25 सितंबर 2026
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ग्रीन अमोनिया से उर्वरक क्षेत्र में क्रांति संभव, FAI महानिदेशक बोले — सरकार निजी भागीदारी अनिवार्य

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ग्रीन अमोनिया से उर्वरक क्षेत्र में क्रांति संभव, FAI महानिदेशक बोले — सरकार निजी भागीदारी अनिवार्य

सारांश

फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी का कहना है कि ग्रीन अमोनिया भारत की उर्वरक आयात निर्भरता घटाने की कुंजी है — लेकिन इसके लिए सरकारी प्रोत्साहन, निजी निवेश और कौशल विकास तीनों की एकजुट भागीदारी अनिवार्य है।

मुख्य बातें

FAI के महानिदेशक डॉ.
सुरेश कुमार चौधरी ने 25 सितंबर 2026 को कहा कि ग्रीन अमोनिया भारत के उर्वरक क्षेत्र के लिए बड़ा अवसर है।
ग्रीन अमोनिया के बड़े पैमाने पर विकास से उर्वरक उत्पादन की विदेशी आयात निर्भरता काफी हद तक कम हो सकती है।
शुरुआती चरण में सरकारी नीतिगत सहायता और प्रोत्साहन लागत अंतर पाटने के लिए आवश्यक बताए गए।
बड़े बदलाव के लिए सरकार, उद्योग, सहकारी संस्थाओं और अनुसंधान संगठनों की साझा भागीदारी जरूरी।
शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी क्षमता निर्माण को भी ग्रीन अमोनिया इकोसिस्टम के लिए अनिवार्य बताया गया।

फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने 25 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत के उर्वरक क्षेत्र में ग्रीन अमोनिया की असीम संभावनाएं हैं और यह देश की आयात निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से घटाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों के बीच ग्रीन अमोनिया उर्वरक उद्योग के लिए एक बड़े अवसर के रूप में उभर रहा है।

पारंपरिक ग्रे अमोनिया की जगह हरित विकल्प

डॉ. चौधरी ने बताया कि यदि पारंपरिक ग्रे अमोनिया के विकल्प के रूप में ग्रीन अमोनिया का बड़े पैमाने पर विकास किया जाए, तो उर्वरक उत्पादन के लिए विदेशों पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।

उनके अनुसार, "ग्रीन अमोनिया का भविष्य काफी संभावनाओं से भरा है, लेकिन इसके व्यापक उपयोग के लिए लागत से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना होगा।" यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत उर्वरक आयात पर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च कर रहा है और कृषि क्षेत्र की आत्मनिर्भरता सरकार की प्राथमिकताओं में है।

लागत अंतर पाटने के लिए नीतिगत सहयोग जरूरी

डॉ. चौधरी ने स्पष्ट किया कि शुरुआती चरण में सरकार की नीतिगत सहायता और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, ताकि ग्रीन अमोनिया और पारंपरिक अमोनिया के बीच लागत के अंतर को पाटा जा सके। उन्होंने कहा कि जैसे जैसे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और तकनीक परिपक्व होगी, ग्रीन अमोनिया की लागत भी प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।

गौरतलब है कि वर्तमान में ग्रीन अमोनिया का उत्पादन पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी महंगा है, जो इसके व्यापक औद्योगिक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है। विशेषज्ञों के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा की घटती लागत इस अंतर को धीरे धीरे कम कर रही है।

निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य

FAI महानिदेशक ने इस बात पर जोर दिया कि इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या सहकारी संस्थाओं पर नहीं छोड़ी जा सकती। उन्होंने कहा, "ग्रीन अमोनिया और हरित ऊर्जा आधारित समाधान विकसित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी।"

डॉ. चौधरी के अनुसार, जब सरकार, उद्योग, सहकारी संस्थाएं और अनुसंधान संगठन एक साथ मिलकर काम करेंगे, तभी इस क्षेत्र की पूर्ण क्षमता का लाभ उठाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि सभी हितधारकों की साझेदारी से न केवल निवेश बढ़ेगा, बल्कि नई तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर लागू करने में भी तेजी आएगी।

