ज़रूरतों के लिए पर्याप्त मात्रा उपलब्ध रहे।
प्रोफेसर मोहन ने स्पष्ट किया कि देश में सालाना लगभग 280 लाख टन चीनी की आवश्यकता होती है। इसके बाद ही अतिरिक्त मात्रा को एथेनॉल उत्पादन या निर्यात के लिए अनुमति दी जाती है। उन्होंने बताया कि चालू वर्ष में लगभग 31 लाख टन चीनी के बराबर मात्रा एथेनॉल उत्पादन में उपयोग हुई, जबकि करीब 7 लाख टन का निर्यात भी हुआ — फिर भी देश में पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है।
उन्होंने कहा, "इस वर्ष देश में करीब 306 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ है और पिछले वर्ष का कैरी-ओवर स्टॉक भी उपलब्ध था। सामान्य परिस्थितियों में भारत के पास 50 लाख टन या उससे अधिक का बफर स्टॉक रहता है, ताकि किसी अप्रत्याशित स्थिति में बाज़ार में आपूर्ति प्रभावित न हो। ऐसे में केवल एथेनॉल डायवर्जन को चीनी महंगी होने का कारण बताना उचित नहीं होगा।"
एथेनॉल नीति के फ़ायदे
प्रोफेसर मोहन ने कहा कि भारतीय चीनी उद्योग के लिए एथेनॉल एक 'गेम चेंजर' साबित हुआ है। पहले जब देश में चीनी का उत्पादन ज़रूरत से अधिक हो जाता था, तो बाज़ार में कीमतें गिर जाती थीं और चीनी मिलों को नुकसान उठाना पड़ता था, जिसका सीधा असर किसानों के भुगतान पर पड़ता था।
उन्होंने बताया कि अतिरिक्त चीनी को एथेनॉल उत्पादन में उपयोग करने की नीति से न केवल चीनी उद्योग को स्थिरता मिली, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात में कमी और स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने जैसे कई लाभ भी प्राप्त हुए। सरकार उत्पादन स्थिति की लगातार समीक्षा करती है और यदि उत्पादन कम होने की आशंका हो, तो डायवर्जन और निर्यात दोनों पर नियंत्रण किया जा सकता है।
गन्ना उत्पादन और रिकवरी की भूमिका
बिहार कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू), सबौर के गन्ना शोध विभाग के कृषि वैज्ञानिक डॉ. हरिओम ने बताया कि मौजूदा स्थिति की एक बड़ी वजह गुणवत्तापूर्ण गन्ना उत्पादन में कमी भी है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे राज्यों में गन्ने की फसल अवधि अधिक होने के कारण वहाँ चीनी रिकवरी भी ज़्यादा होती है, जबकि उत्तर भारत में अपेक्षाकृत कम अवधि में गन्ने की कटाई और पेराई हो जाती है।
डॉ. हरिओम ने बताया कि उत्तर भारत के किसान अप्रैल-मई में गन्ने की बुआई करते हैं और लगभग 10 से 11 महीने में फसल तैयार हो जाती है। इसके विपरीत महाराष्ट्र में किसान अक्टूबर-नवंबर में गन्ना लगाते हैं और फसल को 13 से 14 महीने तक खेत में रहने देते हैं — इस लंबी अवधि के कारण गन्ने में चीनी संचय अधिक होता है और रिकवरी बेहतर मिलती है। तमिलनाडु में गन्ना जुलाई-अगस्त में लगाया जाता है और फसल अवधि 18 महीने तक पहुँच जाती है, जिससे वहाँ प्रति हेक्टेयर उत्पादकता देश में सर्वाधिक मानी जाती है। महाराष्ट्र में चीनी रिकवरी लगभग 13-14 प्रतिशत तक पहुँचती है, जो देश के सर्वश्रेष्ठ स्तरों में शामिल है।
उन्होंने बताया कि फिलहाल उत्तर भारत में गन्ना पेराई का 'लीन सीजन' चल रहा है। जैसे ही कटाई और पेराई का मुख्य सीजन शुरू होगा, चीनी उत्पादन में वृद्धि होगी और बाज़ार में आपूर्ति बेहतर होने से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।
किसानों के लिए अंतरवर्ती खेती का सुझाव
डॉ. हरिओम ने सुझाव दिया कि उत्तर भारत के किसान यदि धान की कटाई के बाद अक्टूबर-नवंबर में गन्ने की खेती शुरू करें और साथ में गेहूँ, सरसों, मसूर, चना या सब्ज़ियाँ जैसी अंतरवर्ती फसलें लगाएँ, तो उन्हें अतिरिक्त आय मिल सकती है और गन्ने की गुणवत्ता में भी सुधार हो सकता है।
बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा किए गए शोध में पाया गया कि गन्ने के साथ लौकी, करेला, नेनुआ, भिंडी, मूंग और अन्य फसलें उगाने से गन्ने के उत्पादन पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता, बल्कि किसानों को अतिरिक्त उत्पादन और आय का लाभ मिलता है। आने वाले पेराई सीजन में स्थिति स्पष्ट होने की उम्मीद है।