सोनू सूद का जन्मदिन: पर्दे के खलनायक से असल जिंदगी के मसीहा बनने की पूरी कहानी
सारांश
मुख्य बातें
सोनू सूद — वही चेहरा जिसे करोड़ों दर्शकों ने फिल्मों में खलनायक के रूप में देखा — 30 जुलाई 1973 को पंजाब के मोगा में जन्मे और आज भारत के सबसे चर्चित मानवतावादी हस्तियों में गिने जाते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान 90,000 से अधिक प्रवासी मजदूरों को घर पहुँचाने वाले इस अभिनेता की यात्रा महज ₹5,500 लेकर मुंबई आने से शुरू हुई थी।
मोगा से मुंबई: संघर्ष की नींव
सोनू सूद के पिता शक्ति सागर सूद एक सफल उद्यमी थे और माता सरोज सूद शिक्षिका थीं। मोगा में प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने नागपुर के प्रतिष्ठित यशवंतराव चव्हाण कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (YCCE) से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।
इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में ग्रासिम मिस्टर इंडिया प्रतियोगिता के शीर्ष पाँच में जगह बनाने के बाद उनका झुकाव मॉडलिंग की ओर हो गया। अभिनेता बनने का सपना लेकर वे मात्र ₹5,500 की पूँजी के साथ मुंबई पहुँचे। शुरुआती दिनों में उन्होंने छह अन्य लोगों के साथ एक छोटा कमरा साझा किया और ₹4,500 प्रतिमाह की निजी नौकरी करके गुज़ारा किया। उनका पहला मॉडलिंग असाइनमेंट केवल ₹500 का था — उस साम्राज्य की मामूली शुरुआत जो आगे चलकर खड़ा होना था।
निजी जीवन और अनुशासन
25 सितंबर 1996 को सोनू सूद ने सोनाली सूद से विवाह किया। दंपति के दो पुत्र हैं — ईशांत और अयान। वे शुद्ध शाकाहारी हैं, धूम्रपान और मदिरा से पूर्णतः दूर रहते हैं और अपनी फिटनेस के लिए किक-बॉक्सिंग का नियमित अभ्यास करते हैं।
पर्दे पर खलनायक: करियर के मील के पत्थर
सोनू सूद ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 1999 में तमिल फिल्म 'कल्लाझगर' से की। 2002 में बॉलीवुड में 'शहीद-ए-आजम' से कदम रखा और धीरे-धीरे उद्योग में पहचान बनाई।
2008 में तेलुगु फिल्म 'अरुंधति' में अघोरा (खलनायक) की भूमिका के लिए उन्हें नंदी पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ खलनायक) और फिल्मफेयर सम्मान मिला। 2010 में हिंदी फिल्म 'दबंग' में छेदी सिंह के किरदार के लिए अप्सरा अवॉर्ड और आईफा अवॉर्ड प्राप्त हुए। 2017 में उन्होंने जैकी चैन के साथ 'कुंग फू योगा' में मुख्य विलेन रान्डेल की भूमिका निभाकर अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की।
महामारी में मसीहा: सूद चैरिटी फाउंडेशन
सोनू सूद का सबसे स्थायी योगदान सिनेमा के पर्दे से बाहर है। कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान उनके मानवीय कार्यों को संस्थागत रूप देने के लिए 'सूद चैरिटी फाउंडेशन' की स्थापना की गई। फाउंडेशन ने 90,000 से अधिक प्रवासी मजदूरों को उनके घर पहुँचाया, 300 से अधिक ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराए और 300 से अधिक हृदय शल्य-चिकित्साओं में सहायता की।
रोज़गार संकट से जूझते प्रवासियों के लिए उन्होंने 'प्रवासी रोजगार' पोर्टल लॉन्च किया। इस पहल की सफलता को देखते हुए इसे बाद में टेमासेक समर्थित गुड वर्कर से 3.4 करोड़ डॉलर (लगभग ₹280 करोड़) का निवेश प्राप्त हुआ। इस मंच का दीर्घकालिक लक्ष्य 10 करोड़ भारतीयों को आजीविका और अपस्किलिंग से जोड़ना है।
इसके अलावा उन्होंने 'संभवम्' (मुफ्त IAS कोचिंग) और 'संकल्प' (कानून प्रवेश परीक्षा तैयारी) जैसी शिक्षा-केंद्रित पहलें भी चलाईं। इसी समर्पण को मान्यता देते हुए 27 अगस्त 2021 को दिल्ली सरकार ने उन्हें 'देश के मेंटर' कार्यक्रम का ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया।
लेखन, तकनीक और आगे की राह
दिसंबर 2020 में सोनू सूद ने वरिष्ठ पत्रकार मीना के. अय्यर के साथ मिलकर अपनी आत्मकथा 'आई एम नो मसीहा' प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने अपने अनुभव जनमानस से साझा किए। 7 जून 2022 को उन्होंने 'एक्सप्लर्जर' नामक ट्रैवल सोशल मीडिया ऐप भी लॉन्च किया।
हाल ही में CJP प्रोटेस्ट के बीच 20 जुलाई को सोनू सूद ने एक्स (X) पर पोस्ट किया: 'हमारे छात्रों को लाठियां नहीं, गले लगाने वाले हाथ चाहिए।' यह बयान व्यापक रूप से साझा किया गया। फिलहाल वे सामाजिक कार्यों, जरूरतमंदों की सहायता और आगामी फिल्मों की तैयारियों में सक्रिय हैं।