कौशल विकास और तकनीकी क्षमता पर विशेष जोर

डॉ. चौधरी ने यह भी रेखांकित किया कि ग्रीन अमोनिया इकोसिस्टम को विकसित करने के लिए केवल पूंजी निवेश ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी क्षमता निर्माण को भी उतना ही अनिवार्य बताया। बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा मजबूत औद्योगिक ढाँचे की आवश्यकता होगी।

यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सरकार हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत पहले से ही नीतिगत प्रयास कर रही है, और उर्वरक क्षेत्र उस बड़े ढाँचे का अहम हिस्सा बन सकता है। FAI की यह अपील उद्योग जगत और नीति निर्माताओं दोनों के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि बदलाव की दिशा तय हो चुकी है — अब गति पकड़नी होगी।

संपादकीय दृष्टिकोण

लेकिन असली सवाल यह है कि भारत का हरित हाइड्रोजन मिशन अब तक उर्वरक क्षेत्र को ठोस लाभ क्यों नहीं दे पाया। ग्रीन अमोनिया की लागत अभी भी ग्रे अमोनिया से कई गुना अधिक है और बिना सुनिश्चित सब्सिडी ढाँचे के निजी क्षेत्र की 'सक्रिय भागीदारी' महज बयानबाजी बनकर रह सकती है। कौशल विकास और तकनीकी क्षमता की बात तो उचित है, पर इस क्षेत्र में अब तक कोई राष्ट्रीय कार्यक्रम स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है — यही वह रिक्तता है जिसे नीति निर्माताओं को भरना होगा।
RashtraPress
25 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

ग्रीन अमोनिया क्या है और उर्वरक क्षेत्र में इसकी भूमिका क्यों अहम है?
ग्रीन अमोनिया वह अमोनिया है जिसे नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों — जैसे सौर या पवन ऊर्जा — से उत्पन्न हरित हाइड्रोजन के जरिये बनाया जाता है, जो पारंपरिक ग्रे अमोनिया के मुकाबले कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य करता है। भारत के उर्वरक उत्पादन में अमोनिया एक प्रमुख कच्चा माल है, इसलिए इसके हरित विकल्प से आयात निर्भरता और कार्बन फुटप्रिंट दोनों घट सकते हैं।
भारत की उर्वरक क्षेत्र में आयात निर्भरता कितनी है?
भारत उर्वरक उत्पादन के लिए बड़ी मात्रा में अमोनिया और नाइट्रोजन आधारित कच्चे माल का आयात करता है, जिस पर हर वर्ष अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा खर्च होती है। FAI के अनुसार, ग्रीन अमोनिया के घरेलू उत्पादन से इस निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
ग्रीन अमोनिया को अपनाने में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
FAI महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी के अनुसार, ग्रीन अमोनिया की उत्पादन लागत अभी पारंपरिक ग्रे अमोनिया से काफी अधिक है, जो इसके व्यापक औद्योगिक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है। जैसे जैसे तकनीक परिपक्व होगी और उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, यह लागत प्रतिस्पर्धी हो सकती है।
बड़े पैमाने पर ग्रीन अमोनिया अपनाने के लिए कौन कौन सी भागीदारी जरूरी बताई गई है?
डॉ. चौधरी ने कहा कि इस क्षेत्र में बदलाव के लिए सरकार, उद्योग जगत, सहकारी संस्थाओं और अनुसंधान संगठनों की एकजुट भागीदारी आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह जिम्मेदारी केवल सरकार या सहकारी संस्थाओं पर नहीं छोड़ी जा सकती।
ग्रीन अमोनिया इकोसिस्टम के लिए कौशल विकास क्यों जरूरी है?
FAI महानिदेशक के अनुसार, ग्रीन अमोनिया के बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन और मजबूत औद्योगिक ढाँचा अनिवार्य होगा। उन्होंने शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी क्षमता निर्माण को इस पूरी प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बताया।
राष्ट्र प्रेस
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