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दक्षिण कश्मीर में चार काले भालू पकड़े गए, वन्यजीव विभाग का रेस्क्यू ऑपरेशन सफल

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दक्षिण कश्मीर में चार काले भालू पकड़े गए, वन्यजीव विभाग का रेस्क्यू ऑपरेशन सफल

सारांश

दक्षिण कश्मीर में इंसानी बस्तियों तक पहुँचे चार काले भालू वन्यजीव विभाग ने पकड़े — 500 किलो के नर भालू सहित। यह घटना बताती है कि जलवायु परिवर्तन और सिकुड़ते बफर जोन के कारण कश्मीर घाटी में मानव-वन्यजीव टकराव अब नई सामान्य स्थिति बनती जा रही है।

मुख्य बातें

जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग ने 7 नवंबर 2026 को दक्षिण कश्मीर में चार एशियाई काले भालू पकड़े।
कोकरनाग के 'बचू सगम' में 500 किलो वजनी नर भालू को ट्रैंक्विलाइज़र से काबू किया गया; तीन अन्य 'अशमाकुम' में पिंजरों से पकड़े गए।
ऑपरेशन का नेतृत्व वन्यजीव दक्षिण प्रभाग बिजबेहरा ने किया; सभी भालुओं को निगरानी के बाद प्राकृतिक आवास में छोड़ा जाएगा।
जलवायु परिवर्तन से हाइबरनेशन चक्र बाधित और बफर जोन सिकुड़ने से कश्मीर में मानव-वन्यजीव टकराव बढ़ रहा है।
हाल के हफ्तों में बडगाम , बारामूला , गांदरबल और कुलगाम में तेंदुए भी पकड़कर स्थानांतरित किए गए हैं।
विभाग ने रैपिड-रिस्पॉन्स टीमें और कंट्रोल रूम तैनात किए; जानवरों को अक्सर दाचीगाम नेशनल पार्क में छोड़ा जाता है।

जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग ने 7 नवंबर 2026 को दक्षिण कश्मीर के इंसानी बस्तियों के करीब पहुँचे चार एशियाई काले भालुओं को सफलतापूर्वक पकड़ लिया। एक दिन चले इस रेस्क्यू ऑपरेशन में अनंतनाग जिले के कोकरनाग और अशमाकुम इलाकों को कवर किया गया।

ऑपरेशन का विवरण

अधिकारियों के अनुसार, कोकरनाग के 'बचू सगम' क्षेत्र में एक 500 किलो वजनी नर भालू को ट्रैंक्विलाइज़र देकर बेहोश किया गया और फिर काबू में लिया गया। वहीं, 'सीर वन्यजीव नियंत्रण कक्ष' द्वारा 'अशमाकुम' में लगाए गए पिंजरों में तीन अन्य भालू पकड़े गए।

वन्यजीव दक्षिण प्रभाग बिजबेहरा ने पूरे अभियान का नेतृत्व किया और चारों भालुओं को जीवित पकड़ने में सफलता हासिल की। विभाग के अनुसार, इन भालुओं को कुछ समय तक निगरानी में रखा जाएगा और उसके बाद उनके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ दिया जाएगा।

इंसानी बस्तियों में भालुओं के आने के कारण

विशेषज्ञों के अनुसार, जलवायु परिवर्तन के चलते सर्दियाँ कम ठंडी होने से भालुओं का प्राकृतिक हाइबरनेशन (शीतनिद्रा) चक्र प्रभावित हुआ है, जिससे वे लंबे समय तक सक्रिय बने रहते हैं। सेब के बागों का विस्तार और जंगल व इंसानी बस्तियों के बीच के बफर जोन के सिकुड़ने से भी ये जानवर भोजन की तलाश में आबादी के करीब आ रहे हैं।

गौरतलब है कि वन्यजीव संरक्षण कानूनों और शिकार पर पाबंदी के कारण काले भालुओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जिससे मनुष्य-वन्यजीव टकराव के मामले भी बढ़े हैं। श्रीनगर (विश्वविद्यालय परिसरों सहित), अनंतनाग, गांदरबल, बांदीपोरा और कुपवाड़ा जिलों में भालुओं को इंसानी इलाकों में विचरते देखा गया है।

तेंदुए और अन्य जंगली जानवर भी बढ़ती चिंता

काले भालुओं के अलावा, कश्मीर घाटी में कॉमन लेपर्ड (तेंदुए) की मानव बस्तियों में आमद भी लगातार बढ़ रही है। तेंदुए घने सामाजिक वानिकी क्षेत्रों, नर्सरियों और सेब के बागों में छिपकर रहने लगे हैं।

