चीनी महंगाई की असली वजह बाजार की धारणा, एथेनॉल नहीं: जीईएमए अध्यक्ष डॉ. सी.के. जैन
सारांश
मुख्य बातें
ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (जीईएमए) ने 24 अगस्त 2026 को स्पष्ट किया कि देश में चीनी की कीमतों में हालिया उछाल का कारण एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने का उपयोग नहीं, बल्कि बाजार की मनोवैज्ञानिक धारणा और आगामी गन्ना फसल को लेकर बनी अनिश्चितता है। संगठन ने उन दावों को सिरे से खारिज किया जिनमें चीनी महंगाई के लिए एथेनॉल कार्यक्रम को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था।
मुख्य घटनाक्रम
जीईएमए के अध्यक्ष डॉ. सी.के. जैन ने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में चीनी की उपलब्धता पर एथेनॉल उत्पादन का कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा है। उन्होंने कहा, 'एथेनॉल उत्पादन का चीनी की कीमतों में वृद्धि से कोई संबंध नहीं है। बाजार में चीनी की कीमतें पूरी तरह भावना-आधारित हैं।'
डॉ. जैन ने बाजार मूल्य और एक्स-मिल प्राइस (चीनी मिल से निकलने वाली कीमत) के बीच के अंतर को समझने पर जोर दिया। उनके अनुसार, जब यह अंतर बढ़ जाता है, तो यह संकेत मिलता है कि कीमतें वास्तविक आपूर्ति संकट की बजाय अटकलों और मनोवैज्ञानिक कारकों से प्रेरित हैं।
एथेनॉल आपूर्ति वर्ष और उत्पादन का संदर्भ
डॉ. जैन ने बताया कि एथेनॉल आपूर्ति वर्ष 2025-26 के लिए गन्ने के उपयोग का निर्णय सितंबर 2025 में लिया गया था। उस समय अनुमान था कि लगभग 30 लाख टन अतिरिक्त चीनी भंडार में जा सकती थी, जिसे ऊर्जा क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल किया जा सकता था।
यह ऐसे समय में आया है जब अत्यधिक बारिश, रेड रॉट रोग और कई क्षेत्रों में जलभराव ने गन्ने और चीनी उत्पादन को कुछ हद तक प्रभावित किया। हालांकि डॉ. जैन के अनुसार उत्पादन में आई यह कमी इतनी बड़ी नहीं है कि बाजार में वास्तविक कमी की स्थिति पैदा हो सके। उन्होंने कहा, 'आज भी चीनी मिलों के पास पर्याप्त स्टॉक उपलब्ध है। भंडार में कोई कमी नहीं है।'
सरकारी आकलन से सहमति
जीईएमए अध्यक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि उनका संगठन सरकार के इस आकलन से '100 प्रतिशत सहमत' है कि एथेनॉल उत्पादन को चीनी की कीमतों में वृद्धि के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय में आया है जब उद्योग और उपभोक्ता समूहों के बीच एथेनॉल नीति को लेकर बहस तेज हो रही है।
डॉ. जैन ने यह भी बताया कि नई पेराई सीजन की शुरुआत के साथ अधिकांश चीनी मिलें 15 अक्टूबर से परिचालन शुरू कर देंगी, जिससे बाजार में आपूर्ति और मजबूत होगी।
एमएसपी और एफआरपी की विसंगति
डॉ. जैन ने चीनी उद्योग की लागत संरचना में एक बड़ी खामी की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि चीनी की कीमत का सीधा संबंध गन्ने के उचित एवं लाभकारी मूल्य (एफआरपी) से है, जिसे सरकार हर वर्ष बढ़ाती है। इससे चीनी मिलों की कच्चे माल की लागत लगातार ऊपर जाती है।
इसके विपरीत, चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य (एमएसपी) पिछले आठ वर्षों से नहीं बढ़ाया गया है — जिसे डॉ. जैन ने 'वर्तमान व्यवस्था की सबसे बड़ी विसंगति' बताया। उन्होंने कहा, 'यह हमारे तंत्र की एक खामी है, जिसे दूर किए जाने की आवश्यकता है।'
आम जनता और किसानों पर असर
जीईएमए अध्यक्ष ने नीति निर्माण में तीन पक्षों — गन्ना किसान, चीनी मिलें और उपभोक्ता — के हितों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना है कि किसानों को उचित एफआरपी, उद्योग को आर्थिक स्थिरता और उपभोक्ताओं को किफायती कीमत — तीनों एक साथ सुनिश्चित होने चाहिए। आने वाले हफ्तों में नई पेराई सीजन की शुरुआत से बाजार की स्थिति स्पष्ट होगी और अटकलों पर आधारित मूल्य वृद्धि पर अंकुश लगने की उम्मीद है।