फॉर्म-6 में संशोधन नहीं तो चुनाव किस आधार पर? सुप्रीम कोर्ट में ECI के हलफनामे पर याचिकाकर्ताओं के तीखे सवाल
सारांश
मुख्य बातें
सर्वोच्च न्यायालय ने 27 अक्टूबर 2026 को चुनाव आयोग के कामकाज और विभिन्न राज्यों में एसआईआर (SIR) प्रक्रिया को चुनौती देने वाली कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित 13 विपक्षी नेताओं की याचिकाओं पर सुनवाई स्थगित कर दी। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को चुनाव आयोग के 248 पन्नों के हलफनामे पर 10 दिनों के भीतर अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। साथ ही याचिकाकर्ताओं ने तीखा सवाल उठाया है कि यदि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया, तो विभिन्न राज्यों में चुनाव किस वैधानिक आधार पर संपन्न कराए गए?
मुख्य घटनाक्रम
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने बताया कि अदालत ने रिजॉइंडर दाखिल करने के लिए 10 दिन का समय दिया है। उन्होंने कहा कि इस बीच यदि चुनाव आयोग को भी कोई अतिरिक्त दस्तावेज़ प्रस्तुत करने हों, तो उसके लिए भी समय दिया गया है। तृणमूल कांग्रेस (TMC) नेता डोला सेन द्वारा दायर अलग याचिका में भी नोटिस जारी किया गया है।
अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि तीन मास्टर याचिकाओं पर आए चुनाव आयोग के जवाब को अन्य पक्षों को भी उपलब्ध कराया जाए और इस विषय से जुड़े अन्य लंबित मामलों में भी नोटिस जारी किया जाए। अगली सुनवाई न्यायालय की छुट्टियों के बाद सूचीबद्ध होने की संभावना है।
फॉर्म-6 पर केंद्रीय विवाद
एडवोकेट नरेंद्र मिश्रा ने बताया कि याचिकाओं में फॉर्म-6 को लेकर चार महत्वपूर्ण प्रार्थनाएँ थीं। चुनाव आयोग ने अपने हलफनामे में स्वीकार किया है कि फॉर्म-6 में कोई संशोधन नहीं किया गया। इस स्वीकृति के बाद याचिकाकर्ताओं का मूल प्रश्न और तीखा हो गया है — यदि संशोधन नहीं हुआ, तो उसमें क्या जोड़ा और क्या हटाया गया? और क्या ऐसा करने की शक्ति चुनाव आयोग के पास थी, या यह अधिकार केवल संसद के पास था?
गौरतलब है कि यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि एसआईआर प्रक्रिया से जुड़े 13 करोड़ मतदाताओं के मताधिकार का सवाल अभी भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है।
चुनाव आयोग के हलफनामे पर आपत्तियाँ
एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने चुनाव आयोग के जवाब को 'असंतोषजनक' करार दिया। उनके अनुसार, प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि याचिका में लगाए गए आरोपों को 'अनमने मन से' स्वीकार किया गया है — सीधे तौर पर गलती माने बिना, परंतु संकेत अवश्य दिए गए हैं।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि हलफनामे में चुनाव आयोग के प्रमुख अधिकारियों — ज्ञानेश कुमार, मनीष गर्ग और सीमा खन्ना — को बचाने की 'भरपूर कोशिश' की गई है। हलफनामे में यह भी कहा गया है कि यदि कोई अधिकारी अवैध आचरण का दोषी पाया जाता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होगी — जिसे याचिकाकर्ता अपने आरोपों की परोक्ष स्वीकृति मानते हैं।
जवाबदेही और सुरक्षा कवच पर प्रश्न
एडवोकेट नरेंद्र मिश्रा ने धारा 16 और धारा 23 के तहत चुनाव आयुक्तों को दिए गए सुरक्षा कवच पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क है कि चुनाव आयुक्त मूलतः आईएएस अधिकारी होते हैं जो पदोन्नति से इस पद तक पहुँचते हैं। ऐसे में धारा 16 द्वारा दिया गया संरक्षण — जो उन्हें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान दर्जा देता है — अन्य आईएएस अधिकारियों के लिए भी लागू हो सकने की व्याख्या का द्वार खोलता है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में किसी त्रुटि या अनियमितता के मामले में आपराधिक या दीवानी कार्रवाई की नौबत आती है, तो यह व्यापक सुरक्षा कवच जवाबदेही को किस प्रकार सुनिश्चित करेगा — यह प्रश्न अनुत्तरित रहता है।
आगे क्या होगा
याचिकाकर्ताओं को अगले 10 दिनों में अपना रिजॉइंडर दाखिल करना है। इसके बाद अदालत की छुट्टियों के उपरांत मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय होगी। 13 करोड़ मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ा यह मामला संवैधानिक और चुनावी कानून की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है, और इसका निर्णय भविष्य में चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा तय कर सकता है।