हाल के हफ्तों में विभाग ने बडगाम डिग्री कॉलेज रोड, बारामूला की माइक्रोवेव कॉलोनी और गांदरबल तथा कुलगाम के गाँवों के पास दिखे तेंदुओं को भी पकड़कर दूसरी जगहों पर स्थानांतरित किया है। कस्बों और गाँवों के पास कचरे के अनुचित प्रबंधन से पनपे लावारिस कुत्ते और पालतू पशु इन जंगली जानवरों के लिए भोजन का आसान स्रोत बन रहे हैं।

विभाग की तैयारी और आम जनता के लिए सलाह

जम्मू-कश्मीर वन्यजीव संरक्षण विभाग ने जंगली जानवरों को तत्काल बेहोश कर पकड़ने के लिए 'रैपिड-रिस्पॉन्स' टीमें और कंट्रोल रूम तैनात किए हैं। पकड़े गए जानवरों को अक्सर दाचीगाम नेशनल पार्क जैसे संरक्षित आवासों में छोड़ा जाता है।

अधिकारियों ने स्थानीय निवासियों से अपील की है कि फसल कटाई के मौसम और सर्दियों की शुरुआत में सतर्क रहें, पालतू पशुओं को सुरक्षित रखें, और कोई भी जंगली जानवर दिखने पर तुरंत स्थानीय वन्यजीव कंट्रोल रूम को सूचित करें। बढ़ते मानव-वन्यजीव टकराव को देखते हुए विशेषज्ञों का कहना है कि दीर्घकालिक समाधान के लिए बफर जोन को पुनः स्थापित करना और कचरा प्रबंधन सुधारना ज़रूरी है।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन यह एक बड़े संकट का लक्षण भर है। कश्मीर घाटी में मानव-वन्यजीव टकराव की घटनाएँ अब छिटपुट नहीं रहीं — वे संरचनात्मक समस्या का रूप ले चुकी हैं। रैपिड-रिस्पॉन्स टीमें तात्कालिक राहत देती हैं, लेकिन जब तक बफर जोन की बहाली, कचरा प्रबंधन सुधार और जलवायु-अनुकूल भूमि उपयोग नीतियाँ नहीं बनतीं, तब तक ये पकड़-छोड़ अभियान एक अंतहीन चक्र बने रहेंगे। मुख्यधारा की कवरेज रेस्क्यू की सफलता पर रुक जाती है — असली सवाल यह है कि क्या प्रशासन के पास इस टकराव को रोकने की दीर्घकालिक योजना है।
RashtraPress
8 नवंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दक्षिण कश्मीर में चार काले भालू कहाँ और कैसे पकड़े गए?
7 नवंबर 2026 को अनंतनाग जिले के कोकरनाग स्थित 'बचू सगम' में एक 500 किलो के नर भालू को ट्रैंक्विलाइज़र देकर काबू किया गया, जबकि 'अशमाकुम' में लगाए गए पिंजरों में तीन अन्य भालू पकड़े गए। पूरा ऑपरेशन वन्यजीव दक्षिण प्रभाग बिजबेहरा ने संचालित किया।
पकड़े गए भालुओं का आगे क्या होगा?
अधिकारियों के अनुसार, चारों भालुओं को कुछ समय तक निगरानी में रखा जाएगा और फिर उन्हें उनके प्राकृतिक आवास में वापस छोड़ दिया जाएगा। विभाग प्रायः दाचीगाम नेशनल पार्क जैसे संरक्षित क्षेत्रों में इन्हें पुनर्स्थापित करता है।
कश्मीर में काले भालू इंसानी बस्तियों में क्यों आ रहे हैं?
जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियाँ कम ठंडी होने से भालुओं का हाइबरनेशन चक्र प्रभावित हुआ है और वे लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। इसके साथ ही सेब के बागों का विस्तार, बफर जोन का सिकुड़ना और लावारिस कुत्तों व पालतू पशुओं की उपलब्धता इन्हें आबादी के पास खींच लाती है।
कश्मीर के किन जिलों में जंगली जानवरों का खतरा सबसे ज़्यादा है?
श्रीनगर (विश्वविद्यालय परिसरों सहित), अनंतनाग, गांदरबल, बांदीपोरा और कुपवाड़ा जिलों में भालुओं और तेंदुओं को बार-बार देखा गया है। बडगाम, बारामूला और कुलगाम में भी हाल के हफ्तों में तेंदुए पकड़कर स्थानांतरित किए गए हैं।
जंगली जानवर दिखने पर स्थानीय लोगों को क्या करना चाहिए?
वन्यजीव विभाग ने सलाह दी है कि फसल कटाई और सर्दियों की शुरुआत के दौरान विशेष सतर्कता बरतें, पालतू पशुओं को सुरक्षित रखें और जंगली जानवर दिखते ही तुरंत स्थानीय वन्यजीव कंट्रोल रूम को सूचित करें। विभाग ने इसके लिए रैपिड-रिस्पॉन्स टीमें और कंट्रोल रूम तैनात किए हैं।
राष्ट्र प्रेस
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