ग्रीन अमोनिया से उर्वरक क्षेत्र में क्रांति संभव, FAI महानिदेशक बोले — सरकार निजी भागीदारी अनिवार्य
सारांश
मुख्य बातें
फर्टिलाइजर एसोसिएशन ऑफ इंडिया (FAI) के महानिदेशक डॉ. सुरेश कुमार चौधरी ने 25 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में कहा कि भारत के उर्वरक क्षेत्र में ग्रीन अमोनिया की असीम संभावनाएं हैं और यह देश की आयात निर्भरता को उल्लेखनीय रूप से घटाने में निर्णायक भूमिका निभा सकता है। उनके अनुसार, ऊर्जा क्षेत्र की मौजूदा चुनौतियों के बीच ग्रीन अमोनिया उर्वरक उद्योग के लिए एक बड़े अवसर के रूप में उभर रहा है।
पारंपरिक ग्रे अमोनिया की जगह हरित विकल्प
डॉ. चौधरी ने बताया कि यदि पारंपरिक ग्रे अमोनिया के विकल्प के रूप में ग्रीन अमोनिया का बड़े पैमाने पर विकास किया जाए, तो उर्वरक उत्पादन के लिए विदेशों पर निर्भरता को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिलेगी।
उनके अनुसार, "ग्रीन अमोनिया का भविष्य काफी संभावनाओं से भरा है, लेकिन इसके व्यापक उपयोग के लिए लागत से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना होगा।" यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारत उर्वरक आयात पर बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च कर रहा है और कृषि क्षेत्र की आत्मनिर्भरता सरकार की प्राथमिकताओं में है।
लागत अंतर पाटने के लिए नीतिगत सहयोग जरूरी
डॉ. चौधरी ने स्पष्ट किया कि शुरुआती चरण में सरकार की नीतिगत सहायता और प्रोत्साहन महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे, ताकि ग्रीन अमोनिया और पारंपरिक अमोनिया के बीच लागत के अंतर को पाटा जा सके। उन्होंने कहा कि जैसे जैसे उत्पादन क्षमता बढ़ेगी और तकनीक परिपक्व होगी, ग्रीन अमोनिया की लागत भी प्रतिस्पर्धी बन सकेगी।
गौरतलब है कि वर्तमान में ग्रीन अमोनिया का उत्पादन पारंपरिक तरीकों की तुलना में काफी महंगा है, जो इसके व्यापक औद्योगिक उपयोग में सबसे बड़ी बाधा है। विशेषज्ञों के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा की घटती लागत इस अंतर को धीरे धीरे कम कर रही है।
निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी अनिवार्य
FAI महानिदेशक ने इस बात पर जोर दिया कि इस क्षेत्र को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल सरकार या सहकारी संस्थाओं पर नहीं छोड़ी जा सकती। उन्होंने कहा, "ग्रीन अमोनिया और हरित ऊर्जा आधारित समाधान विकसित करने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होगी।"
डॉ. चौधरी के अनुसार, जब सरकार, उद्योग, सहकारी संस्थाएं और अनुसंधान संगठन एक साथ मिलकर काम करेंगे, तभी इस क्षेत्र की पूर्ण क्षमता का लाभ उठाया जा सकेगा। उन्होंने कहा कि सभी हितधारकों की साझेदारी से न केवल निवेश बढ़ेगा, बल्कि नई तकनीकों को व्यावसायिक स्तर पर लागू करने में भी तेजी आएगी।
कौशल विकास और तकनीकी क्षमता पर विशेष जोर
डॉ. चौधरी ने यह भी रेखांकित किया कि ग्रीन अमोनिया इकोसिस्टम को विकसित करने के लिए केवल पूंजी निवेश ही पर्याप्त नहीं है। उन्होंने शिक्षा, कौशल विकास और तकनीकी क्षमता निर्माण को भी उतना ही अनिवार्य बताया। बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपयोग के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन तथा मजबूत औद्योगिक ढाँचे की आवश्यकता होगी।
यह ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भारत सरकार हरित हाइड्रोजन मिशन के तहत पहले से ही नीतिगत प्रयास कर रही है, और उर्वरक क्षेत्र उस बड़े ढाँचे का अहम हिस्सा बन सकता है। FAI की यह अपील उद्योग जगत और नीति निर्माताओं दोनों के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि बदलाव की दिशा तय हो चुकी है — अब गति पकड़नी होगी।