गाजीपुर चकबंदी विवाद: सपा विधायक डॉ. वीरेंद्र यादव ने जमीन कब्जे के आरोपों को बताया राजनीतिक साजिश
सारांश
मुख्य बातें
उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के सकरा गांव में चकबंदी प्रक्रिया के दौरान जमीनों के चक बदले जाने और सड़क किनारे की भूमि पर अवैध निर्माण के आरोपों को लेकर विवाद गहरा गया है। जंगीपुर से समाजवादी पार्टी (सपा) के विधायक डॉ. वीरेंद्र यादव पर जबरन जमीन कब्जा करने के आरोप लगे हैं, जिन्हें उन्होंने सिरे से नकारते हुए राजनीतिक मंशा से प्रेरित बताया है। यह मामला साल 2022-23 से बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के न्यायालय में लंबित है।
विधायक का पक्ष: आरोप निराधार
मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को सपा विधायक डॉ. वीरेंद्र यादव ने कहा, 'जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे पूरी तरह से निराधार और बेबुनियाद हैं। इसके पीछे साफ तौर पर राजनीतिक मकसद है।' उन्होंने यह भी कहा कि वे किसी भी नई जांच का स्वागत करते हैं और उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं।
विधायक ने आगे कहा, 'जिला मजिस्ट्रेट और उनसे पहले के जिला मजिस्ट्रेट भी इस मामले की जांच कर चुके हैं। हमारे चकबंदी अधिकारियों और अन्य संबंधित अधिकारियों ने भी इस पूरे मामले को देखा है। उन्हें फिर से जांच करने दीजिए, हमें इसमें कोई आपत्ति नहीं है।' इस बयान से स्पष्ट है कि विधायक प्रशासनिक जांच प्रक्रिया पर भरोसा जता रहे हैं।
ग्रामीणों की शिकायत और मुख्य आरोप
शिकायतकर्ता दुर्गेश यादव का आरोप है कि चकबंदी के दौरान 10 से 15 लोगों की लगभग 15 से 20 बीघा जमीन के चक उनकी मूल जगह से करीब तीन किलोमीटर दूर कर दिए गए हैं, जिससे प्रभावित किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है। उनका यह भी आरोप है कि सड़क किनारे की कीमती जमीनों पर कब्जे के उद्देश्य से चकों में हेरफेर की गई है।
गौरतलब है कि ग्रामीणों ने जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला को प्रार्थना पत्र सौंपकर मामले की निष्पक्ष जांच की माँग की है। यह ऐसे समय में आया है जब उत्तर प्रदेश में चकबंदी विवाद कई जिलों में भूमि विवादों का प्रमुख कारण बने हुए हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
चकबंदी प्रक्रिया, जो मूलतः बिखरी हुई कृषि भूमि को एक स्थान पर समेकित करने के लिए शुरू की जाती है, उत्तर प्रदेश में अक्सर विवादों का केंद्र बनती रही है। सकरा गांव का यह मामला 2022-23 से बंदोबस्त अधिकारी चकबंदी के न्यायालय में लंबित है, जो प्रशासनिक निपटान की धीमी गति को उजागर करता है।
आलोचकों का कहना है कि सड़क किनारे की भूमि, जिसकी बाजार में अधिक कीमत होती है, चकबंदी के दौरान प्रभावशाली लोगों के पक्ष में स्थानांतरित होने के आरोप नए नहीं हैं। यह मामला उन व्यापक सवालों को फिर से उठाता है जो चकबंदी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता से जुड़े हैं।
प्रशासन और आगे की कार्रवाई
जिलाधिकारी अनुपम शुक्ला को सौंपे गए प्रार्थना पत्र के बाद प्रशासनिक हलचल बढ़ी है। अब तक दो जिला मजिस्ट्रेटों द्वारा जांच की जा चुकी है, लेकिन मामला अभी भी न्यायालय में विचाराधीन है। यदि नई जांच के आदेश दिए जाते हैं, तो यह प्रकरण राज्य की चकबंदी नीति और उसके क्रियान्वयन पर नए सवाल खड़े कर सकता है।